मेंढकी

15-01-2020

मेंढकी

दीपक शर्मा

निम्मो उस दिन मालकिन की रिहाइश से लौटी तो सिर पर एक पोटली लिए थी, “मजदूरी के बदले आज कपास माँग लायी हूँ...”

इधर इस इलाक़े में कपास की खेती जमकर होती थी और मालिक के पास भी कपास का एक खेत था जिसकी फ़सल शहर के कारखानों में पहुँचाने से पहले हवेली के गोदाम ही में जमा की जाती थी।

“इसका हम क्या करेंगे?” हाथ के गीले गोबर की बट्टी को अम्मा ने दीवार से दे मारा।

“दरी बनाएँगे...”

“हमें दरी चाहिए या रोकड़?” मैं ताव खा गया। मालिक के कुत्ते की सेवा टहल के बदले में जो पैसा मुझे हाथ में मिलता था, वह घर का ख़र्चा चलाने के लिए नाकाफ़ी रहा करता।

“मेंढकी की छोटी बुद्धि है। ज़्यादा सोच-भाल नहीं सकती,” ग़ुस्से में अम्मा निम्मो को मेंढकी का नाम दिया करती, तभी से जब छह महीने पहले वह इस घर में उसे लिवा लायी थीं। निम्मो की आँखें उन्हें मेंढकी सरीखी गोल-गोल लगतीं, “कैसे बाहर की ओर निकली रहती हैं!” और निम्मो की जीभ उन्हें लंबी लगती, “ये मुँह के अंदर कम और मुँह से बाहर ज़्यादा दिखाई दिया करती है...”

“अम्माजी, आप ग़लत बोल रही हो,” निम्मो हँसी- जब भी वह अम्मा से असहमत हो, हँसती ज़रूर, “मेंढकी की बुद्धि छोटी नहीं होती। बहुत तेज़ होती है। जिसे वह अपने अंदर छिपाये रहती है। जगज़ाहिर तभी करती है जब उसकी जुगत सफल हो जाए और जुगती वह बेजोड़ है। चाहे तो पानी में रह ले और चाहे तो ख़ुश्की पर। चाहे तो पानी में रह ले और चाहे तो कूद कर पेड़ पर जा चढ़े। और यह भी बता दूँ, मेंढकी जब कूदने पर आती है तो कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता वह कितना ऊँचा कूद लेगी...”

“कूदेगी तू?” निम्मो की पीठ पर मैंने लात जा जमायी टनाटन- “कूद कर दिखाना चाहती है तो कूद... कूद... अब कूद...”

मेंढकों की कुदान के साथ मेरे कई कसैले अनुभव जुड़े थे। अपने पिता के हाल-बेहाल के लिए मैं मेंढक को भी उतना ही ज़िम्मेदार मानता था जितना मालिक को जिसके पगला रहे बीमार कुत्ते ने मेरे पिता की टाँग नोच खायी थी। और जब डाक्टर ने इलाज, दवा, टीके मँगवाने चाहे थे तो मालिक ने मुँह फेर लिया था। ऐसे में बेइलाज चल रहे मेरे पिता का दर्द बेक़ाबू हो जाता तो वह मेंढकों की खाल के ज़हरीले रिसाव का सहारा ले लिया करते। उस रिसाव को अपने घाव पर लगाते-लगाते चाट भी बैठते। कभी-कभी तो मेंढक की खाल को सुखा कर धुँधाते भी। अपने नशे की ख़ातिर। ताल से मेंढक पकड़ने का काम मेरा रहा करता, उनकी इकलौती संतान होने के नाते।

दरी बनाने का भूत, निम्मो के सर से उतरा नहीं। अगले दिन, बेशक मज़दूरी ही लायी, कपास नहीं। हाँ, अपने कंधों पर एक चरखा ज़रूर लादे रही, “मालकिन का है। उसे लोभ दे कर लायी हूँ, पहली दरी उसी के लिए बिनुंगी...”

“मतलब?” अम्मा की त्योरी चढ़ आयी। “अब तुझे दरियाँ ही दरियाँ बनानी हैं? घर का काम-काज मेरे मत्थे मढ़ना है?”

“घर का पूरा काम-काज पहले जैसी ही करती रहूँगी। दरियाँ मैं अपनी नींद के टाइम बिनुंगी...”

