एक कुम्हार ने कोई अपराध कर दिया था। उसे राजा के सामने पेश किया गया। राजा ने उसके अपराध के हिसाब से, उसे गधे पर बिठाकर सारे नगर में घुमाने का, सिपाहियों को आदेश दिया। जब सिपाही, कहीं से गधा मँगाने पर विचार कर रहे थे, तो कुम्हार बोला, “. . . आप मेरे घर से गधा ले आओ।”
तब एक सिपाही कुम्हार के घर गया। थोड़ी देर बाद कुम्हार का लड़का सिपाही के साथ गधा लेकर आ गया। और वह गधे की रस्सी कुम्हार को पकड़ाकर वापस चला गया। कुम्हार गधे पर बैठकर, वैसे ही चलने लगा जैसे हर रोज़ चलता था। राजा के सिपाही उसके दोनों और चलने लगे। लोग हैरान थे—आज इस कुम्हार के साथ-साथ राजा के सिपाही क्यों चल रहे हैं?
नगर के मुख्य मार्ग पर चलते हुए, जब धूप निकल आई और गर्मी हो गई; तो कुम्हार सिपाहियों से बोला, “आप इस वृक्ष के नीचे विश्राम कीजिए, मैं नगर का चक्कर लगाकर यहीं पर आ जाऊँगा।”
सिपाहियों को कुम्हार की बात पसन्द आई। वे उस वृक्ष की छाया में बैठकर बाते करने लगे। इतने में कुम्हार नगर में घूमकर वापस आ गया। फिर वे उठकर, राजमहल की और चल दिए। और कुम्हार उसी गधे पर बैठा हुआ अपने घर की और चल दिया; क्योंकि उसकी सज़ा पूरी हो चुकी थी।
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