पेंशन लेने का, टेंशन देने का

01-02-2026

पेंशन लेने का, टेंशन देने का

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

पिरथी काका के बैठक वाले घर के बाहर नया बोर्ड टँगा देख कर मुझे हैरानी हुई। बोर्ड पर लिखा था—स्वामी पेंशनानंद। मैं घर के भीतर गया तो देखा, काका सफ़ेद कुरता-पायजामा पहने सोफ़े पर बैठे गुनगुना रहे थे, ‘ओ . . . ओ . . . ओ . . . ओ . . . पेंशन के दिन, भुला न देना, आज हँसे कल रुला न देना . . .’ 

मैंने पूछा, “काका, यह क्या नया स्टंट है? पिरथी काका से पेंशनानंद कब बन गए?” 

काका बोले, “देवआनंद, विजय आनंद और चेतन आनंद से प्रेरित हो कर मुझे नया नाम सूझा—पेंशनानंद। पिछले साल सरकारी नौकरी से रिटायर हुआ, तब से पेंशन ले कर आनंद में जी रहा हूँ। अपने जैसे पेंशनरों को इकट्ठा कर के एक ग्रुप बनाया है। उन्हें सिखाता हूँ कि पेंशन खा कर कैसे ठसाठस मज़े से जिया जाए।” 

मैंने पूछा, “आपके पेंशनप्रेमी ग्रुप का स्लोगन क्या है?” 

पिरथी काका बोले, “हमने एक ही सूत्र अपनाया है—पेंशन लेने का और टेंशन देने का . . .” 

“पेंशन लेने का तो समझ आया, पर टेंशन देने का क्या मतलब?” 

काका बोले, “जैसे ही पेंशन के पैसे आते हैं, घरवाले बहुत प्यारे लगने लगते हैं। कई ऐसे होते हैं, जो बुज़ुर्गों की क़द्र नहीं करते, पर बुज़ुर्ग की पेंशन आती हो तो क़द्र भी करते हैं और गरम-गरम रोटी भी खिलाते हैं। और अगर कभी घरवाले आड़े आएँ, झगड़ा करें तो उन्हें चेतावनी देते रहो कि सीधे नहीं रहे तो ऐसा क़दम उठाऊँगा कि पेंशन आनी बंद हो जाएगी, फिर बैठ कर मुफ़्त में मँजीरे बजाना। इस धमकी से घरवाले फिर सीधे पटरी पर आ जाते हैं। इसे कहते हैं, पेंशन लेने का और टेंशन देने का। समझे?” 

मैंने पूछा, “काका, आप काकी को भी टेंशन देते हैं?” 

सवाल सुन कर थोड़ा झेंपते हुए काका बोले, “तेरी काकी तो टेंशन को तल कर खा जाने वाली है, तू उसे नहीं जानता? वह टेंशन टालने के लिए ध्यान का प्रयोग करती है, ध्यान का . . . ” 

मैंने कहा, “क्या बात कर रहे हैं काका? काकी ध्यान में बैठती हैं?” 

काका बोले, “अरे नहीं भाई, काकी कहाँ ध्यान में बैठने वाली? वह तो मुझे बैठा कर ध्यान रखती है। मैं मोबाइल पर किससे बात करता हूँ, आसपास के घरों की कौन-सी खिड़की पर नज़र फिसलाता हूँ, सब पर ध्यान। मुझे ज़रा सर्दी-खांसी हो जाए तो दौड़ कर दवा लाती है। मुझे कुछ हो गया तो पेंशन बंद हो जाएगी, इस डर से मेरी सेहत का पूरा ध्यान रखती है। यानी टेंशन टालने के लिए काकी ध्यान का प्रयोग करती है, मगर मेरे ऊपर, समझे?” 

मैंने बात का रुख़ बदलते हुए कहा, “आज की इस भागदौड़ और हंगामेदार जीवन में लोग तरह-तरह के टेंशन में घिरे रहते हैं, ‘कुँवारे’ को शादी कब होगी इसका टेंशन, शादी के लड्डू खा कर पछताए को इससे छुटकारा कैसे मिले इसका टेंशन, सीधे रास्ते पर चलने वाले को कहीं टेढ़े रास्ते पर न चढ़ जाए इसका टेंशन और टेढ़े रास्ते पर चलने वाले को भूल से सीधे रास्ते पर न आ जाए इसका टेंशन। किसी को कुर्सी का टेंशन है तो किसी को पेट की बीमारी का . . . यानी सब टेंशन में ही रहते हैं।” 

मेरी बात पर सिर हिलाते हुए काका बोले, “देखो भाई, काम-धंधा करने वालों को हाईपर-टेंशन रहता है और हमारे जैसे फ़ुरसती रिटायरनंदों में उम्र बढ़ने पर कोई बीमार पड़ जाए तो डायपर-टेंशन यानी टेंशन से कोई बच नहीं सकता, है न?” 

मैंने कहा, “टेंशन से मुक्त होने के लिए सच में अ-टेंशन का प्रयोग करना चाहिए।” 

काका ने पूछा, “अ-टेंशन यानी?” 

मैंने कहा, “जैसे अ-नीति यानी नीति नहीं, अविवाहित यानी विवाह नहीं, वैसे ही अ-टेंशन यानी टेंशन नहीं लेना। और अंग्रेज़ी में ‘अटेंशन’ का मतलब ध्यान देना भी होता है। तो अ-टेंशन के प्रयोग में ध्यान का प्रयोग भी आ गया।” 

पिरथी काका बोले, “भाई, तूने गुजराती ‘अ-टेंशन’ और ध्यान का ज़बरदस्त मेल बिठा दिया। अब हम भी सारे पेंशनर क्लब वाले तय करेंगे कि जितना हो सके, दूसरों को टेंशन न दें और अ-टेंशन में रहें। फिर राग केदार में मस्ती से गाएँगे:

“पेंशन दो घनश्याम नाथ, 
मोरी अखियाँ प्यासी रे . . . ” 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
कविता
सामाजिक आलेख
चिन्तन
कहानी
किशोर साहित्य कहानी
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में