दयारा बुग्याल: मनमोहक ट्रैक
भीकम सिंह
आज 15 अक्टूबर है, 20 अक्टूबर की दीवाली है, पटाखों की धुँध ने अभी से समूचे ऐन.सी.आर. को जकड़ना शुरू कर दिया है। प्रदूषण की गिरफ़्त के साथ पटाखों के शोर से ऐन.सी.आर. का माहौल ख़ुशनुमा भी है। त्योहार की उमंग अपनी पूरी ताक़त से बाज़ार पर बिछी हुई है। इस बार देवेन्द्र सिंह ने ज़िद पकड़ ली, कोई छोटा-सा ट्रैक करने की। प्रदूषण से कुछ तो छुटकारा मिले। मन-ही-मन उसकी बात से सहमत होते हुए भी मैंने कुछ आनाकानी की, कुछ वाद-विवाद तथा विचार-विमर्श के बाद तय हुआ, चलो दयारा बुग्याल (उत्तरकाशी) का ट्रैक करते हैं। ख़र्चा भी कम होगा और श्वेता वर्मा को छुट्टियाँ भी नहीं लेनी पड़ेंगी। तुरन्त कार्यक्रम बना। ‘दा नैटिव हिमालय’ के मैनेजर राजेश पंवार से इरशाद ने बात की, उन्होंने उत्तरकाशी वन प्रभाग के पत्रांक-1266/15-1 (3) दिनांक 17.10.2025 के द्वारा रैथल से दयारा बुग्याल तक ट्रैकिंग की अनुमति की सूचना व्हाट्सप्प पर दी, जिसमें चार ट्रैकर (श्वेता वर्मा, देवेन्द्र सिंह, इरशाद अली, मैं) और गाइड के रूप में राजेश पंवार का नाम था।
देवेन्द्र सिंह और श्वेता वर्मा की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हुईं, दोनों में बच्चों के जैसा उत्साह दिखा, क्योंकि यह उनका पहला ट्रैक है। जुम्मा-जुम्मा दो दिन पहले ही तो ज्वाइन किया है इन्होंने। मैं और इरशाद ट्रैक करते रहते हैं। इसलिए देवेन्द्र सिंह और श्वेता वर्मा को हमने ट्रैक के सामान की जानकारी दे दी। अपने व्यवसाय की भागदौड़ के बावजूद देवेन्द्र सिंह डेकाथलान गए, लेकिन उनके साईज़ की कोई ट्रैक पैंट ही नहीं मिली, क्योंकि मैंने जब-जब उन्हें मदर डेयरी के डिस्ट्रीब्यूटर के रूप में ऑफ़िस में बैठा देखा तो उनका आधा शरीर मेज़ पर और आधा कुरसी पर ही दिखा। पता नहीं क्यों डेकाथलान ने भी ऐसे लोगों के साईज़ को अंडरएस्टीमेट किया, जबकि रावण और कुंभकर्ण के पुतलों के पाजामे तक तो मिल जाते हैं, हालाँकि मोटापा समाज में आपका रुत्बा बनाता है, लेकिन बिगाड़़ने पर आए तो अपंग भी बना सकता है।
संजीव वर्मा (ट्रैकर हैे, देवेन्द्र सिंह के रिश्तेदार हैं) ने देवेन्द्र सिंह को हैरान-परेशान देखकर अपने ट्रैकिंग शूज़ और ट्रैकिंग स्टिक दे दिए, और ट्रैकिंग पैंट के विकल्प के रूप देवेन्द्र सिंह को मजबूरी में अपनी जीन्स का ही चुनाव करना पड़ा . . . और इस तरह देवेन्द्र सिंह को तैयार करके हमने 17 अक्टूबर 2025 की रात को चलने का निश्चय किया।
