लघुकथा इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
दिलीप कुमार
जंबो द्वीप के बीचों-बीच आधी रात को दो वीरांगनाओं के मेल-मिलाप का संयोग बना। एक स्त्री सराय काले खां की तरफ़ से स्टेशन पर आती है और भीड़ में गुम हो जाती है। यही दिल्ली शहर का तिलिस्म है जो एक स्टेशन में दाएँ साइड से घुसो तो एक नाम मिलता है और बाएँ साइड से घुसो तो दूसरा नाम मिल जाता है जबकि जगह एक ही है। भीड़ की पहली स्त्री ने अपने परिचय की एक दूसरी स्त्री को देखा।
दोनों पचपन वर्षीया वीरांगनायें आमने-सामने थीं। दोनों ने एक दूसरे को देखा फिर इतनी सफ़ाई से नज़रें चुरा लीं, जितनी सफ़ाई से वे एक दूसरे की रचनाओं की थीम उड़ा लिया करती थीं।
बुढ़ापे की दहलीज़ पर खड़ी दोनों औरतें ख़ुद को बूढ़ी मानने को तैयार ना थीं। जिस उम्र में इन दोनों वीरांगनाओं को चारों धाम की यात्रा के बारे में सोचना चाहिये था तब ये साहित्य की एक हाशिये की विधा लघुकथा के उन्ननयन हेतु कटिबद्ध हो गयीं। इसलिये बद्रीनाथ या रामेश्वरम की यात्रा करने के बजाय ये नेत्रियाँ जंबो द्वीप की राजधानी में जब तब विचरण करती पाई जाती हैं।
भागीरथ ने उतने प्रयास गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये शायद नहीं किये होंगे जितना प्रयत्न ये दोनों महिलाएँ लघुकथा के उद्धार के लिये बार-बार दिल्ली की यात्रा करके करती हैं क्योंकि पेड़ लेक्चर वाला गोरखधंधे वाले गुरुघंटाल राजधानी में भरे पड़े हैं। जिस उम्र में लोगों को विरति होने लगती है, व्यक्ति का मोहमाया के आकर्षणों से मोहभंग होने लगता है और इंसान सामाजिक बन्धनों से मुक्त होकर वानप्रस्थम की ओर प्रस्थान करता है उस उम्र में ये दोनों वीरांगनायें नव यौवना की भाँति महत्त्व की आकांक्षा पाल बैठीं।
जैसे नई नवेली दुलहन अपनी गृहस्थी के सामान को चुन-चुनकर रखती हो और बात-बात पर अपनी तारीफ़ सुनना चाहती हो वैसे ही लघुकथा की ये चंगु-मंगू अपनी हर रचना के बाद कुंतल-कुंतल तारीफ़ सुनने की तलबगार रहती थीं। लेकिन इन ख़्वातीनों को ये नहीं मालूम था कि साहित्य में तारीफ़ मेधा की होती है और अगर मेधा ना हो तो बहुत पापड़ बेलने के बाद ही कुछ हासिल हो सकता है वो भी अपवाद स्वरूप, गारण्टी नहीं है कामयाबी की।
ये दोनों महिलाएँ ठंडी आह भरकर अफ़सोस करतीं और महाकवि नीरज की कविता गुनगुनाकर ख़ुद को तसल्ली देतीं कि “चाह तो निकल सकी ना हाय उम्र ढल गई।” बेचारियों का बचपन तो मनोहर कहानियाँ पढ़ कर बीता और इस उम्र में साहित्यकार बनने का बीड़ा उठा लिया। मनोहर कहानियाँ और लुग्दी टाइप के साहित्य का खाद पानी पाकर ख़ालिस साहित्य का कमल कैसे खिलेगा ये प्रश्न उतना ही अबूझ है जितना कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट कैसे मिलेगी।
