चकरी गिरह

01-06-2026

चकरी गिरह

दीपक शर्मा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

“आपको प्रिंसीपल साहिबा ने याद किया है, मैडम,” कस्बापुर के राजकीय महिला डिग्री कॉलेज का एक चपरासी रमा के भाषण-कक्ष के दरवाज़े से बोला।

“कल मिलेंगे,” रमा ने अपनी छात्राओं को छितरा दिया और चपरासी के संग हो ली।

“आपके साहब आए हैं, मैडम,” चपरासी ने दाँत निपोरे।

“तुम्हें कैसे मालूम?” एक सिहरन ने रमा को अपनी मूठ में ले लिया।

“बोल रहे थे, मिसेज़ रमा दीक्षित मेरी वाइफ़ हैं,” चपरासी हँसा।

“और क्या बोले?” सशंक हो कर रमा ने पूछा। नाटकीयता और नोक-झोंक रमेश के व्यवहार का हिस्सा थीं।

“और जो बोले अंग्रेज़ी में बोले,” चपरासी फिर हँसा, “शायद कोई चुटकला भी। जिसे सुन कर प्रिंसीपल साहिबा भक्क से हँस भी पड़ीं . . .”

अजनबियों पर असर डालने के लिए रमेश अक्सर चुटकलों का सहारा ले लिया करता।

♦ ♦

“कुक्कू कैसा है?” रमेश एक आतुर पिता का चेहरा लगाए था।

नीली बारीक़ धारियों वाले गर्म सूट के साथ रमेश ने लाल गोलाकार ख़ाकों वाली काली टाई पहन रखी थी और उसी टाई के सेट का वैसा ही रुमाल उसके कोट की ऊपर वाली जेब से बाहर झाँक रहा था।

“कुक्कू ठीक है,” अपने चेहरे पर रमा एक मुस्कुराहट ले आई, “मगर आप कैसे आए?”

“लखनऊ तक हवाई जहाज़ से। और लखनऊ से अपने एक बैच-मेट की कार से . . .”

कस्बापुर रमेश पहली बार आया था। यहाँ अपनी यह नौकरी रमा ने पिछले माह और एक दिन पहले ही शुरू की थी। एक नवंबर को। पिछले वर्ष मिली कुक्कू के जन्म पर मिली अपनी मैटर्निटी लीव जब उस ने बढ़ावाई थी तो राज्य सरकार ने उसकी बदली इधर कस्बापुर में कर दी थी।

“हम आपकी कमी महसूस करेंगे, मिसेज़ दीक्षित,” प्रिंसीपल मुस्कुराई, “अभी कल ही तो मेरे दफ़्तर ने आपकी पहली तनख़्वाह आपके खाते में जमा करवाई थी . . .”

“मगर मैं कहाँ जा रही हूँ?” रमा ने हैरानी जतलाई।

“मिस्टर दीक्षित उधर मुंबई से आप का त्यागपत्र टाइप करवा कर लाए हैं,” प्रिंसीपल की मुस्कान वृहत हो ली।

रमा जानती थी, उसकी छुट्टी के दौरान इन्हीं प्रिंसीपल की बहू उसकी लीव वेकेंसी के अंतर्गत उसका ‘इतिहास’ विषय वहाँ पढ़ाती रही थी और अब रमा का त्यागपत्र उन की बहू को वहीं इसी कॉलेज में स्थायी पद दिलाने का अच्छा अवसर प्रदान कर सकता था।

“हर अच्छा समय एक दिन समाप्त होता ही है,” रमेश ने प्रिंसीपल की दिशा में अपनी एक आँख मिचकाई।

“मिस्टर दीक्षित सोचते हैं आपके बेटे को वहाँ मुम्बई में रहना चाहिए। इधर कस्बापुर में नहीं,” प्रिंसीपल के चेहरे की चमक असामान्य थी, “और मैं भी सोचती हूँ दुनिया में सब से बड़ा सुख गृहस्थ होने ही में है।”