दादरी से रैथल की दूरी लगभग 442 किलोमीटर है। टैक्सी रात के ग्यारह बजे दादरी से चल पड़ी। थोड़़ी देर बातचीत करने के बाद देवेन्द्र सिंह, श्वेता वर्मा और इरशाद सो गए, मैं नागेन्द्र (ड्राइवर) की बराबर वाली सीट पर था, इसलिए जागता रहा। सुबह ठीक छह बजे टैक्सी चम्बा उत्तरकाशी मार्ग पर एक छोटे से गाँव कमान के हिल टॉप रैस्टोरैंट पर रुकी। हमने उतरकर हाथ-मुँह धोया और चाय पी, तभी देवेन्द्र सिंह ने अख़बार पढ़कर ‘वायुसेना के लिए 17 अक्टूबर 2025 ऐतिहासिक रहा’ की ख़बर सुनाई तो मन में जिज्ञासा उठी कि कैसे रहा तो पता चला कि स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस एम के-1 ए ने अपनी पहली सफल उड़ान भरी है। मैंने कहा, “देवेन्द्र जी! आपकी भी तो ट्रैक के लिए यह पहली उड़ान ही है।” इस तरह की तुलना से देवेन्द्र सिंह का मुँह आश्चर्य से खुला-का-खुला रह गया।
अब हम चल पड़े, अपने आधार शिविर रैथल की ओर, हमारे साथ-साथ मार्ग के ख़ूबसूरत दृश्य भी चल पड़े। उत्तरकाशी से लगभग आठ किलोमीटर पूर्व में मनेरी में स्थित भगीरथी नदी पर एक कंक्रीट ग्रेविटी बाँध है, जो हमारे आधार शिविर वाले रास्ते पर ही है। पर्यटकों, ट्रैकरों की सुविधा के लिए इसे सेल्फ़ी पाइंट बना दिया है, वैसे इस परियोजना का निर्माण 1979 में हुआ था, लेकिन यह अक्तुबर 1984 में पूरा होकर शुरू हुआ। लगभग एक वर्ग मील क्षेत्रफल में फैले इस बाँध की क्षमता 90 मेगावाट की है। यहीं बैठकर हमने अपने गाइड की प्रतीक्षा में चाय पी, जो कुछ समय बाद ही आ गया। अब हमारे साथ टैक्सी में गाइड रणवीर भी है, जो राजेश पंवार (दा नैटिव हिमालय) का भाई है। बाँध के आस-पास के मनभावन दृश्य, ठंडी हवा के झोंके, भगीरथी की कल-कल करती धारा के साथ हमारी टैक्सी आगे बढ़ने लगी। खेतों में आलू की हार्वेस्टिंग चल रही है, जैसे-जैसे सूरज चढ़ रहा है, सड़क पर गाय-बकरियों की भीड़ भी बढ़ रही है। सड़क के किनारे आलू भरी बोरियों के चट्टे लगे हैं। सैंज गाँव आया . . . फिर लाटा . . . फिर मल्ला गाँव . . . फिर भटवाड़ी और क्यार्क आए . . . हम एक बजे रैथल पहुँच गए। यहाँ घर-घर में होमस्टे का बोर्ड लगा है, जिसमें हम रुकेंगे वह होमस्टे गढ़़वाल मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस से सटा है। इसमें रहने की अच्छी व्यवस्था है। हमने सामान जमा दिया, फिर रणबीर की आवाज़ आई, लंच के लिए आ जाइये . . . ख़ुशी की लहर भूखे बदनों में फैल गई। पहाड़ी करेला, दाल-चावल और रोटी अत्यंत स्वादिष्ट लगे।
लंच करने के बाद हम लोग गाँव में एक किलोमीटर सड़क पर चले और पाया पाँच सौ साल पुराना एक मकान ‘पंचपुरा भवन’, जिसकी विशेषता यह है कि यह भवन कोटि बनाल शैली (उत्तराखंड की एक पारंपरिक भूकंप-रोधी वास्तुकला है, जिसमें मज़बूत प्लैटफ़ॉर्म पर लकड़ी और पत्थर का उपयोग करके भवन बनाया जाता है) से बना है, इसलिए 1803 और 1991 के विनाशकारी भूकंप में भी इस भवन में कोई दरार तक नहीं आई। इस भवन के पास ही चंदन सिंह राणा की प्रतिमा है, जिन्होंने अस्सी के दशक से वर्ष 2012 तक रैथल और दयारा को पर्यटन/ट्रैक की ढाँचागत सुविधाएँं दिखाने के लिए संघर्ष किया और अन्ततः जब उत्तराखंड अलग राज्य बना . . . और