हर बार मैं तो ठोकरें खाकर ही सम्भलता रहा

01-05-2026

हर बार मैं तो ठोकरें खाकर ही सम्भलता रहा

सुनील कुमार शर्मा  (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

हर बार मैं तो ठोकरें खाकर ही सम्भलता रहा, 
मुझसे न कोई भूल हो यह भूल मैं करता रहा। 
 
ख़ामोशियाँ चुपके से अपना काम करती ही रहीं, 
मैं ख़्वा-मख़्वाह इन गरजते तूफ़ानों से लड़ता रहा
 
अनगिनत काँटे जो चुभे तन पर लगी चोटें तो भी, 
अच्छे दिनों की आस में मैं डगर पर बढ़ता रहा। 
  
चलते हुए जब घिर गई थी ज़िन्दगी अँधेरों में, 
दिल में तो मेरे चुपके से कोई दिया जलता रहा। 
 
हर मोड़ पर मेरा ज़माना मुझसे छल करता रहा, 
मैं भी बिना मतलब ज़माने के लिए मरता रहा। 

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