“इस त्यागपत्र पर तुम अपने हस्ताक्षर कर दो,” रमेश ने एक काग़ज़ उसकी ओर बढ़ा दिया।

रमा ने काग़ज़ पर नज़र दौड़ाई। उसकी तरफ़ से एक त्यागपत्र था। इस नौकरी से हमेशा छुट्टी पाने का।

“मैं अभी सोचना चाहती हूँ,” प्रिंसीपल के सामने वह कोई नाटक नहीं चाहती थी और उस ने वह टाइपड काग़ज़ मोड़ कर अपने पर्स में रख लिया।

“तुम्हें ज़रूर मुम्बई चले जाना चाहिए,” प्रिंसीपल ने रमेश की ओर देखा।

“कुक्कू और मैं अभी यहीं रहेंगे,” रमा ने अपना स्वर कड़ा कर लिया, “कम-अज़-कम दिसंबर की छुट्टियाँ शुरू होने तक।”

प्रिंसीपल के चेहरे की चमक लुप्त हो गई।

“काश, कोई तो ऐसा होता जो इसे अच्छी सीख दिए होता . . .” रमेश ने अपनी झल्लाहट प्रकट करने के लिए अपना सिर दोनों हाथों से ढाँप लिया।

“अपनी ससुराल में किसी को ढूँढ़िए,” प्रिंसीपल ने अपने होंठ सिकोड़े।

“नो चांस,” रमेश ने अपने कंधे उचकाए, “मेरी ससुराल के नाम पर मेरे पास केवल एक विधवा सास है, जिनकी नौकरी ने उन्हें अपने मायके से भी दूर कर रखा है और अपनी ससुराल से भी . . .”

“मैं आप से बाद में मिलती हूँ,” निर्णायक भाव से रमा प्रिंसीपल के दफ़्तर के दरवाज़े की ओर बढ़ ली।

रमेश के माँगे की सरकारी कार कॉलेज के गेेट पर खड़ी थी।

रमा को रमेश के साथ आते देख कर ड्राइवर ने उसे पहले सलाम ठोंका और फिर उसके लिए गाड़ी का दरवाज़ा खोला।

वह गाड़ी में बैठ ली। बेआराम उस चुप्पी के साथ, जो वह रमेश और अपने बीच झगड़ा टालने के वास्ते ओढ़ लिया करती।

“किधर जाएँगे, साहब?” ड्राइवर ने गाड़ी सँभाली।

“गाड़ी पीछे मोड़नी पड़ेगी,” रमा ने कहा, “कुक्कू का क्रैच दायीं तरफ़ पड़ेगा।” 

“देखें, तुम्हारी पासबुक देखें,” शीघ्र ही रमेश ने अपना संचालन प्रारंभ कर दिया।

“लीजिए,” रमा अपनी चेकबुक अपने पर्स में ही रखा करती।

“दस हज़ार?” बीच की एक प्रविष्टि देख कर रमेश को बिजली छू गई, “एक साथ? किसे दिया?”

“कुक्कू की प्रैम ख़रीदी थी। उसे क्रैच में दाख़िल करवाना था। और फिर थोड़ा-बहुत अपने कमरे के लिए ख़रीदना था।”

“तुम अपने को इधर कुछ ज़्यादा ही भाव नहीं दे रही क्या?” रमेश की भौंहों ने उसका माथा सिकोड़ दिया, “कुक्कू के लिए आया भी, क्रैच भी और प्रैम भी?”

“वह आया कोई आया नहीं। यहीं के चौकीदार की बेटी है। यही कोई पंद्रह-सत्तरह साल की। उसके भरोसे कुक्कू को वहाँ होस्टल में नहीं छोड़ा जा सकता था . . .”

“और वह क्रैच वाली?”