जो मोहतरमा हजरत निज़ामुद्दीन स्टेशन की तरफ़ से प्लैटफ़ॉर्म पर आयी थीं उनका नाम प्रभा था। वो रांची शहर से पधारी थीं और ख़ुद को साहित्य का लेडी धोनी बताती थीं। बचपन से सी-ग्रेड फ़िल्में देखना और लुग्दी साहित्य पढ़ना उनका प्रिय शग़ल रहा था। एक ही क्लास में कई-कई बार फ़ेल हुईं तो उन्होंने विद्यालय जाना छोड़ दिया, फिर पूरी पढ़ाई पत्राचार और प्राइवेट की बदौलत ही चली वो भी तमाम झोल-झाल के साथ। इनका क़द छोटा, शरीर मोटा और रंगत खिली हुई थी। बचपन कई भाई-बहनों के बीच बीता, घर में धन-धान्य का अभाव रहा सो बालिका बहुत नाख़ुश रहा करती थी अपने बचपन से। माँ-बाप को विवाह की चिन्ता हुई तो कोई भी इस कन्या के साथ विवाह को तैयार ना था क्योंकि ये ख़ुद कई बार फ़ेल हो चुकी थीं मगर विवाह अल्प शिक्षित से नहीं करना चाहती थीं, उच्च शिक्षित से ही करना चाहती थीं सो सुयोग्य वर मिलना टेढ़ी खीर थी।
किसी तरह जुगाड़ लगाकर प्रथमा, द्वितीया की डिग्रियाँ लेते हुए अंत में शास्त्री की डिग्री लेने में वो सफल रहीं और कालांतर में वो प्रभा शास्त्री कहलाईं अब वो लघुकथा की शिल्प शास्त्री और विद्वता की प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं।
लेकिन लोग-बाग इस बात से हैरान भी रहा करते हैं कि आंगनबाड़ी की जो नौकरी वो किया करती थीं उससे वो निकाल क्यों दी गईं। तमाम लोग तो कानाफूसी में ये भी कहते पाए गए कि उनकी डिग्री नक़ली है उनका असली नाम तो दुलारी देवी है, प्रभा शास्त्री तो उनकी उस बहन का नाम है जो युवावास्था में स्वर्गवासी हो गयी थी और ये उन्हीं की डिग्रियों से काम चला रही हैं।
नौकरी भले ही जाती रही मगर वो प्रभा शास्त्री के तौर पर पहचान बनाने में सफल रहीं।
विवाह से पहले वो गाँधी आश्रम से चरखा कात कर के अपने लिये वस्त्र आदि का प्रबंध करती थीं लेकिन अब तो स्टाइलिश कपड़े उनकी पहचान बन चुके हैं जबकि उनके मियाँ सूती कुर्ते-पायजामें में ही दिन काट रहे हैं।
दूसरी मोहतरमा जो स्टेशन पर सराय काले खां की तरफ़ से अवतरित हुईं थीं उनका नाम मैना महारानी था। मैना महारानी फ़िलहाल देहरादून में रहती हैं। बचपन से ही उन्हें नाच-गाने का बहुत शौक़ था मगर विधाता ने धोखा कर दिया और उन्हें आवाज़ फ़टे बाँस जैसी दे दी। पढ़ाई-लिखाई में तो ठीक-ठाक थीं मगर व्यवहारिक ज्ञान बिल्कुल शून्य था। घर बाहर के लोग उनका उपनाम मूढ़मति रखे हुए थे। ये मोहतरमा बचपन से अनथक मेहनती थीं, मगर हर जगह फिसड्डी ही रहीं। रंग-रूप तो इनका ठीक-ठाक रहा मगर परिवार के तानों ने पढ़ाई-लिखाई में इन्हें इतना तनाव दिया कि इन्हें थाइरॉइड की समस्या हो गयी।
