चरित्र-विचार से व्यवहार तक
सुनील कुमार शर्मा
(मानव चरित्र को व्याख्यायित करता आलेख-सुशील शर्मा)
समाज में जब भी “चरित्र” शब्द उच्चारित होता है, प्रायः उसका अर्थ स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की मर्यादा तक सीमित कर दिया जाता है। किसी व्यक्ति के चरित्र का मूल्यांकन करते समय लोग सबसे पहले उसके निजी सम्बन्धों की ओर देखते हैं, मानो चरित्र का संपूर्ण भवन केवल इसी एक स्तंभ पर टिका हो। यह दृष्टि न केवल अधूरी है, बल्कि चरित्र जैसे व्यापक और बहुआयामी विषय के साथ अन्याय भी है।
वास्तव में चरित्र मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की वह आभा है, जो उसके विचारों, व्यवहार, संवेदनाओं, निर्णयों, आदतों, सामाजिक दृष्टिकोण, नैतिकता और आत्मिक स्तर से निर्मित होती है। चरित्र केवल शरीर की मर्यादा नहीं, बल्कि चेतना की गुणवत्ता है। यह व्यक्ति के भीतर बसे उस अदृश्य मनुष्य का परिचय है, जो परिस्थितियों के बदल जाने पर भी अपने मूल स्वरूप को बचाए रखता है।
दुर्भाग्य से समाज ने चरित्र की परिभाषा को इतना संकुचित कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति आर्थिक छल करता हो, झूठ बोलता हो, विश्वास तोड़ता हो, दूसरों का अपमान करता हो, अवसरवादिता में डूबा हो, परन्तु उसके निजी सम्बन्धों पर कोई प्रश्नचिह्न न हो, तो उसे “चरित्रवान” मान लिया जाता है। दूसरी ओर यदि किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन को लेकर कोई चर्चा उठ जाए, तो उसके समस्त गुणों को नकार दिया जाता है। यह दृष्टिकोण हमारे सामाजिक विवेक की सीमितता को प्रकट करता है।
चरित्र का पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण आयाम है स्वभाव मनुष्य का स्वभाव उसके भीतर की वास्तविक संस्कृति का दर्पण होता है। कोई व्यक्ति कितना विनम्र है, कितना धैर्यवान है, दूसरों की पीड़ा को कितना समझता है, क्रोध और अहंकार पर कितना नियंत्रण रखता है, ये सभी बातें उसके चरित्र को परिभाषित करती हैं। एक कठोर, अपमानजनक और अहंकारी व्यक्ति यदि केवल सामाजिक छवि के कारण “चरित्रवान” कहलाए, तो यह चरित्र शब्द का अपमान है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है परिवेश मनुष्य जिस वातावरण में पलता है, वह उसके चरित्र निर्माण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार की भाषा, घर का व्यवहार, समाज का वातावरण, मित्रों का प्रभाव और जीवन की परिस्थितियाँ व्यक्ति के भीतर मूल्य गढ़ती हैं। यदि किसी बच्चे के सामने लगातार छल, अपमान, स्वार्थ और अवसरवाद का वातावरण रहेगा, तो उसके भीतर वही संस्कार विकसित होंगे। इसलिए चरित्र केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।
चरित्र का तीसरा आधार है, आदतें। मनुष्य का चरित्र उसके बड़े अवसरों से नहीं, उसकी छोटी-छोटी आदतों से पहचाना जाता है। समय की पाबंदी, वचन का पालन, श्रम के प्रति सम्मान, स्वच्छता, अनुशासन, दूसरों के प्रति व्यवहार ये सब मिलकर चरित्र का निर्माण करते हैं। जो व्यक्ति सार्वजनिक मंचों पर आदर्शों की बातें करता हो, परन्तु निजी जीवन में असभ्य और असंवेदनशील हो, उसका चरित्र केवल अभिनय है।
चरित्र का एक अत्यंत गहरा आयाम है, संवेदनशीलता। आज समाज में बुद्धिमान लोग बढ़ रहे हैं, पर संवेदनशील लोग कम होते जा रहे हैं। किसी रोते हुए मनुष्य के दुःख को महसूस कर पाना, किसी असहाय की सहायता के लिए आगे बढ़ना, किसी छोटे कर्मचारी या श्रमिक के आत्मसम्मान का ध्यान रखना ये सब चरित्र के लक्षण हैं संवेदनहीन व्यक्ति चाहे कितना भी सफल क्यों न हो, भीतर से अधूरा रहता है।
इसी प्रकार बुद्धि और विवेक भी चरित्र का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। बुद्धि व्यक्ति को सफल बना सकती है, पर विवेक उसे सही दिशा देता है। केवल चतुर होना पर्याप्त नहीं; यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी बुद्धि का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करता है। आज अनेक लोग अत्यंत बुद्धिमान हैं, परन्तु उनकी बुद्धि छल, शोषण और स्वार्थ की सेवा में लगी है। ऐसे लोगों को सफल कहा जा सकता है, चरित्रवान नहीं।