“वह प्रोफ़ैशनल है। बच्चों को अपनी ज़िम्मेदारी पर अपने पास रखती है और उन की सुरक्षा की पूरी गारंटी देती है . . .”

“बस्स फ़ीस ही तो लेती है। तिस पर ज़ोर देती है। बच्चे को प्रैम में लाओ। कितने की मिली?”

“छः हज़ार की . . .”

“माँ तुम्हारी विधवा रही सो उसकी फ़िज़ूलख़र्ची चल गई मगर तुम्हारा पति तो अभी मौजूद है। तुम्हारे लिए तो उसकी मर्ज़ी जानना ज़रूरी है . . .”

ग़ुस्से में रमेश अक्सर भूल जाता रमा की माँ उधर कानपुर की आई.आई.टी. में उसकी गुरु रह चुकी थीं जहाँ से एम.एससी. के दूसरे वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते वह भारतीय राजस्व सेवा में निकल लिया था। और रमा के संग विवाह का प्रस्ताव रमेश ही की ओर से आया था, रमा की माँ की ओर से नहीं।

“आए एम सौरी,” रमा ने अपना स्वर तिगुना विनीत कर लिया, “असल में कुक्कू के लिए रखी गई उस लड़की से वह उठाए नहीं बन रहा था। तो मैं ने सोचा, प्रैम सही रहेगी। आगे से ऐसा कभी नहीं होगा . . .”

♦ ♦

“कुक्कू उधर पालने में सो रहा है,” क्रैच की स्वामिनी ने उन दोनों को स्वागती मुस्कान दी।

अपने ग्राहक-गण के साथ वह अतिरिक्त शिष्टता दिखाया करती और उन के बच्चों के साथ अतिरिक्त ऊष्मा।

“कुक्कू कब सोया, जमना?” कुक्कू के पास जमना बैठी थी। चौकीदार की बेटी। एक रखवाले की भाँति।

“सवा ग्यारह पर,” जमना ने सामने लगी दीवार-घड़ी देखी, “अभी पंद्रह मिनट ही हुए हैं।”

“कुक्कू! कुक्कू! कुक्कू!” रमेश कुक्कू पर झुक लिया।

“इसे जगाइए नहीं,” रमा ने टोका। नींद “नींद के बीच जगाएँगे तो रोने लगेगा,” जमना ने जोड़ा।

“कुक्कू,” रमेश ने सीटी बजाई। उसे सीटी बजानी ख़ूब अच्छी आती थी, “देखो, कुक्कू, तुम्हारे पापा आए हैं . . .”

कुक्कू ने अपनी आँखें खोलीं और टुुकर-टुकर रमेश की ओर देखने लगा।

अपनी सीटी में रमेश वही धुन ले आया, जिस का समस्वरित गीत उधर मुम्बई में कुुक्कू को वह अक्सर सुनाया करता।

कुक्कू ने कलकला कर रमेश की ओर अपनी बाँहें फैला दीं।

“अपने बियाड़ को तो बच्चा भी पहचान लेता है,” क्रैच की स्वामिनी हँसने लगी।

“इसकी प्रैम लाओ,” रमेश ने जमना को आदेश दिया।

प्रैम में कुक्कू को बिठला कर रमेश गाड़ी पर जा पहुँचा।

“लो, यह बच्चा-गाड़ी उधर गाड़ी की डिक्की में रखो,” रमेश ने कुक्कू को अपनी बाँहों में ले लिया और गाड़ी के अंदर जा बैठा।

“किधर जाएँगे, साहब?” ड्राइवर ने पूछा।

“वापस उसी कॉलेज,” रमा गाड़ी में बैठ ली, “मगर अब गाड़ी तुम कॉलेज के गेट पर मत रोकना। कॉलेज के पिछवाड़े ले जाना। मेरा होस्टल उधर है।”

“आओ, जमना,” रमा ने जमना को पुकारा, “इधर मेरे पास आओ। पिछली सीट पर।”

“तुम्हारा नाम बढ़िया है, जमना,” जैसे ही गाड़ी स्टार्ट हुई, रमेश ने जमना से कहा।

“जी . . .,” जमना शरमा गई।

“अच्छा बताओ, तुम कहाँ तक पढ़ी हो?” 
“जी, पाँच दर्जा तक . . .”