एक समस्या आयी तो पीछे-पीछे दूसरी भी चली और फिर आती ही गयीं। कई वर्षोँ तक मनोचिकित्सक की सेवाएँ लीं पर कुछ ख़ास लाभ ना हुआ। फिर एक दिन किसी दवा के रिऐक्शन से हाथ-पाँव फूल गए। शरीर बेडौल और भारी हो गया पर नृत्य का मोह ना गया मन से।
ये मोहतरमा बचपन में दूसरों के शादी ब्याह में महिलाओं की महफ़िल में नाचती थीं, जवानी में पति को इशारों पर नचाती रहीं और अब बुढ़ापे की दहलीज़ पर माता की चौकी नामक वेंचर से दुनिया को नचाती फिरती हैं। संगीत सुनते ही उनके उनके पैर ऐसे थिरकने लगते हैं जैसे फ़िल्मों में बीन की आवाज़ सुनकर नाग-नागिन नाचने बावले हो जाते हैं। महारानी उनके बचपन का नाम है, मैना नाम उनका ख़ुद का स्थापित किया हुआ है।
महारानी नाम भी बड़ा दिलचस्प है, अपनी बानगी के बिल्कुल उलट। एक प्रसिद्ध कहावत है
“आँख के अंधे, नाम नैनसुख।” महारानी के पिता एक वकील के मुंशी थे। सात भाई-बहनों में तन के कपड़े और पेट का अनाज तक पूरा नहीं हो पाता था। महल्ले के कपड़े सिल-सिल कर जैसे-तैसे गुज़ारा हुआ मगर नाम महारानी। मगर नृत्य का शौक़ उन्हें बहुत फलदायी लगा। हर नृत्य के बाद शुभ अवसरों पर फेंके गए पैसे लूटने की उन्हें आदत थी। वो नृत्य करती थीं और जहाँ पैसे नहीं फेंके जाते थे, वहाँ वो होस्ट से अपनी मेहनत का तक़ाज़ा देकर कुछ ना कुछ वसूल लाती थीं।
बाद में जब माता की चौकी नामक अपने वेंचर को जब इन्हें विस्तार देना था तब अपना नाम इन्होंने मैना रख लिया और तब से ये “मैना महारानी” कहलाती हैं।
“माता की चौकी” नामक उनके पैकेज में देवी की मूर्ति रखकर ख़ूब सारे फ़िल्मी भजन गाये जाते थे फिर ख़ूब हँसी-ठट्ठा और अंत में किटी पार्टी। कालांतर में जब माता की चौकी में प्रसाद वितरण के बाद सपना चौधरी का डांस भी जोड़ लिया गया तब महारानी जी की डिमांड काफ़ी बढ़ गई और आमदनी भी उसी अनुपात में बढ़ी। फिर तो उन्हें गायन और नृत्य दोनों के अवसर मिलने लगे।
इस संगीतमयी चौकी में आमतौर पर मैना महारानी अकेले नहीं गाती थीं क्योंकि फ़टे बाँस की तरह उनकी आवाज़ बहुत कर्कश लगती थी मगर कोरस में और वाद्य यंत्रों के शोर में वो अपनी आवाज़ की तुर्शी बड़ी आसानी से छिपा लेती थीं। नाम मैना महारानी और वाणी इतनी कर्कश, इन्हीं मैडम के लिये ही शायद शेक्सपियर ने कहा था “व्हाट इज़ इन ए नेम” (नाम में क्या रखा है)।
हालाँकि संगीतमयी चौकी चाहे जैसी भी हो मगर मैना महारानी डांस में रंग जमा ही दिया करती थीं।
बुरा हो फ़ेसबुक के इन एप्पस का जिन्होंने सभी का सुंदर, सुरीला और हर विधा में पारंगत बना दिया है।
