तारामंडल का खोया हुआ नक़्शा
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
दस साल का मयंक हर रात छत पर बैठकर तारों को देखा करता और कल्पनाएँ बुनता रहता। उसे लगता था कि आकाश के पीछे ज़रूर कुछ न कुछ छिपा है। एक दिन उसने अपनी मेज़ के नीचे एक हल्का सा चमकता काग़ज़ पड़ा देखा।
काग़ज़ पर किसी अनजानी आकाशीय लिपि में कुछ लिखा था। और बीच में एक छोटासा चिह्न बना था—‘ओनली फ़ॉर द चोज़न वन’ यानी सिर्फ़ विशेष व्यक्ति के लिए!
मयंक चौंक गया, “मेरे लिए? लेकिन यह यहाँ आया कैसे?”
उसी समय उसके सामने प्रकाश का एक छोटा सा गोला प्रकट हुआ। धीमी आवाज़ में वह बोला, “मैं नोवा हूँ, तारामंडल का संदेशवाहक। यह नक़्शा हमारी आकाशगंगा का रहस्य है। लेकिन एक डार्क शैडो इसे चुरा ले गया था। तुम इसे फिर से सक्रिय कर सकते हो।”
मयंक डर गया। वह बोला, “मुझे क्या करना होगा?”
नोवा बोला, “बस थोड़ी हिम्मत और एकाग्रता। मन को शांत रखो और नक़्शे पर हाथ रखकर ‘ल्यूमिना’ कहो।”
मयंक ने नक़्शे पर विचार हाथ रखा और “ल्यूमिना” शब्द बोला। पल भर में नक़्शा हवा में तैरने लगा। उसमें तारों की रेखाएँ जुड़ गईं और एक पोर्टल खुला, जो सीधे चाँद के पीछे स्थित ‘स्टार वैली’ की ओर ले जाता था।
मयंक उसके भीतर प्रवेश कर गया।
यहाँ का आकाश और भी नीला था, तारे और ज़्यादा पास लग रहे थे और चारों ओर अद्भुत शान्ति फैली हुई थी।
लेकिन अचानक एक विशाल साया दिखाई दिया . . . डार्क शैडो, जो तारों की रोशनी चुरा रहा था।
वह गरजा, “नक़्शा मुझे लौटा दो। तारों की रोशनी अब मेरी है।”
मयंक एक पल के लिए डर गया, लेकिन फिर उसने सोचा, “अगर मैं डर गया, तो तारों की रोशनी कभी वापस नहीं आएगी।”
नोवा ने उसके कान में कहा, “नक़्शे के पास प्रकाश की रक्षा शक्ति है। तुम्हें बस उस पर भरोसा करना होगा।”
मयंक ने नक़्शे को ऊपर उठाया।
नक़्शे से तेज़ प्रकाश फूटा और डार्क शैडो पीछे की ओर धकेल दिया गया।
“नहीं ऽ ऽ ऽ . . . ” शैडो चीख़ा और टूटकर धुएँ में घुल गया। पल भर में पूरी स्टार वैली जगमगा उठी।
नोवा ख़ुशी से बोला, “मयंक, तुम सफल हो गए। आज तारामंडल फिर से सुरक्षित है।”
आकाश में बड़े-बड़े तारे उसकी ओर झुककर चमकने लगे, मानो उसका अभिनंदन कर रहे हों। पोर्टल फिर से खुला और मयंक वापस पृथ्वी पर आ गया।
अब नक़्शा साधारण-सा लग रहा था, लेकिन उसके एक कोने में एक छोटा-सा वाक्य जुड़ गया था, “व्हेनेवर द स्टार्स नीड यू, द मैप विल ग्लो अगेन।” (जब भी तारों को तुम्हारी ज़रूरत होगी, यह नक़्शा फिर से चमक उठेगा)
कुछ दिनों बाद मयंक के हाथ फिर वही चमकता काग़ज़ लगा। वह तुरंत बालकनी से आकाश की ओर देखने लगा, जहाँ एक तारा बहुत तेज़ी से झिलमिला रहा था, मानो कह रहा हो, “यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है।”
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