“जानती हो, किस महीने में अट्ठाईस दिन होते हैं?”

“फरवरी में,” जमना उत्सुुक हो आई।

“मूर्खा,” रमेश ठठाया, “अट्ठाईस दिन तो सभी महीनों में होते हैं . . .”

जमना झेंप गई।

होस्टल के अंदर गाड़ी के प्रवेश पाते ही रमेश ने ड्राइवर से कहा, “प्रैम अभी डिक्की ही में रहेगी, बेटे के साथ अभी बाहर घूमने जाएँगे . . .”

“जी,” ड्राइवर ने उत्तर दिया।

रमा के होस्टल में रसोई सब से पहले पड़ती थी, फिर वार्डन का कमरा और फिर दो और अध्यापिकाओं के कमरों को छोड़ कर तीसरा कमरा रमा का था।

“आप ज़रूर मिस्टर दीक्षित हैं,” उन्हें देखते ही वार्डन अपने कमरे से बाहर निकल कर उन के साथ हो ली।

“जी,” रमेश ने वार्डन को एक प्रशस्त मुस्कान दी।

“यह सरला जी हैं,” रमा ने वार्डन के प्रति तनिक चाव न दिखाया।

बातूनिया व घरघुसनी वह वार्डन हर किसीके विवाहित जीवन में अतिरिक्त दिलचस्पी दिखलाया करती। उसकी अपनी शादी एक साल के अंदर ही टूट गई थी, किन्तु अपने तलाक़ के पाँच साल बाद भी उस ने अपने पुनर्विवाह की अपनी योजना को लोप न होने दी था।

“मैं यहाँ के होस्टल की वार्डन हूँ,” वह रमा के कमरे की ओर बढ़ आई।

“आप का नाम गिनीज़ बुक में भेजना होगा,” उन स्त्रियों के प्रति रमेश अतिरिक्त सदयता अवश्य प्रदर्शित करता, जिन्हें रमा नापसंद किया करती, “मुझे यक़ीन है दुनिया की सब से कम-उम्र वार्डन आप हैं . . .”

“मुझे बनाइए मत,” वार्डन रमेश पर रीझ गई, “आप बताइए, आप यहाँ कैसे आए?”

“कुक्कू को लेने आया हूँ,” रमेश हँसा।

“अच्छा! बहुत अच्छा!!” वार्डन रमा की ओर देख कर हँस पड़ी।

“आइए,” रमा ने अपने कमरे का ताला खोला, “अंदर कमरे में बैठते हैं।”

“आप भी आइए,” रमेश ने वार्डन को निमंत्रण दिया।

एकांत में रमा का सामना करना रमेश को मुश्किल लगता। रमा के प्रति जिस सौहार्द अथवा मित्र-भाव का वह एक समूह के सामने प्रदर्शित कर सकता, वह एकांत में काफ़ी न रहता। 

“ओह!” कमरा खुलते ही पहले रमेश अंदर गया, “ए रूम! ए रूम ओव वनज़ ओन (कमरा! अपना निजी कमरा . . .!! ) ” 
“रमा मैैडम ने अपना यह कमरा ख़ूब सजा रखा है,” वार्डन बोली, “खिड़कियों में पर्दे टँगे हैं और चारपाइयों पर बढ़िया चादर बिछी हैं . . .”