नारायणदत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने तब रैथल दयारा बुग्याल ट्रैक के आधार शिविर के रूप में विकसित हुआ जिसका श्रेय चंदन सिंह राणा को जाता है, तभी से समृद्धि यहाँ पाँव पसारने लगी। राष्ट्रीय स्तर के सभी ट्रैकिंग संगठनों की गतिविधियों के कारण समय-समय पर ट्रैकिंग ग्रुप यहाँ आने लगे और गाँव वाले आर्थिक समृद्धि की नींव को पुख़्ता करने में लग गए। इसलिए आज भी पूरा गाँव उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता है।
इसके बाद हमने सोमेश्वर भगवान का मंदिर देखा, जहाँ पांडव नृत्य, रासु नृत्य, तांदी नृत्य, सेल्कु महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस गाँव का प्रमुख फ़ेस्टिवल . . . बटर फ़ेस्टिवल है जो 17 अगस्त को मनाया जाता है, जिसमें छाछ और मक्खन की होली खेली जाती है, वह भी इस मंदिर से शुरू होकर दयारा बुग्याल में मनाया जाता है। सात बजे के क़रीब हम होमस्टे की ओर चल पड़े, अपने घरों के सामने खड़े बच्चे हाथ ऊँचा करके वेव कर रहे हैं। आज धनतेरस है, पूरा गाँव एलईडी लाइट की लड़ियों से जगमग है लेकिन पटाखों का कोई शोर नहीं है। अभी भी लोग आ-भी रहे हैं, जा भी रहे हैं। पाँच-सात मिनट में हम होमस्टे के डाइनिंग हॉल में आ गए, रणबीर सूप लेकर हमारी ख़ातिरदारी कर रहे हैं। हम चारों सूप पीते हुए सोच कर हैं . . . तभी संगीत की ताल के साथ देवेन्द्र सिंह ने गाना शुरू कर दिया, उनका तर्क भी अजीब है कि डिनर के साथ गाने के आनंद से डिनर का आनन्द बढ़ जाता है, उन्हें क्या पता कि ऐसा होने से गाने और डिनर का कचूमर निकले या ना निकले, परन्तु हमारा तीनों का मुँह कचूमर-सा हो गया। ऐसी भाव-भंगिमा से भी जब वे नहीं माने तो हारकर हमने वाह . . . वाह किया।
आज 19 अक्तूबर 2025 है। आकाश में भोर के चिह्न अभी-अभी दिखने आरंभ हुए हैं। सूर्य की सौम्य केसरिया किरणें रैथल के सामने खड़े दयारा बुग्याल के दर्शन को झाँक रही हैं . . . और देखते-देखते झूमती हुई दौड़ पड़ीं। उन्होंने पहले दयारा के शिखर को छुआ, फिर धीरे-धीरे उतरती हुई रैथल में दस्तक देने लगी। सूरज की किरण पड़ते ही कुनमुनाता रैथल सुस्ती छोड़कर दैनिक गतिविधियाँ निबटाने में लग गया। मैं होमस्टे के बाहर खड़ा निर्निमेष दर्शन कर रहा हूँ, तभी रणबीर आकर गोई का भूगोल समझाने लगा। गोई हमारा अगला कैम्प है। होमस्टे की किचन में बरतन खड़कने लगे (देवेन्द्र सिंह, श्वेता वर्मा और इरशाद भी जाग गए), मैं मन ही मन अटकल लगाने लगा। चाय का पानी तपेली में खौलने लगा है। गोई कब निकलना है . . . रणबीर से पूछते हुए मैंने चाय का प्याला पकड़ लिया।
“अभी आप लोग तैयारी करो, नाश्ता करने के बाद निकलते हैं,” रणबीर ने कहा तो हम फ़्रेश होने वाशरूम चले गए।
