रावण की लकड़ी
सुनील कुमार शर्मा
जैसे ही रावण के पुतले को आग लगी; लोग जान जोख़िम में डालकर, उसकी लकड़ी खींचने के लिए टूट पड़े। मोलू कहाँ पीछे रहने वाला था। वह है तो छोटा; पर बड़ा फ़ुर्तीला था। एक पूरी लाठी जितनी लकड़ी खींचने में कामयाब रहा।
जैसे उसने कोई बड़ा मैदान मार लिया हो। वह ख़ुशी से भागते हुए, अपनी झोपड़ी में जा पहुँचा, “अम्मा! अम्मा!! देखो मैं यह लकड़ी ले आया हूँ; इसे घर में रख लो . . . कहते हैं, जिस घर में यह लकड़ी हो उस घर में चोर नहीं आते . . .” वह हाँफते हुए, एक ही साँस यह सब कह गया।
चूल्हे में फूँकें मार रही उसकी अम्मा ने सिर उठाकर उसकी तरफ़ देखा, “चोर . . .?” वह थोड़ी मुस्करायी, फिर उसने चारों तरफ़ गरदन घुमाकर, झोपड़ी में रखे, टूटे-फूटे मिट्टी और अल्युमिनीयम के बर्तनों को देखा। उस लकड़ी का एक सिरा पकड़कर चूल्हे में लगाते हुए बोली, “बेटा! तू मौक़े पर आया है, बड़ी देर से फूँकें मार रही हूँ . . . लकड़ी गीली है, जल नहीं रही . . .” सूखी लकड़ी लगते ही, धुएँ से भरे चूल्हे में आग की लपटें दिखाई देने लगीं।
मोलू हैरान होकर उस लकड़ी को जलते हुए देख रहा था।
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