फ़ेसबुक से ही ये दोनों महिलाएँ श्री श्री 1008 लघुकथा के गुरु राजेश्वर महाराज के संपर्क में आयीं। राजेश्वर महाराज दिल्ली में क्लर्क हैं एक बहुत ही मलाईदार विभाग में। दिन में पैंट-शर्ट पहनते हैं और आईफोन चलाते हैं, शाम को धोती-कुर्ता और शंख के साथ कर्मकांड निष्पादित कराते हैं वो भी सशुल्क।
विभाग के लोगों की ऊपर की कमाई लघुकथा संग्रहों में निवेश कराते हैं। दो-तीन सौ प्रतियाँ प्रकाशित करवा कर बीस-पचीस हज़ार प्रतियों का बिल बनवाते हैं जिससे काफ़ी पैसा सफ़ेद हो जाता है। फिर उन किताबों को मुफ़्त बाँट कर साहित्यसेवी होने की वाहवाही अलग से लूटते हैं। विभाग के कई आला लोग उनकी इस ब्लैक एंड व्हाइट की कारीगरी से ख़ुश रहते हैं और नवोदित तथा असफल साहित्यकार तो इनपे बलि-बलि जाया करते हैं और इनकी सदाशयता की मिसालें दिया करते हैं। साहित्य प्रेमी इन्हें लघुकथा उद्धारक के रूप में पाकर लहालहोट हैं, कुछ लोग इन्हें प्रातः स्मरणीय कहते हैं और नाम के सामने सदैव आदरणीय शब्द लगाते हैं जबकि गाली देकर बात करना राजेश्वर महाराज का प्रिय शग़ल है।
राजेश्वर जी अक्सर लोगों को विधा के विकास के लिये दिल्ली बुलाते रहते हैं। एक बार तो उन्होंने ग़ज़ब ही कर दिया। सम्मेलन स्थल पर ही उन्होंने एक मोमबत्ती सुलगा दी फिर उस पर हाथ रखकर तुरंत शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करवाया जिसमें उनके चेले/चेलियों से ये शपथ दिलवाई गई कि:
“मैं क़सम खाता हूँ/खाती हूँ कि आज के बाद सिर्फ़ लघुकथा की डीलिंग कराऊँगी। उसी को बेचूँगी/बिकवाऊँगी। किसी भी पत्रिका या अख़बार में ज़बरदस्ती ठेल दूँगा/दूँगी। मुझे नए ग्राहक से जो भी आमदनी होगी उसको मल्टी लेवल मार्केटिंग के तर्ज़ पर उचित कमीशन राजेश्वर जी को भेजूँगा/भेजूँगी।” आगे फिर ये प्रस्ताव पारित हुआ कि फ़िलहाल राजधानी में राजेश्वर जी को “लघुकथा का महामंडलेश्वर” माना जायेगा। उनके चेले/चेलियाँ विभिन्न शहरों में उनकी चरण पादुका रखकर लघुकथा के कमीशन एजेंट की भाँति काम करेंगे और लघुकथा के नाम के सारे टोल टैक्स वसूलते रहेंगे।
लघुकथा के महामंडलेश्वर बहुत बरसों से कविता की चोरी कर-करके त्रस्त थे, उनके सामने अचानक ये अवसर आया तो उन्होंने इसे लपक लिया।
अब वो “लघुकथा इंडिया प्राइवेट लिमिटेड” की मल्टी लेवल मार्केटिंग की शाखा विस्तार हेतु प्रयासरत हैं, जिसमें दुलारी देवी उर्फ़ प्रभा शास्त्री और मैना महारानी उनकी बहुत सेवा कर रही हैं। राजेश्वर महामंडलेश्वर से जुड़ा हर व्यक्ति साहित्यकार बन ही जाता है। वैसे ही जैसे किसी के पास नक़ली डिग्री हो और वो उसकी फोटो कॉपी किसी गजेटेड अफ़सर से किसी जुगाड़ से अटेस्ट करवा ले तो तो उस डिग्री को असली टाइप का मान लिया जाता है। वैसे ही राजेश्वर महामंडलेश्वर को बढ़िया चंदा देकर कोई भी असफल साहित्यकार तुरंत कालजयी हो जाता है।
