उड़ान
सुनील कुमार शर्मा
वह हाथ फैलाकर,
ऊपर की ओर उछलता है।
स्वछंद उड़ने लगता है।
वह चाहता है,
नीचे चल रहे लोग
उसकी तरफ़ देखें।
कोई उसकी ओर ध्यान
नहींं देता।
वह उनको आकर्षित करने
के लिए, बार-बार उड़ान
भरते हुए, उनके ऊपर से
निकलता है।
किसी को उससे कोई
मतलब नहीं।
वह क्यों उड़ रहा है?
. . . कैसे उड़ रहा है?
वह उड़ते-उड़ते,
दूर क्षितिज में पहुँच जाता है।
खुला आसमान . . .
दसों दिशाएँ एक जैसी।
डूबते सूरज के प्रकाश जैसा,
हल्का लालिमा लिए हुए प्रकाश।
एक अजीब तरह,
की शान्ति।
वह उड़ रहा है।
वह सोचता है—
कहाँ से आया हूँ?
याद नहीं।
कहाँ जाना है?
पता नहीं।
उसकी नींद खुल जाती है।
जो बड़ी मुश्किल से,
गोली खाने के बाद
आई थी।
“उड़ान . . .?” धीरे से मुस्कुराता है,
“बिस्तर पर करवट लेने
में भी तकलीफ़ हो रही है।”
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