और रसोई से छुट्टी पाते ही वह अपनी पोटली वाली रुई से जा उलझी उसे धुनकने और निबेड़ने ताकि उसे चरखे पर लगाया जा सके।

रातभर उसका चरखा चलता रहा और सुबह हम माँ-बेटे को रुई की जगह सूत के वह दो गोले नज़र आए जिनके अलग-अलग सूत को वह एक साथ गूँथ रही थी एक मोटी डोरी के रूप में।

अगला वक़्त हमारे लिए और भी नये नज़ारे लाया।

कभी वह हमें सूत के लच्छों को सरकंडों के सहारे हल्दी या फिर मेंहदी या फिर नील के घोल में डुबोती हुई मिली तो कभी उन रंगे हुए लच्छों के सूख जाने पर उनकी डोरी बँटती हुई।

सब से नया नज़ारा तो उस दिन सामने आया जब हमने एक सुबह लगभग चार फुटी दो बाँसों के सहारे नील-रंगी सूत को लंबाई में बिछा पाया, ज़मीन से लगभग ६ इंच की ऊँचाई पर। अपने आधे हिस्से में हल्दी रंगी चोंच और पैर वाली मेंहदी रंगी चिड़ियाँ लिए, जिन्हें निम्मो लंबे बिछे अपने ताने पर इन दो धागों को आड़े तिरछे रख कर पार उतार रही थी।

“रात भर जागती रही है क्या?” अम्मा मुझसे भी ज़्यादा हैरान हो आयी थी।

“हाँ। मुझे यह दरी आज पूरी कर ले जानी है मालकिन को दिखाने के वास्ते कि उधार ली गयी उसकी कपास मेरे हाथों क्या रूप रंग पाती है। जभी तो उससे और कपास ला पाऊँगी...”

“मगर दूसरी दरी क्या होगी? किधर जाएगी?” मैंने पूछा।

“बाज़ार जाएगी। मेरी मेहनत का फल लायेगी...” निम्मो ने अपनी गरदन तान ली। उसके सर में एक अजानी मज़बूती थी, एक अजाना जोश। ऐसी मज़बूती और ऐसा जोश उसने हमारे नज़दीकी के पलों में भी कभी नहीं दिखाया था।

“कितना फल?” मैं कूद गया। एक अजीब खलबली मेरे अंदर आन बैठी थी।

“साठ से ऊपर तो ज़रूर ही खींच लाएगी। मेरे बप्पा के हाथ की इस माप की दरी का दाम तो सौ से ऊपर जा पहुँचता...”

“एक दरी का सौ रुपया?” अम्मा की उँगली उसके दाँतों तले जा पहुँची।

हम माँ-बेटा उसके जुलाहे बाप से कभी मिले नहीं थे। हमारी शादी से पाँच साल पहले ही वह निमोनिया का निवाला बन चुका था अपने पीछे सात बेटियाँ छोड़ कर जिनमें निम्मो तीसरे नंबर पर थी और उस तारीख़ में कुल जमा चौदह साल की।

“और क्या! और आप दोनों देखेंगे। मुझे भी मिलेगा। ज़रूर मिलेगा। मालूम है? जहान छोड़ते समय हम बहनों में से बप्पा मेरा ही हाथ पकड़े थे। मुझे ही बोले थे- अपनी कारीगरी तेरे पास छोड़ जा रहा हूँ... इसे बनाए रखना...”
हम माँ-बेटा एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।

“बप्पा के हाथ में जादू था, जादू," निम्मो का सुर चढ़ आया- “किसी भी रंग के ताने पर अलग-अलग रंगों का बाना वह ऐसा बिठलाते कि सूत के अंदर से फूल खिलखिलाते, पेड़ लहराते, मोर नाचते, बाघ दहाड़ते...”

“तेरी कारीगरी तो हम तब मानें जब वह रोकड़ लाए,” मैंने भी सुर चढ़ाकर निम्मो को ललकारा- “ऐसे फोकट में कपास जोड़कर चिड़ियाँ उड़ाने और हाथ फोड़ने से क्या लाभ?”

“रोकड़ लाएगी। आज ही लाएगी। बस इस दरी के पूरी होने की देर भर है...” निम्मो अपने धागों में लौट गयी।

और उसी दिन मालकिन की रिहाइश से लौटते ही उसने हम माँ-बेटे को पास बुलाकर अपनी धोती के पल्लू में बँधे रुपए गिन डाले- “पूरे सौ हैं। मालकिन मेरे काम पर इतनी रीझी कि मुझ से तीन दरियाँ और बनवाना चाहती हैं...”

अम्मा ने रुपए सँभाले और बोलीं- “मगर तू सौ पकड़ कर कैसे चली आयी? मोल तो पूरा माँगती। कारोबार में लिहाज़ कैसा?”

“एडवांस हैं, अम्मा जी, एडवांस," निम्मो हँस पड़ी, “अभी और वसूलना बाक़ी है। बता आयी हूँ, अब की एक दरी अस्सी रुपये की पड़ेगी...”