एक कठिन पर अविस्मरणीय ट्रैक पर जाने के रोमांच के साथ देवेन्द्र सिंह ने कुछ ज़्यादा ही तैयारी कर ली, संजीव वर्मा और अशोक भाटी (देवेन्द्र सिंह के रिश्तेदार, मित्र जो ट्रैकर हैं) के तरह-तरह के मशवरे से गरम कपड़ों का ज़रूरत से ज़्यादा लगेज हो गया, किसी ने कहा, ऊँचाई पर साँस लेने में दिक़्क़त हो सकती है, तो कई तरह की मेडिसन ले ली, हवा से बचने के लिए मंकी कैप . . . और भी ना जाने क्या-क्या! रुकसैक बीस किलो का हो गया। देवेन्द्र सिंह के आग्रहनुमा आदेश पर श्वेता वर्मा ने अपने रुकसैक में अचार-पापड़, चिप्स के पैकेट और मीठी पूरी का पोटला जो सब मिलकर पाँच-सात किलो वज़न हो गया। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि देवेन्द्र सिंह और श्वेता वर्मा पति-पत्नी हैं, और ये उनका पहला ट्रैक है। मैं और इरशाद . . . संजीव वर्मा और अशोक भाटी के साथ अक्सर ट्रैक करते रहते हैं।
ठीक आठ बजे हैं। खुला-खुला मौसम है। पैक लंच में आलू-जीरा और पूरी लेकर हम गोई की ओर चढ़ने लगे। दोनों ओर हरे-भरे पेड़ों के समूह हैं जिनमें अधिकांश देवदार, ओक और रोडोडैंड्रोन के हैं। सामने ख़ूबसूरत नज़ारा देखकर हम रुके और फोटो खींचे। आगे एक मोड़ पर दो घसियारिनें मिलीं जिनकी पीठ पर घास की गट्ठरें हैं, आँखों में रामदाना मटर और राजमा के खेत हैं। हम पाँच-सौ मीटर ही चढ़े हैं कि देवेन्द्र सिंह ने रिरियाना शुरू कर दिया है। मैंने कहा, “देवेन्द्र सिंह जी के वज़न का और आस्ट्रेलिया में शुभमन गिल की कप्तानी का इम्तिहान है आज।”
इरशाद ने हँसकर कहा, “भाई साहब! शुभमन गिल का तो पता नहीं, परन्तु देवेन्द्र सिंह ज़रूर पास होंगे।”
रणबीर ने देखा, देवेन्द्र सिंह पैर इधर-उधर हिला-हिलाकर घसीट-घसीटकर ऊँचाई की थाह ले रहे हैं, लेकिन चल नहीं पा रहे हैं। इस प्रयास में वे हाँफने लगे हैं, साथ-साथ अपना वज़नी रुकसैक और वज़नी पेट ढोते हुए देखकर रणबीर को दया आ गई . . . और देवेन्द्र सिंह का रुकसैक रणबीर ने ले लिया, अब देवेन्द्र सिंह केवल ट्रैकिंग स्टिक का सहारा लेकर घिसट रहे हैं। कभी माँ को पुकारते हुए घुटनों पर हाथ रखकर दाँत पीसते हुए चढ़ने लगते हैं, चारों ओर हरियाली और शीतल हवा है। यहाँ-वहाँ पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं। हम पगडंडी के मोड़ों को पार करते हुए गोई की ओर बढ़ रहे हैं, लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर चलने पर हमें एक घंटी बँधा और सिक्के धँसा हुआ पेड़ दिखाई दिया, रणबीर ने बताया कि ये नाग देवता है, इसकी मान्यता है कि यदि आप अपना सिक्का इस पेड़ पर लगाते हैं। और वह लग जाता है तो आपकी विश अवश्य पूरी होगी, इस मान्यता के साथ पेड़ में हज़ारों सिक्के धँसे हुए हैं।