अपने कमरे में रमा ने दो मेज़ें और एक कुर्सी भी डलवा रखी थीं। एक मेज़ पर कुक्कू के दूध और उसके अपने नाश्ते का सामान जमा था और दूसरी पर उसके उसके पढ़ने का।

“ये पर्दे और ये बिस्तर मुझे माँ ने दिए हैं,” रमा ने रमेश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहा।

“ख़ूब!” रमेश ने अपनी भौंहें ऊपर कीं, “बहुत ख़ूब!! इस कमरे में मैं कहीं नहीं हूँ . . . इस कमरे के पर्दे, इस कमरे के खिड़की-दरवाज़े, इस कमरे के कुर्सी-मेज़, इस कमरे के बिस्तर मुझे नहीं जानते . . . यह एक स्त्री का कमरा है . . . ए रूम औव हर ओन . . .(उसका अपना निजी कमरा . . .)”

“मैं चाय बना रही हूँ,” बिजली की केतली का प्लग रमा ने स्विच बोर्ड में लगा दिया।

“इधर देखिए,” रमा ने रमेश की ओर देखा, “यहाँ मेरे साथ आते समय माँ ने मुझे आर्मी कैंटीन से भी यह ढेर-सा सामान भी दिलवा दिया था। यह केतली, यह टोस्टर, यह जूसर-मिक्सचर, ये चाय की टवाइनिंगज़, यह कॉफ़ी, यह मिल्क स्प्रे, यह पैस्चराइज़ड चीज़ . . .”

चीन के संग हुई भारत की एक झड़प के दौरान ‘मिसिंग’ क़रार कर दिए गए रमा के पिता फ़ौज में कप्तान रहे थे और अब भी उसकी माँ अपनी ज़रूरत के कई सामान फ़ौज की कैंटीन से कम दामों पर ख़रीदा करतीं।

“ख़ूब!” रमेश ने अपनी भौंहैं फिर अपने माथे पर चढ़ा लीं, “बहुत ख़ूब!! इस कमरे से उन्होंने तुम्हें दोबारा ब्याह दिया . . . ”

“अपने ब्याह पर आपको बस यही कुछ मिला क्या?” वार्डन ने रमेश को कंधे पर चढ़ाने की चेष्टा की।

“बताइए आप,” रमा ने रमेश को चुनौती दी, “बताइए। आपको शादी पर क्या मिला और क्या नहीं मिला?”

“रमा मैैडम से आपकी शादी आपके सर्विस में आने से पहले हुई क्या?” वार्डन रमेश की ओर मुड़ ली।

“आपको क्या लगता है?” अपने मन का गवाक्ष खोलना रमेश के लिए असम्भव रहा।

केेवल यह वार्डन ही नहीं, वह किसी और को भी अब नहीं बताना चाहता था चार साल पहले जब वह रमा की माँ के आई.आई.टी. वाले फ़्लैट में जा खड़ा हुआ था, रमा उस समय कानपुर के सरकारी स्नातक कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर चुकी थी।

नहीं बताना चाहता था, रमेेश ने वहाँ उसकी माँ से कहा था,”मैम, अगले सप्ताह मुझे अपनी राजस्व सेवा के अन्तर्गत अपने नाम अलौट हुए सरकारी मकान का कब्ज़ा लेना है। लेकिन उस मकान में मैं रमा के साथ प्रवेश करना चाहता हूँ, अकेले नहीं।”

नहीं बताना चाहता था, वह रमा की माँ का विश्वासपात्र व मनपसंद छात्र रहा था और जानता रहा था उसके नाम अलौट हुए जिस मकान के लिए जिन सुचारु प्रावधानों की ज़रूरत उसे रही थी, वह रमा की माँ के एफ़.डीज़. से ख़रीदे जा सकते थे।

नहीं बताना चाहता था, उसी दिन के चौथे दिन कानपुर के एक मंदिर में उन की शादी सम्पन्न हो गई थी।

नहीं बताना चाहता था वर पक्ष की ओर से केवल रमेश के विधुर पिता आए थे जो एक सरकारी मिल में लेबर सुपरवाइज़र थे।

“आपके सर्विस में आने से पहले ही हुई होगी,” वार्डन हँसी, “वरना हमने तो सुन रखा है आप अफ़सर लोग शादी में आध-पौन करोड़ के नीचे बात नहीं करते . . .”

