सावधानी के बीच चूक

01-02-2026

सावधानी के बीच चूक

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

सावधानी ओढ़े मैं चलता हूँ हर मोड़ पर, 
क़दम न डगमगाएँ, यही प्रार्थना हर क्षण। 
अनुभवों की गठरी पीठ पर लादे हुए, 
फिर भी कोई काँटा चुभ ही जाता है मन में कहीं। 
दूध की जलन अब भी जीभ पर सुलगती है, 
इसलिए मट्ठा भी डर-डर कर पीता हूँ। 
हर सच को सात छलनियों से छानता हूँ, 
फिर भी कोई भ्रम चुपके से भीतर उतर आता है। 
अँधेरा छोड़ उजाले की ओर बढ़ता हूँ, 
पर परछाईं बग़ल से हटती ही नहीं। 
बीते दिनों का डर, आने का संशय, 
हर प्रकाश में अपना अँधेरा बो देता है। 
एक सिरा छोड़ता हूँ, दूसरा उलझ जाता है, 
जीवन की रस्सी हाथों में कसती चली जाती है। 
समझूँ कि जीत गया, तभी हार झाँक लेती है, 
और सावधानी के बीच भी चूक हो जाती है। 
शायद यही मनुष्य होना है, गुरुजी
सतर्क रहकर भी गिरने की सम्भावना। 
इसी चूक में छिपी है सीख की लौ, 
और इसी असमंजस में जीवन की सच्ची पहचान। 

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