“लीजिए टपरी आ गई,” रणबीर ने कहा। टपरी यानी हमारा लंच पाइंट। पीठ से रुकसैक उतारे। श्वेता वर्मा ने पोटलियों को खोल-खोलकर देवेन्द्र सिंह के आगे रख दिया, हमने भी लंच बॉक्स खोल लिए, तभी बेतहाशा भूखे दस-बारह कौओं को काँव-काँव करते देखकर देवेन्द्र सिंह के मन में बेतहाशा दया उपजी—सारे कौए चोंच बाये देवेन्द्र सिंह का हाथ ताक रहे थे, देवेन्द्र सिंह के एक सौ सत्तावन वज़नी क़दमों की दहल क़रीब आने पर वे उड़ गए।
लंच के बाद मैंने देखा श्वेता वर्मा पोटलियों की एक-एक वस्तु को ऐसे सहेज रही थी जैसे कोई बच्ची अपने खिलौने सहेज रही हो।
फिर से पीठ पर रुकसैक कसकर हम चल पड़े . . . ऊँचे गोई की ओर। दोपहर तीन बजे हमने गोई की झोपड़ियों में डेरा डाला।
मैंने देखा गोई में भी श्वेता वर्मा खाने की सामग्री के पैकेटों (पोटलियों) को अमूल्य निधि की तरह सँभाल रही है और कोई ख़्वाब देख रही है। यक़ीनन पत्नियों के ख़्वाब़ असीम हैं और वह फ़क़त उसका मामूली हिस्सा देख पा रही है, लेकिन इसके बावजूद उसके ख़्वाबों का अम्बार बढ़ता जा रहा है। अब झोंपड़ी में श्वेता वर्मा के ख़्वाब और लकड़ी का धुआँ है।
झोंपड़ी के एक ओर मिट्टी का चूल्हा है जिसमें लकड़ी जल रही है, उसके पास ही किचन का सामान बिखरा हुआ है। सोनू के साथ रणबीर खाना (डिनर) तैयार करने में मगन है। सामने छोटी-सी पहाड़ी है, वहाँ ट्रैकर की चहल क़दमी है, तरह-तरह के ट्रैकर हैं। हम भी उस तरफ़ चल दिए हैं। देवेन्द्र सिंह अपने पूरे हाव-भाव और चाल-ढाल में दूर से चमक रहे हैं, वहाँ कोई ट्रैकर कुछ कहता है और एक सामूहिक ठहाका लगता है, हँसी-मज़ाक का माहौल है, लेकिन हिसार से आया ट्रैकर अलग है, वह फक-फक धुआँ काटते हुए सिगरेट का गहरा कश लगा रहा है, हम उससे थोड़ा बतियाते हैं और फिर देवेन्द्र सिंह ट्रैकिंग स्टिक थाम लेते हैं, हम भी उनके साथ झोंपड़ी में आ जाते हैं। झोंपड़ी में धुआँ भी ठुँसकर बैठ गया है। गोई की शाम जल्दी ख़त्म हो गई। ओक और रोडोडैंड्रोन की शाखाओं के सहारे धीमे-धीमे ऊपर उठता सूरज जाने कब फिसलकर चुपचाप चला गया पता ही नहीं चला।
रणबीर ने आवाज़ लगाई, “आ जाइये सर! डिनर तैयार है।” . . . और चूल्हे के पास ही टाटपट्टी बिछ गई, धूल-धमासे में ही कच्चा-पक्का खाया . . . मन मसोसकर कूलते-कँजराते झोंपड़ी में सो गए। रातभर हमारी नींद धुँए में सुबकती सरसती रही . . . इसी बहाने स्वच्छ आकाश के स्पष्ट तारे देखने का अवसर अनेकों बार मिला। हमारी उचटती नींद के कारण रातभर दरवाज़ा धड़धड़ाता रहा। बीच में ही कभी . . . ऊऽऽ . . . उबकाई मुझमें जाग पड़ी और मैं तेज़ी से बाहर निकला, मैंने सिर झुका लिया . . . डिनर के चावल बाहर आ गए। मैंने इरशाद से पानी लेते हुए राहत की साँस ली, झोंपड़ी से धुआँ बाहर की ओर जाता साफ़-साफ़ दिख रहा है, फिर से हमने नींद पर अपना ध्यान केन्द्रित किया।
इरशाद ने आँखें बंद करे-करे ही कहा, “जानी-पहचानी हलचल है।”
मैंने दरवाज़े के बाहर झाँककर कहा, “भोर होने को है, चौतरफ़ा दयारा की तैयारी की हलचल है।”