चरित्र का सम्बन्ध निर्णय लेने की क्षमता से भी है। मनुष्य का वास्तविक चरित्र संकट की घड़ी में प्रकट होता है। जब लाभ और सत्य के बीच चयन करना हो, जब भीड़ और न्याय के बीच निर्णय लेना हो, जब सुविधा और नैतिकता आमने-सामने खड़ी हों तब जो व्यक्ति सही का साथ देता है, वही चरित्रवान कहलाने योग्य है।
चरित्र का एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक पक्ष भी है व्यवहार। समाज में हम दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, यह हमारे चरित्र का स्पष्ट परिचायक है। जो व्यक्ति अपने से शक्तिशाली लोगों के सामने विनम्र और कमज़ोरों के सामने कठोर हो, उसका चरित्र केवल मुखौटा है। वास्तविक चरित्र वही है, जिसमें समानता और सम्मान की भावना हो।
आज के समय में चरित्र का एक नया संकट दिखाई देता है डिजिटल चरित्र का संकट सोशल मीडिया ने मनुष्य को दो हिस्सों में बाँट दिया है, एक वास्तविक और दूसरा प्रदर्शनकारी। लोग आभासी संसार में आदर्शवाद की बातें करते हैं, पर वास्तविक जीवन में सम्बन्धों, मूल्यों और ज़िम्मेदारियों से दूर भागते हैं। डिजिटल लोकप्रियता को चरित्र का प्रमाण मान लेना अत्यंत ख़तरनाक प्रवृत्ति है। किसी व्यक्ति के अनुयायियों की संख्या उसके नैतिक स्तर का मापदंड नहीं हो सकती।
चरित्र का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम है, आर्थिक ईमानदारी। जो व्यक्ति रिश्वत लेता हो, दूसरों का अधिकार मारता हो, कर चोरी करता हो, श्रमिकों का शोषण करता हो, परन्तु सामाजिक मंचों पर नैतिकता की बातें करे वह चरित्रवान नहीं हो सकता। चरित्र केवल निजी जीवन की मर्यादा नहीं, सार्वजनिक जीवन की पारदर्शिता भी है।
इसके अतिरिक्त चरित्र का सम्बन्ध आध्यात्मिक स्तर से भी है आध्यात्मिकता का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि भीतर की जागरूकता है। यह समझ कि हम जो भी करते हैं, उसका प्रभाव दूसरों के जीवन पर पड़ता है। जो व्यक्ति भीतर से जाग्रत होता है, वह दूसरों को चोट पहुँचाकर सुखी नहीं रह सकता। आध्यात्मिकता मनुष्य को विनम्र बनाती है, क्योंकि वह समझने लगता है कि अहंकार अंततः मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता है।
चरित्र का सम्बन्ध कर्त्तव्यबोध से भी है। एक शिक्षक का चरित्र केवल उसके ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थियों के प्रति समर्पण से आँका जाना चाहिए। एक चिकित्सक का चरित्र उसके व्यवहार और सेवा भावना में दिखाई देता है। एक राजनेता का चरित्र उसके भाषणों में नहीं, उसके निर्णयों में झलकता है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का चरित्र उसके कर्त्तव्य के प्रति ईमानदारी से जुड़ा होता है।
आज समाज का सबसे बड़ा संकट यही है कि उसने चरित्र को बाहरी छवि तक सीमित कर दिया है। लोग “क्या दिखाई दे रहा है” पर अधिक ध्यान देते हैं, “क्या सच है” पर कम परिणामस्वरूप चरित्र की जगह छवि ने ले ली है। लोग अच्छे बनने से अधिक अच्छा दिखने की चिंता करने लगे हैं।
वास्तव में चरित्र कोई एक घटना नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह प्रतिदिन के छोटे निर्णयों से निर्मित होता है। यह तब दिखाई देता है जब कोई व्यक्ति बिना स्वार्थ के सहायता करता है, जब वह अकेले में भी ईमानदार रहता है, जब वह अधिकार मिलने पर भी विनम्र बना रहता है, जब वह दूसरों की असफलता पर उपहास नहीं करता, और जब वह सफलता मिलने पर अहंकार में नहीं डूबता। चरित्र का सबसे सुंदर रूप यह है कि वह बिना घोषणा के दिखाई देता है। सुगंध की तरह। उसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अंततः यह समझना आवश्यक है कि चरित्र केवल स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की मर्यादा का नाम नहीं है। वह मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का नैतिक और मानवीय विस्तार है। उसमें सत्यनिष्ठा है, संवेदना है, आत्मसंयम है, न्यायप्रियता है, कर्त्तव्यबोध है, करुणा है, विवेक है और सबसे बढ़कर मनुष्यता है।
जिस समाज में चरित्र की परिभाषा व्यापक होगी, वहाँ मनुष्य भी व्यापक होगा। और जहाँ चरित्र को केवल शरीर तक सीमित कर दिया जाएगा, वहाँ आत्मा धीरे-धीरे सिकुड़ने लगेगी।
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