राजेश्वर महामंडलेश्वर ने लघुकथा इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में कुछ अकादमिक लोगों को भी भर्ती कर रखा है जो फ़र्ज़ी तथ्य और आँकड़े पेश करके झूठ को सत्य की तरह प्रचारित करने में माहिर हैं वो अपने झूठ को “पोस्ट ट्रुथ” जैसे सजावटी शब्द देते हैं।
वैसे तो लघुकथा विधा अभी हिंदी साहित्य में अपना मुक़ाम पाने के लिये संघर्ष कर रही है लेकिन राजेश्वर महामंडलेश्वर के एजेंट लघुकथा को साहित्य की सबसे कारगर विधा बताते हैं “जो ज़िन्दगी के साथ भी है और ज़िन्दगी के बाद भी” रहेगी।
चेले-चेलियों के चले जाने के बाद कम्पनी के एमडी मन ही मन मुस्कुरा कर कहते हैं कि “मैंने तुम लोगों को ऐसी उच्च कोटि की साहित्यिक चरस दी है जो कि कभी नहीं छूटने वाली, भले ही जान या परिवार छूट जाये।”
प्रभा जी ने तो लघुकथा के नाम पर वसीयत भी लिख दी है कि उनकी मृत्यु के बाद उनका दाह संस्कार उनका पुत्र नहीं बल्कि वो लघुकथाकार करेगा जिसने अपने जीवन में लघुकथाओं पर सबसे ज़्यादा दुत्कार पायी हो। उनकी नज़र में वो बेशर्म नहीं, बल्कि लघुकथा का योद्धा होगा।
गाँवों में इसे ही कहा जाता है कि “सौ-सौ जूता खाय, तमाशा घुसकर देखे।”
मैना महारानी जी तो और भी दो क़दम आगे निकल गयीं। उन्हें काला रंग बहुत प्रिय था। अपनी बहू की सारे काले रंग की साड़ियाँ और सलवार सूट वही पहनती रही हैं। वो काले रंग को अपने लिये लकी मानती हैं। क्योंकि जिस दिन वो काले वस्त्र पहनकर एक आयोजन में गयीं थीं तभी उनकी मुलाक़ात लघुकथा के महामंडलेश्वर से हुई थी। उन्होंने भी वसीयत की है कि जो लघुकथाकार सबसे ज़्यादा बतकट और कुतर्की होगा उसे उनके अंतिम संस्कारों में विशेष तौर से निमंत्रित किया जाये।
इन दोनों वीरांगनाओं ने अपनी वसीयत में लिखा है कि इनकी मृत्यु के बाद इनकी कर्माही में मंत्रोच्चार ना कराया जाए बल्कि लघुकथा का पाठ कराया जाए और उन लघुकथा वाचकों को किसी होटल में भोजन कराके पर्याप्त दान-दक्षिणा दी जाए। उनके छोड़े गए ज़ेवरों से एक लघुकथा का पुरस्कार शुरू किया जाये जो प्रतिवर्ष उसी को दिया जाए जिसने लघुकथा की सबसे ज़्यादा भद पिटवाई हो, बिल्कुल हॉलीवुड की “वर्स्ट फ़िल्म ऑफ़ द ईयर” की तर्ज़ पर।
कम्पनी के एमडी ने उन दोनों महिलाओं को आश्वासन दिया है कि उनकी मृत्यु के बाद मल्टी लेवल मार्केटिंग का कार्य उनके परिवार के किसी सदस्य को सौंप दिया जायेगा और एजेंटशिप का खेल पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहेगा।
प्रभा जी ने अचानक पूछा, “कितना बचा पायी मैना महारानी इस ट्रिप से?”