मैंने रणबीर से चाय माँगी, . . . फिर इरशाद और मैं खुले में फ़्रैश होने चल दिए, श्वेता वर्मा और देवेन्द्र सिंह भी नींद से हरहराकर उठ आए हैं। झोंपड़ियों के पीछे दो सौ मीटर पर ही खुले में निस्तार की व्यवस्था है, लेकिन देवेन्द्र सिंह को सावधानी की ज़रूरत है। हम पानी के स्रोत के सामने से गुज़र रहे हैं।
तो यह है गोई। समुद्र तल से 9800 फ़ुट की ऊँचाई पर। 20 अक्तूबर 2025 को दिवाली के दिन हम चारों पानी के स्रोत पर पेपर सोप से हाथ-मुँह धो रहे हैं। ओक, बुराँश (रोडोडैंड्रोन) और खरस के घने जंगल को निगाह भर देखकर जी में जी आया—अरे घास का मैदान कितना सुन्दर है, डेज़ी के पौधे भी हैं, वन विभाग के इगलू भी हैं।
बस थोड़ी देर बाद दयारा के लिए निकलना है, रणबीर ने चटाई बिछाकर बैठने को कहा। थोड़ी देर में चाय-नाश्ता आया . . . नींबू की चाय और आलू का पराँठा बड़ा ही स्वादिष्ट लगा। सुस्वादिष्ट चाय-नाश्ते के बाद समय आ गया था . . . रुकसैक पीठ पर कसने का। हमने गोई के विशाल आयाम का आनन्द उठाते हुए उसे प्रणाम किया, और दयारा की ओर निकल पड़े। पाँच सौ मीटर चलने के बाद हम घने जंगल के बीच चिलपड़ा पहुँच गए। चिलपड़ा इतना घना है कि धूप ज़मीन का बहुत मामूली हिस्सा ही छू पाती है। सामने बावला बादल फटने का चिह्न सफ़ेद पत्थरों में दिख रहा है, बावला बादल इसलिए कहा कि जहाँ पर वह फटा वहाँ के पेड़-पौधे, जल-स्रोत उखड़-उज़ड़ गए हैं। हमारे दिल की धड़कने बढ़ती जा रही हैं कि एक किलोमीटर में हुई इस तबाही को कैसे पार करेंगे? . . . मैं सोचने लगा कि जब यहाँ बादल फटा होगा, कैसा भंयकर विस्फोट हुआ होगा फिर पानी का तेज़ सैलाब आया होगा, उसकी गति, इतनी तीव्र होगी कि पेड़, पत्थर सँभल ही नहीं पाए . . . फिर मैं एक क्रम में शनैः शनैः दो-दो शिलाखण्ड चढ़ते हुए . . . आराम करते हुए ऊपर चढ़ने का प्रयास कर रहा हूँ। देवेन्द्र सिंह ने रणबीर की मदद से यह दुर्गम मार्ग पार कर लिया है। इरशाद और श्वेता वर्मा ने यह मार्ग हर्ष और आनन्द से पार कर लिया है। थकान दूर करने के लिए श्वेता वर्मा ने मूँग की दाल का पैकेट खोल लिया है, मगर देवेन्द्र सिंह ऊर्जा के घोड़े पर सवार होकर यह जा वह जा . . . श्वेता वर्मा दाल खाने के लिए निहोरे करती रही।
आँखों को सहसा विश्वास नहीं हुआ कि हमारे सामने दयारा बुग्याल मानों साक्षात् खड़ा है। अब हम 1100 फ़ुट की ऊँचाई पर हैं, सामने वैसी ही झोंपड़ी हैं जैसी गोई में छोड़कर आए हैं। दयारा सम्मिट पाइंट यहाँ से लगभग तीन किलोमीटर है। सम्मिट करके फिर यहीं लौटना पड़ता है, इन्हीं झोंपडियों में रात व्यतीत करनी पड़ती है क्योंकि दयारा बुग्याल में कैम्पिंग बैन है जिसका कारण लोग अपने साथ प्लास्टिक वेस्ट और दूसरे नॉन बायोग्रडैबल लेकर आते हैं और बुग्याल में छोड़ देते हैं जिसकी वजह से नेचुरल इकोसिस्टम डिस्टर्ब होता है और एन्वायरमेंटल डैमेज होता चला जाता है। इसलिए रैथल गाँव वालों ने सम्मिट पाइंट से लगभग तीन किलोमीटर पहले ये झोंपड़ियाँ बनाई हैं।
