संसद में हंगामा करने लीडर बन गए रीडर

15-02-2026

संसद में हंगामा करने लीडर बन गए रीडर

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

 

पार्टी की ओर से आदेश जारी हुआ कि अगली मीटिंग में हर नेता एक-एक किताब पढ़कर आए।

हाल ही में संसद में किताबें पढ़ने, न पढ़ने को लेकर जो घमासान मचा, उसके बाद एक पार्टी को अचानक यह सूझा कि अगर हमारे नेता किताबें पढ़े-लिखे हों तो किसी न किसी दिन संसद में हंगामा करने के काम तो आ ही सकते हैं। पार्टी ने फ़रमान जारी किया कि अब से अगली मीटिंग में हर नेता एक-एक किताब पढ़कर आएगा।

संसद में हंगामा मचाने के लिए मसाला जुटाने वाले ये सभी नेता, जो अब ‘रीडर’ बन चुके थे, बाद में इकट्ठा हुए और अपने-अपने अनुभव सुनाने लगे:

नेताजी 1:

मेरे हाथ तो एक यात्रा-वृत्तांत लग गया। चकलापुर म्युनिसिपालिटी के नेता सरकारी ख़र्चे पर होनोलूलू का फ़्लड मैनेजमेंट और रियो डी जेनेरो की नालियों की व्यवस्था समझने गए थे, उसका शानदार वर्णन था।

नेताजी 2:

मेरे हिस्से एक सस्पेंस थ्रिलर नावेल आया। उसमें ऐसी कहानी थी कि जनता का बड़ा वर्ग एक राजनीतिक पार्टी से नाराज़ था, फिर भी उस पार्टी को पिछली सभी चुनावों से ज़्यादा रिकार्ड सीटें मिल जाती हैं। इतना ज़बरदस्त सस्पेंस था कि क्लाइमैक्स पढ़ने की हिम्मत ही नहीं हुई।

नेताजी 3:

मैंने तो एक ऐतिहासिक उपन्यास पढ़ डाला। व्हाट्सऐप पर आए इतिहास के लेखों को जोड़-जाड़कर बनाई गई बड़ा मज़ेदार नावेल था।

नेताजी 4:

मेरे हिस्से एक आत्मकथा आई। एक आदमी जिसके पास साइकिल के टायर में पंचर लगवाने के भी पैसे नहीं होते, वही ज़िन्दगी में धीरे-धीरे आगे बढ़कर कार और फिर प्राइवेट प्लेन में घूमने लगता है। मुझे तो ये कहानी बहुत प्रेरणादायक लगी।

नेताजी 5:

भाइयों, मेरे हिस्से तो एक धार्मिक पुस्तक आई। उसे पढ़कर पता चला कि दुनिया में पाप जैसी भी कोई चीज़ होती है। पता नहीं ये सारे पाप करता कौन है।

नेताजी 6:

अरे, मुझे तो ‘एक्सपेंडिचर प्लानिंग’ की एक सांख्यिकीय किताब पकड़ा दी गई थी। लगा था बहुत बोरिंग होगी, लेकिन अंदर पढ़ा तो कमाल की बातें थीं, स्कूलों की रंगाई-पुताई के बजट से शिक्षा सचिव की कार कैसे ख़रीदी जाए और सरकारी अस्पतालों के एक्स-रे मशीनों के बजट से स्वास्थ्य अधिकारी के बँगले में ऐसी कैसे लगवाया जाए, ऐसी ढेर सारी मस्त टिप्स थीं।

नेताजी 7:

बॉस, कोई मानेगा नहीं, लेकिन मैंने तो ‘अटपटा इंजीनियरिंग’ नाम की इंजीनियरिंग की किताब पढ़ ली। उसमें एक ऐसी पानी की टंकी का ज़िक्र था जो पानी भरते ही टूट जाती है। एक ऐसे पुल की कहानी थी जिसे उद्घाटन के कुछ ही सालों में जर्जर होने पर तोड़ना पड़ गया। एक पुल का डिज़ाइन बताया गया था, जो असल में चार लेन का होता है, लेकिन थोड़ी ही आगे जाकर दो लेन का रह जाता है। एक और पुल ऐसा था, जिस पर पूरे 90 डिग्री के एंगल पर मोड़ था, बताइए!

नेताजी 8:

अरे भाइयों, मेरे हिस्से तो हास्य कथाओं की किताब आ गई। अंदर खोलकर देखा तो उसमें हमारे ही लोगों के चुनावी भाषण थे! मुझे तो याद करके आज भी हँसी आ जाती है . . .

 . . . इस बात पर सारे नेता हँसते-हँसते एक-दूसरे को ताली देने लगे। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
कविता
किशोर साहित्य कहानी
सामाजिक आलेख
चिन्तन
कहानी
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में