मैना महारानी ने चहकते हुए जवाब दिया, “पाँच हज़ार नक़द, शील्ड, अंगवस्त्र और शाल बेचकर सत्रह सौ और भी मिल गए थे।”
प्रभा जी इतराते हुए बोलीं, “मैंने पाँच हज़ार नक़द बचाया, शाल, शील्ड आदि बाईस सौ में बेचा। मैं लघुकथा की किताबों के कुछ पैकेट आयोजन स्थल से टीप लाई थी। सात सौ में उनको बेचा। कुछ लेखकों ने मुझे अपनी किताबें दी थीं, साढ़े तीन सौ रुपयों में उनको अभी स्टेशन के बुक स्टाल पर बेच दिया। और तो और दस दिन बाद के एक लघुकथा के आयोजन का निमंत्रण भी झटक लाई ।”
मैना महारानी कुछ बोल पातीं तब तक महामंडलेश्वर राजेश्वर जी आते दिखे। उनके हाथ में इन दोनों के ट्रेन के टिकट थे। उन्हें देखते ही वीरांगनाओं के चेहरे खिल उठे।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
-
- 'हैप्पी बर्थ डे'
- अँधेर नगरी प्लेब्वॉय राजा
- आईसीयू में देश
- आपको क्या तकलीफ़ है
- इंग्लिश पप्पू
- इंटरनेशनल हिंदी
- इश्तिहार-ए-इश्क़
- उस्ताद और शागिर्द
- और क्या चाहिए
- कबिरा खड़ा बाजार में
- कुविता में कविता
- कूल बनाये फ़ूल
- कोटि-कोटि के कवि
- खेला होबे
- गोली नेकी वाली
- घर बैठे-बैठे
- चाँद और रोटियाँ
- चीनी कम
- जाने से पहले
- जूता संहिता
- जेन ज़ी
- जैसा आप चाहें
- टू इन वन
- डर दा मामला है
- तब्दीली आयी रे
- तुमको याद रखेंगे गुरु
- तो क्यों धन संचय
- तो छोड़ दूँगा
- द मोनू ट्रायल
- दिले नादान तुझे हुआ क्या है
- देहाती कहीं के
- नेपोकिडनी
- नॉट आउट @हंड्रेड
- नज़र लागी राजा
- पंडी ऑन द वे
- पबजी–लव जी
- प्रयोगशाला से प्रेमपत्र
- फिजेरिया
- बार्टर सिस्टम
- बोलो ज़ुबाँ केसरी
- ब्लैक स्वान इवेंट
- माया महाठगिनी हम जानी
- मीटू बनाम शीटू
- मेरा वो मतलब नहीं था
- मेहँदी लगा कर रखना
- मोर बनाम मारखोर
- लखनऊ का संत
- लघुकथा इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
- लोग सड़क पर
- वर्क फ़्रॉम होम
- वादा तेरा वादा
- विनोद बावफ़ा है
- व्यंग्य लंका
- व्यंग्य समय
- शाह का चमचा
- सदी की शादी
- सब चंगा सी
- सबसे बड़ा है पईसा पीर
- ससुराल गेंदा फूल
- सिद्धा पर गिद्ध
- सैंया भये कोतवाल
- सैयारा का तैय्यारा
- हाउ डेयर यू
- हिंडी
- हैप्पी हिन्दी डे
- क़ुदरत का निज़ाम
- ग़म-ए-रोज़गार
- ज़रा हटके, ज़रा बचके
- कहानी
- कविता
-
- अब कौन सा रंग बचा साथी
- उस वक़्त अगर मैं तेरे संग होता
- कभी-कभार
- कुछ तुमको भी तो कहना होगा
- गंगा को अब पावन कर दो
- गुमशुदा हँसी
- जब आज तुम्हें जी भर देखा
- जब साँझ ढले तुम आती हो
- जय हनुमंत
- तब तुम क्यों चल देती हो
- तब तुमने कविता लिखी बाबूजी
- तुम वापस कब आओगे?
- दिन का गाँव
- दुख की यात्रा
- पापा, तुम बिन जीवन रीता है
- पेट्रोल पंप
- प्रेम मेरा कुछ कम तो नहीं है
- बस तुम कुछ कह तो दो
- भागी हुई लड़की
- मेरे प्रियतम
- यहाँ से सफ़र अकेले होगा
- ये दिन जो इतने उदास हैं
- ये प्रेम कोई बाधा तो नहीं
- ये बहुत देर से जाना
- रोज़गार
- सबसे उदास दिन
- हे प्राणप्रिये
- स्मृति लेख
- लघुकथा
- बाल साहित्य कविता
- सिनेमा चर्चा
- विडियो
-
- ऑडियो
-