हमने एक झोंपड़ी में पड़ाव डाला, दो लड़कियाँ सीधे रैथल से आई हैं, वे भी उसी झोंपड़ी में घुस गईं, उनको भी रात काटनी है। लंच में समय है इसलिए सम्मिट पाइंट जाने का कार्यक्रम बना। अब चढ़ाई नहीं है, चलते हुए घुटनों पर ज़ोर नहीं पड़ रहा, टेढ़ी-मेढ़ी लंबी पगडंडी बुग्याल के बीच रेंगती दिखाई दे रही है, एक घंटे की मस्ती वाली चाल से हम हरी घास की पहाड़ी पहुँच गए, अर्थात् सम्मिट पाइंट। दयारा बुग्याल के चारों ओर पहाड़ है, घास का मैदान शांत है। जिधर भी दृष्टि घुमाएँ-पर्वत, पेड़ कुछ पर्वतों की चोटी बर्फ़ से ढकी हैं। बुग्याल की पृष्ठभूमि में मनमोहक पहाड़ों के साथ एक सुंदर दृश्य प्रस्तुत हो रहा है। बंदर पूछ, स्वर्गारोहिणी और गंगोत्री जैसे दृश्य भी दिख रहे हैं। देवदार के ऊँचे पेड़, बुग्याल की सुरक्षा के निमित्त सन्नद्ध खड़े हैं, पलक भी नहीं झपकते। कहीं-कहीं पहाड़ों से उठते बादल दिखाई दे रहे हैं। आधा घंटा सम्मिट पाइंट पर मस्ती करके हम वापस लौट आए। रणबीर ने बड़े अनुरोध के साथ कढ़ी-चावल का लंच कराया। कढ़ी हम सबको पसन्द है, और फुलौरी वाली कढ़ी तो वाह . . . भाई वाह . . . परन्तु ये कढ़ी हटके थी।
. . . फिर हम ताश खेलने बैठ गए, फर्र-फर्र ठंडी हवा बेरोकटोक घूम रही है, देवेन्द्र सिंह बीच-बीच में मूँग की दाल चबा रहे हैं, बोलते वक़्त जिसकी छींटे हम तक पड़ रही हैं। मैंने सैनिटाइज़र निकाला, लेकिन कुछ विशेष लाभ न हुआ, फिर भी हम देवेन्द्र सिंह की हार का आनन्द लेते रहे और ख़ुद को मूँग की दाल के छींटों से बचाते रहे।
“डिनर में आलू पत्ता गोभी बनाएँ?” रणबीर हमें निहार रहा है।
“हाँ . . . हाँ खा लेंगे!” हमारा समवेत स्वर निकला। देवेन्द्र सिंह के मुँह से अभी भी मूँग की दाल बाहर आ रही है और वह अपने शोर-शराबे को मैन्टेन किए है। आकाश में सफ़ेद बादल अभी भी पड़े हैं—कुछ गुत्थमगुत्था, कुछ तितर-बितर।
हमने सोने के लिए गद्दे बिछा लिए, रणबीर ने ओढ़ने के लिए कंबल दे दिए, इतनी ठंड में मेरे लिए यह कंबल बहुत नाकाफ़ी था तो रणबीर ने एक कंबल और जोड़ दिया। ग़ज़ब तो तब हुआ, जब रात को गोई की तरह झोंपड़ी में धुआँ ठुँस गया। यह रात भी हमारे लिए कष्टदायी सिद्ध हुई। कई बार झोंपड़ी के बाहर झाँका, आसमान में झिलमिलाते तारे विचरण करता चाँद नज़र आ रहा था, यह एक तरह से बेमौक़े रतजगा था . . . और धुआँ चटखारे ले-लेकर हमारी साँसों में नाचता रहा। हमें वह घड़ी याद नहीं जब हमें नींद आई, परन्तु नींद में नींद जैसा कुछ नहीं था।
“चाय सर!” रणबीर की आवाज़ से हमारी नींद भंग हुई।
“नमस्ते सर! बड़ी गहरी नींद आई . . . ” रणबीर की आवाज़ हमें उमस भरी हवा-सी लगी।
चाय पीकर हम झोंपड़ी से बाहर निकले तो बहुत सारी हवा ताज़ी ख़ुश्बू को लहराते हमारी ओर दौड़ पड़ी।
