पार्टी के सिर पर पानी की मार चल रही है, शर्म नाम की चीज़ नहा डालो

01-02-2026

पार्टी के सिर पर पानी की मार चल रही है, शर्म नाम की चीज़ नहा डालो

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

किसी भी घटना में जिसका पेट का पानी न हिले, वही सच्चा नेता

 

पार्टी में नेताओं को आदेश मिला कि बिना नहाए सब लोग मीटिंग में इकट्ठा हो जाओ। नेताओं को हैरानी हुई। पार्टी को जो भी राजनीतिक गंदे-गंदे फ़ैसले लेने होते हैं, वे तो ऊपर के स्तर पर ही होते हैं और बाक़ी लोगों को तो बस सूचना देनी होती है। फिर इस मीटिंग में बिना नहाए आने का आदेश क्यों? 

हालाँकि कुछ नेताओं ने मन को समझा लिया कि वैसे भी ग्राम पंचायत का चुनाव जीतें या शहर के बग़ीचे में गटर पर ढक्कन लगे, हर बार फोटो तो हर जगह ऊपर के नेताओं के ही छपते हैं। हम चाहे जितना नहा-धोकर सज-धज लें, हमारे फोटो कभी विज्ञापन, बैनर, पोस्टर, होर्डिंग में छपने वाले हैं ही नहीं। फिर न नहाएँ तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?

आख़िरकार मीटिंग शुरू हुई। एक शीर्ष नेता ने भाषण शुरू किया, “देवताओं को भी दुर्लभ लगें ऐसे मेरे साथियो, इस समय पार्टी के सिर पर पानी की मार चल रही है।” 

“हैं?” एक नेता पूछ बैठा, “फिर किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष ने हमारे नेता का पानी नाप लेने की गुस्ताख़ी कर दी क्या?” 

जवाब देने के बजाय उस नेता ने आगे कहा, “देखिए, कहीं नल से साफ़ पानी नहीं आया तो बच्चे मर गए, कहीं नई-नवेली बनाई गई टंकी ट्रायल के लिए पानी भरते ही बैठ गई। एक गाँव में नदी किनारे घाट की तोड़फोड़ हुई तो हंगामा मच गया . . . नल, टंकी, नदी से जुड़ी हर घटना में आख़िरकार मछलियाँ तो पार्टी पर ही धुलती हैं।” 

“हम हर बार ठंडा पानी डालना नहीं जानते, ऐसा तो नहीं,” एक अनुभवी नेता ने खंखारते हुए कहा। 

“सही है, लेकिन इस बार पार्टी आगे बढ़ना चाहती है। आप सबको बिना नहाए बुलाने का कारण यह है कि पार्टी ने इस बार तय किया है कि हम सब सामूहिक रूप से शर्म नाम की चीज़ को ही नहा डालेंगे। एक बार ऐसा सामूहिक स्नान हो गया, तो फिर कैसी भी घटना हो, हमारे पेट का पानी भी नहीं हिलेगा।” 

“ज़ोरदार . . . गेम चेंजर . . . मास्टरस्ट्रोक . . . ” 

ऐसे नारों के बीच बाक़ी नेताओं ने मेज़ थपथपाई। 

तभी एक नेता ने चिंता जताई, “शर्म से डूब मरने के लिए तो ढक्कन में थोड़ा-सा पानी ही काफ़ी होता है, लेकिन अगर शर्म नाम की चीज़ को ही नहाना हो तो कितनी बूँदें चाहिए?” 

यह सवाल सुनते ही बड़े नेता ने ग़ुस्से में मेज़ पटक दी। मेज़ पर रखी पानी की बोतल उछलकर नीचे गिर पड़ी और उसमें से पानी बहकर नेताजी के कपड़ों पर गिर गया। जैसे गर्म पानी से जल गए हों, वैसे नेताजी “पानी . . . पानी . . .” चिल्लाते हुए बाहर भागे। उनके पीछे दूसरे कोर-कसर नेता भी सच्चे अनुयायियों की तरह “पानी . . . पानी . . . ” चिल्लाते हुए बाहर निकल गए। 

अपनी बात: (नेताओं को पानी से कुछ ज़्यादा पटता नहीं, इसीलिए तो वे ज़्यादातर मगरमच्छ के आँसू बहाते हैं) 

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