सिर्फ़ दस बजे
सुनील कुमार शर्मा
वे सुबह आठ बजने से पहले दुकान पर पहुँच गए थे। बिना कमर सीधी किए, लगातार काम करते-करते रात के दस बज गए थे; क्योंकि लड़के कम थे काम ज़्यादा था।
तभी लाला जी ने दुकान में प्रवेश किया। तब वे थोड़ा-थोड़ा करके समान समेट रहे थे। उस समय भी थोड़े-बहुत ग्राहक़ आ-जा रहे थे। जिन्हें देखकर, फिर दीवार घड़ी की तरफ़ देखते हुए, समान समेट रहे उन लड़कों से लाला जी बड़े प्यार से बोले, “अरे भाई! इतनी जल्दी क्या है; अभी तो सिर्फ़ दस बजे है।”
जिसे सुनकर उन बेचारों के दिमाग़ पर कितने हथौड़े बजे पूछो मत।
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