उल्टी क़लम
सुनील कुमार शर्मा
“. . .वो ज़मीन के काग़ज़ आपने देख लिए हैं?” बोधराज ने वकील से सीधा सवाल किया।
“हाँ देख लिए हैं . . . इस ज़मीन के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटना आपके बस की बात नहीं है; क्योंकि इसमें ख़र्चा भी होता है, और दिहाड़ी भी ख़राब होती है; इसलिए मैंने सोचा है—आप से पॉवर ऑफ़ अटार्नी लेकर इस ज़मीन का मैं केस लड़ूँगा। जब ज़मीन मिल जाएगी तो मैं उसे अपने नाम करवा लूँगा। जो थोड़े-बहुत पैसे आपके बनते हैं, वो मैं आपको अभी दे देता हूँ . . . आप इन काग़ज़ों पर अँगूठा लगा दीजिए . . .” कुछ काग़ज़ों को मेज़ पर रखते हुए, वकील ने बात को काफ़ी घुमा-फिरा कर उसे समझाया।
जिसे सुनकर, बोधराज आपे से बाहर हो गया, “. . . मेरी घरवाली ने रिश्तेदार समझकर, आपको काग़ज़ दिखाये थे और आपने . . . मुझे कुछ लेना-देना नहीं है, आप मेरे काग़ज़ वापस कर दें।”
“अब इन काग़ज़ों से तुम्हारा कुछ नहीं बन सकता; क्योंकि इनपर तो उल्टी क़लम फिर गई है,” वकील बड़ी बेशर्मी से बोला।
“उल्टी क़लम?” बोधराज हँस पड़ा, “ओ वकील साब! इस ज़मीन-जायदाद के मालिक भी वकील थे। उन्होंने, तेरी तरह ना जाने कितने लोगों की ज़मीनों पर उल्टी क़लमें फेरी होंगी। उन्हें क्या पता किसकी हाय लगी है; जो उनकी सारी ज़मीन-जायदाद का वारिस मैं ही बचा हूँ। इसीलिए मैंने मेहनत-मज़दूरी की, ग़रीबी में दिन काटे पर इस श्रापित ज़मीन-जायदाद को अपने नाम करवाने की कोशिश नहीं की . . . और इसके काग़ज़ों को वर्षों तक छुपाए रखा, जिन्हें अब लालच में आकर मेरे बीवी-बच्चों ने, आपको दे दिया है . . . और आपने उनपर उल्टी क़लम फेर दी; जबकि इनपर तो पहले से ही परमात्मा की उल्टी क़लम फिरी हुई है।”
जिसे सुनकर, वकील के पसीने छूट गए।
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