नाला

सुनील कुमार शर्मा  (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

चुनाव जीतकर, बना नया सरपंच शिकायत लेकर बी.डी.ओ. साब के पास पहुँच गया, “साब! मैंने जब पिछली पंचायतों के काग़ज़ात देखे तो मैं हैरान रह गया। उन काग़ज़ों में, मेरे गाँव के छोटूराम के घर से रामदीन के बाड़े तक की गली के साथ-साथ, पंचायत ने तीस साल पहले एक नाला खुदवाया था। बक़ायदा, उस नाले की खुदाई पर होने वाला मंज़ूर हुआ ख़र्चा भी उन काग़ज़ों में दर्ज है। जबकि, वास्तव में उस गली में कोई नाला है ही नहीं। फिर भी हर साल बरसात के मौसम में होने वाली उस नाले की सफ़ाई का मंज़ूर हुआ ख़र्चा भी उन काग़ज़ों में दिखाया गया है। मेरी समझ में नहीं आ रहा आख़िर माजरा क्या है?”

“अभी तुम नए-नए सरपंच बने हो; इसलिए तुम्हें यह माजरा समझ में नहीं आ रहा है . . . थोड़े दिनों में सब समझ जाओगे।” बी.डी.ओ. साब भेदभरी हँसी हँसते हुए बोले, “. . . अगर तुम्हें उस नाले से दिक़्क़त है, जो काग़ज़ों में है . . . ऑन ग्राउंड नहीं है; तो तुम यह काम करो, पंचायत की तरफ़ से यह अप्लिकेशन लिखो—मेरे गाँव में फ़लाँ के घर से फ़लाँ के घर तक गली में एक गन्दा नाला है। जिसकी दुर्गन्ध से गली वालों का बुरा हाल है। उस नाले की गन्दगी में पैदा होने वाले मक्खी-मच्छरों से गाँव में बीमारी फैल जाने का ख़तरा है। अतः श्री मान जी से अनुरोध है कि इस नाले को तुरंत भरवाया जाए।

यह एप्लिकेशन, मोहर लगाकर हस्ताक्षर करके मेरे पास भेज देना। फिर पंचायत सचिव उस नाले का मुआयना करके मुझे रिपोर्ट देगा।”

“फिर क्या होगा?” सरपंच ने उत्सुकता से पूछा।

“. . . फिर यह होगा, जो नाला तीस साल पहले काग़ज़ों में खुदा था। वो काग़ज़ों में ही भर जाएगा। जिसे भरवाने के लिए मिट्टी, मज़दूरी आदि का जो ख़र्चा मंज़ूर होगा उसमें से चुपचाप तुम्हारा हिस्सा तुम्हें मिल जाएगा।” बी.डी.ओ. साब ने सरपंच को समझाया।

जिसे सुनकर, सरपंच बनते ही मोटी रक़म मिलने की आशा से, सरपंच की बाँछें खिल उठी; क्योंकि चुनाव में उसने जो ख़र्च किया था, उसे पूरा करने का तो उसका हक़ बनता था। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा
कविता
सांस्कृतिक कथा
ग़ज़ल
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में