“कैसा आध-पौन करोड़?”

“हमें तो विश्वास ही नहीं होता आप जैसे देवपुरुष आज के कलियुग में सम्भव हैं . . .”

“मैडम की किताबें भी देख ली जाएँ,” अचकचा कर रमेश रमा के पढ़ने वाली मेज़ की ओर बढ़ लिया।

“एक मिनट,” रमा ने मेज़ पर रखी अपनी डायरी झपट ली।

“क्या है इस में?” रमेश के माथे पर नई त्यौरी आ बैठी, “द होल ट्रूथ? (पूरा सच)? रैविलेशन्ज़? (रहस्योदघाटन)? औंद्रे मौलोरो ने एक जगह कहा है न, हमारा वास्तविक सत्व वह है जो हम दूसरों से छिपाते हैं!”

“मैं वौशरूम से हो कर अभी आती हूँ,” रमा ने कहा और जमना को आवाज़ दी, “तुम कुक्कू का जाँघिया बदलो . . .”

कुक्कू का वह सिंथेटिक जाँघिया उतारना ज़रूरी था। जिसे वह उसे केवल बाहर ले जाते समय पहनाती थी।

♦ ♦

डायरी के कुछ और पन्ने फाड़ने अभी बाक़ी थे, जब रमा को रमेश वाली गाड़ी के दरवाज़े खुलने और बंद होने की आवाज़ आई . . .

एक बार . . .

दो बार . . .

तीन बार . . .

चार बार . . .

अपनी गाड़ी की झाड़-पोंछ ड्राइवर यहाँ कर रहा था क्या?

लेकिन नहीं।

एकाएक गाड़ी स्टार्ट हुई और चल पड़ी।

रमा की उत्सुकता बाहर खुलने वाले वौशरूम के दूसरे दरवाज़े से उसे बाहर ले आई।

उसके कमरे के बाहर जमना हँस रही थी।

“क्या हुआ?” उस ने जमना से पूछा।

“आपके साहब आपका सारा सामान गाड़ी में ले कर चले गए हैं . . .”

“कुुक्कू कहाँ है?” हकबकाई रमा कमरे के अंदर चली आई।

कुक्कू वहाँ नहीं था।

दोनों मेज़ और दोनों चारपाइयाँ ख़ाली थीं।

खिड़कियों के पर्दे भी नदारद थे।

रमा आलमारी की तरफ़ बढ़ ली। उसके पर्स समेत उस में धरीं सभी चीज़ें भी ग़ायब थीं।

चुपचाप वह अपनी कुर्सी पर बैठ गई। और अपनी माँ का मोबाइल मिलाने लगी। 

“रमा मैडम, मेरे ख़्याल से तो आपको एफ़.आई.आर. दर्ज करानी चाहिए,” वार्डन और प्रिंसीपल उसके कमरे में आन घुसीं थीं, “उस डाकू के ख़िलाफ़ तो मैं भी गवाही दूँगी . . .”

“बोलो, रमा,” प्रिंसीपल ने पूछा, “तुम क्या चाहती हो? पुलिस बुलाऊँ क्या?”

“नहीं मै’म,” रमा ने उत्तर दिया, “यह सब उन्होंने मुझे अपने साथ मुम्बई ले जाने के लिए किया है . . .”

“लेकिन रमा मैडम,” वार्डन ने आपत्ति जताई, “यह कौन तरीक़ा हुआ?”

“यह रमा का निजी मामला है,” प्रिंसीपल ने अपने कंधे झटकाए, “उसके निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगाने का अधिकार हमारे पास नहीं . . .” 

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