“तो क्या तीसों दिन इसी में लगी रहा करोगी?” मुझे अपना फ़िक्र सताने लगा। जिस बीच उसने अपनी वह पहली दरी तैयार की थी, उसने मेरी तरफ़ से अपना ध्यान पूरी तरह से मोड़ रखा था।

“अब उसकी बुनाई का लाभ हमीं को तो पहुँचना है। जितना रुपया बनाएगी, हमारे लिए ही तो बनाएगी,” निम्मो के हर दूसरे मामले में मुझ जैसी सोच रखने वाली अम्मा उसकी बुनाई वाले मामले में मुझ से अलग सोचती थी।

उस दिन मालिक ने अपने कुत्ते-घर की जाली बदलने का काम मुझे सौंप रखा था।

कुत्ता-घर मालिक के पिछवाड़े बनी हमारी कोठरी वाले दालान के एक कोने में बना था और कुत्ते को उसमें तभी बंद किया जाता था जब मालिक ने अपने ख़ास मेहमानों को उससे दूर रखना होता था। कुत्ता था भी भेड़िया-नुमा जर्मन शैफर्ड। पुराने उस कुत्ते ही की नस्ल का जिसकी मौत मेरे पिता की मौत के आगे-पीछे ही हुई थी, पिछले साल।

कुत्ते घर की ढलवां छत लोहे की थी और दीवारें दमदार लकड़ी की छितरी हुई पट्टियों की। उन पर उस समय मैं नयी जाली ठोक रहा था।

निम्मो उसी दालान में मुझ से कुछ दूरी पर अपनी बुनाई पर लगी थी। पूरी तरह से उसमें निमग्न। 

तभी मेरे हाथ से एक कील छूट कर निम्मो की बुनी जा रही दरी पर जा गिरी।

“मेरा हाथ इधर जाली को सीधी बनाए रखने में लगा है। दरी वाली वह कील उठा कर मेरे पास ले आओ,” मैंने निम्मो को आवाज़ दी।

“और इधर मेरे हाथ अपने फंदों में फँसे पड़े हैं। मेरी यह तीसरी दरी बस पूरी ही होने जा रही है,” निम्मो ने पट से मुझे जवाब दे डाला।

“मुझे जवाब नहीं चाहिए कील चाहिए,” उसकी बेध्यानी मुझसे सही नहीं गयी।

“तुम्हारे पास यही एक कील है क्या? मैंने बताया तो है मुझे यह दरी आज ही पूरी करनी है। मालकिन कहती हैं इसे पूरा करने पर ही वह मुझे मेरा बक़ाया पकड़ाएगी...”

“तू और तेरा बक़ाया,” –जाली छोड़ कर मैं उसकी दिशा में दौड़ आया – “तू और तेरी बुनाई। इसे छोड़ती है या मैं इसे छुड़ाऊँ।”

“मेरे धागों को मत उलझाना” –दोनों हाथ के अपने सूत समेत वह बुनी जा चुकी दो तिहाई अपनी उस दरी पर जा बिछी, “वरना यह दरी पूरी न हो पाएगी...”

“इसे पूरी तो अब मैं करूँगा," मैं उसके हाथों पर झपट लिया।

“छोड़ दो मुझे! छोड़, दो वरना मैं ताल में जा कूदूँगी...”

“नहीं छोड़ता। नहीं छोड़ूँगा,” –आपे से बाहर हो रहे मेरे हाथ चार-फुटी उस बाँस को लिपटे हुए धागों से बाहर खींच लाए।

“अम्मा जी," निम्मो चिल्लायी, “अम्मा जी, हमारी दरी गयी। हमारी दरी गयी...”

“क्या हो रहा है?” कोठरी के अंदर सब देख-सुन रही अम्मा हमारी ओर बढ़ आयी। हम पति-पत्नी के झगड़ों के समय वैसे वह अपने कान-आँख बंद ही रखा करती थीं।

“अम्मा, तू आज भी बीच में मत पड़ना। वरना मुझसे कोई बड़ा कांड हो जाएगा...” मैंने अम्मा को चेताया।

अम्मा वहीँ रुक गयी।

“यह दरी आज जाएगी ही जाएगी,” मैंने चार-फुटी वह बाँस दूर जा फेंका- “और आज से मेरे घर में बुनाई एकदम बंद...”

“ऐसा कहोगे तो मैं ताल में जा कूदूँगी,” निम्मो दरी से उठ खड़ी हुई।

“जा, कूद जा। कूद जा। कूद जा,” चिनग रही मेरी चिनगारियाँ बाहर छूट आयीं।

निम्मो ने आव देखा न ताव, मालिक के गेट की ओर निकल पड़ी।

“रोक ले उसे," अम्मा चिल्लायी, “रोक उसे। मेंढकी तो वह है ही, सच में जा कूदेगी...”

“कूदे जहाँ उसे कूदना है,” निम्मो के सूत वाले गोले मैंने ज़मीन पर पटक मारे।

निम्मो की छलाँग उसे ले डूबी। उसकी मौत को एक हादसे का नाम दिलाने में मालिक ने मेरी पूरी मदद की और मैं पुलिस की पूछताछ से साफ़ बच निकलने में कामयाब रहा।
 

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