आज 20 अक्तूबर 2025 है। अनिद्रा से शरीर शिथिल हो चुका है फिर भी हिम्मत करके पानी की बोतलें उठा ली हैं और हरी घास की जड़ों को देखते हुए दिशा-मैदान के लिए चल पड़े . . . और लौटकर आए तो लगा, नाश्ता लुट रहा है। चुपचाप हाथ धोए और बैंच पर बैठ गए। देवेन्द्र सिंह हँसे फिर चुप हुए, चुप्पी को साध लिया और कराह कर बोले, “इरशाद भाई! वोलिनी स्प्रे देना।” . . . और कमर का ख़ुलासा करते हुए उँगली रखी। इरशाद ने ग़ौर से देखा, फिर स्प्रे मार दिया। देवेन्द्र सिंह का लक्ष्य था रैथल तक पहुँच पाना।
हमें अपना रुकसैक समेटने में देर नहीं लगी, और हम रैथल की ओर चल पड़े। एक बार फिर चिलपड़ा और गोई की ख़ूबसूरत वादियों से साक्षात्कार होगा। तो आइये . . . हम अपनी वापस की यात्रा (ट्रैकिंग) शुरू करते हैं। यह ट्रैकिंग नौ किलोमीटर की है जो हमने दो दिन में पूरी की थी अब उतरना ही उतरना है, जो घुटनों और पैर के अँगूठों के लिए चुनौती है। बहुत हिम्मत जुटाकर हम गोई दस बजे आ गए। वही दृश्य, वही लैंडस्केप जो हमने दो दिन पहले तय किए थे, एक बार फिर पार करने में रास्तों का मंज़र बदला लग रहा है अर्थात् कोई बोरियत नहीं है। जब तक हम होमस्टे पहुँचते हैं, दोपहर के दो बज जाते हैं पहाड़ी मेहमाननवाज़ी की अद्भुत और बेहतरीन परम्परा में सेंवई खाने के आग्रह ने थकान दूर कर दी, और लंच एक घंटे के हाशिये पर चला गया। अंदर की बात यह है कि होमस्टे के व्यवस्थापकों के मन में पर्यटक/ट्रैकर के लिए कुछ ख़ास इज़्ज़त है, या यों कहिए उन्हें इज़्ज़त देना प्रतियोगिता के कारण एक रिवाज़ बन गया है। रैथल गाँव में ये बातें चर्चा का विषय बनी हुई हैं। देखते ही देखते शाम हो गई। दिवाली के दीये जलने लगे।
“आज सरयू तट पर दीयों की आवलियों से फिर कोई कीर्तिमान गढ़ा जाऐगा और एनसीआर में हवा दमघोंट होगी,” देवेन्द्र सिंह ने शांत स्वर में कहा, फिर कुछ सोचते हुए डाइनिंग हॉल में जा बैठे। डाइनिंग हॉल से एक सीढ़ी नीचे जाती है और ऊपर भी ऐसे ही एक सीढ़ी जाती है। आज दीयों की आवलियों से इसका इतराना भी कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है। डिनर के इंतज़ार में इधर-उधर ताकते हुए देवेन्द्र सिंह के सामने रणबीर ने खील-बताशों से भरी परात रख दी . . . देवेन्द्र सिंह का पेट पंख फैलाने लगा। श्वेता वर्मा हक्की-बक्की रणबीर का मुँह ताकती रही, मैं और इरशाद अपनी खिलखिलाहट छुपाते रहे . . . और अगले ही क्षण खीर-पूड़ी के साथ डिनर भी लग गया . . . दीवाली स्पेशल, देखते ही मुँह में पानी आ गया . . . और देवेन्द्र सिंह के उत्साह का तो कोई ओर-छोर था ही नहीं। एक-एक करके हमने दसियों पूरियाँ खाई और सोने को चल पड़े।
सुबह आठ बजे हम लोगों ने होमस्टे से चेकआउट किया और नागेन्द्र की टैक्सी में दादरी के लिए रवाना हुए।
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