बची हुई हवा की दस्तक

15-12-2025

बची हुई हवा की दस्तक

भीकम सिंह (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

समीक्षित पुस्तक: बची हुई हवा (लघुकथा संकलन)
लेखक: जयप्रकाश मानस
प्रकाशकः न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन
C-515, बुद्धनगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
प्रथम संस्करणः 2025
मूल्यः ₹299
पृष्ठः 169
ISBN: 978.93.6407.682.1


लघुकथा लेखन में जिस लघुकथाकार ने लघुकथा की स्वल्प क्षमता को डंके की चोट पर यह कहकर स्वीकार किया कि मैं लघुकथा के समूचे भूगोल को एक ही बार में देखना चाहता हूँ यानी कि शीर्षक से लेकर उसके लेखक का नाम एक ही बार में दिख जाए। उसके लिए पन्ना पलटने की बाध्यता न रहे और शब्दों का भी बेजा क़ब्ज़ा ना हो, वह जयप्रकाश मानस है। (जय प्रकाश मानस छत्तीसगढ़ शासन में वरिष्ठ अधिकारी हैं और अपनी विशिष्ट शैली की लघुकथाओं के लिए जाने जाते हैं। वर्ष 2025 में उनका ‘बची हुई हवा’ के नाम से लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुआ है) 

उन्होंने यह बात अंतरराष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन, रायपुर (16-17 फरवरी 2008) में अपने शोध पत्र ‘लघुकथा का निबन्ध’ में कही, जिसे लघुकथा डॉटकॉम ने अपने स्थायी स्तम्भ अध्ययन कक्ष और दस्तावेज़ में क्रमशः जून 2019, अप्रैल 2024 को प्रकाशित किया। 

जय प्रकाश मानस के लघुकथा संग्रह ‘बची हुई हवा’ की लघुकथाएँ भी उन्हीं के फ़्रेम का यथार्थ और सच्चाई है, जो लघुकथा लेखन में स्वीकार्य हो चुके हैं, इसलिए 123 लघुकथाओं के इस संग्रह की भूमिका में रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने इसे स्वप्न और यथार्थ का शिलालेख कहा है। इस संग्रह की कुछ लघुकथाएँ लघुकथा विमर्श को नए सिरे से खंगालने हेतु सार्थक कही जा सकती हैं क्योंकि जयप्रकाश मानस की रचनाशीलता में दर्शन चिंतन के साथ घुला-मिला है, उनके सृजन में काल्पनिक और यथार्थ एक दूसरे को थामे रहता है और भाषा भी यथार्थ के प्रति दायित्वपूर्ण रहती है। उनकी रचनाशीलता में आत्मसतर्कता कुछ इस तरह रहती है कि उसका अन्याय से विरोध प्रकट होता है, इसलिए उनकी लघुकथाएँ विचार और व्यवहार में निजी विषय के सूत्र टटोलती रहती हैं। संवेदनशीलता जगाये रखती हैं। ‘टूटन की पूजा’ या यह वाक्य “हम तो एक ही पहाड़ की चट्टान के टुकड़े थे। आज तुम्हारे चरणों में चंदन, मेेरे ऊपर पैरों के निशान। यह भेदभाव क्यों?”

जयप्रकाश मानस की लघुकथाएँ शब्दों के सहारे सामाजिक विन्यास को उलटती-पलटती एक शिल्प है जो चमत्कृत करता है, इसलिए नक्सलवाद में हम नक्सलवाद की बदसूरती साफ़-साफ़ देख सकते हेैं, और जूते जैसी आधारभूत आवश्यकता के विभिन्न पक्षों पर विचार करने का क्रम ही जैसे लघुकथा का कथ्य हो और लेखक का अभीष्ट। सच पर मुलम्मा चढ़ाना पसन्द नहीं जयप्रकाश मानस को, इसलिए नक्सलवाद की आठ कथाओं पर एक-एक कर ठिठकते हैं, ठहरते हैं, और यथार्थ को डरावना बनाने वाले कारकों की पड़ताल कर लेना चाहते हैं। आदिवासियों की जहालत और उन्हें सरकार द्वारा दोषी ठहराए जाने की मर्मांतक पीड़ा झेलने की बेबसी जयप्रकाश मानस के चरित्रों में उभरी है, “अगली भोर को पुलिस ने उसके खेत में गड्ढा खोदकर एक पुराना पिस्तौल दबा दिया। नक्सली साबित हुआ। रामलाल की पीठ पर गोली का निशान बन गया।” . . . महादेव के हाथ जुड़ गए: “हुजूर, उसने तो मना किया था . . . पर उन्होंने बंदूक दिखाकर . . .” या “यूनिफ़ॉर्म का खाकी और कॉमरेड के गमछे का लाल रंग नदी में धुल रहे थे।” या फिर “बस्तर की खदान से 500 करोड़ का मुनाफ़ा। पर्यावरण क्लीयरेंस? हो गया-कुछ आदिवासी पेड़ों को देवता मानते हैं, ये सुपरस्टीशन है।” इस तरह का प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति एक निर्णायक संघर्ष का विन्यास मानस की लघुकथाओं में है जो शिल्प में सुनाई देता है। 

‘चाची की दुकान का अंतिम दिन’ में भूमि अधिग्रहण को विमर्श बनाने की इच्छा हो या ‘पाठ’ में वही पाठ एक गंभीर पहल का बौद्धिक विश्लेषण करता नज़र आता है। इसी प्रकार ‘दोहरी स्याही’ पुरुषों के प्रति नफ़रत से भरे स्त्री विमर्श पर एक अलग ढंग की लघुकथा है। ‘प्रश्न’ लघुकथा भारतीय समाज में धर्म का कारोबार करने वाले लंपट लोगों में संशय और द्वंद्व को उभारती है, जो अंधविश्वास की परम्परा को जीवित रखते हैं। धार्मिक रुढ़िवादिता किस हद तक जा सकती है कि सामाजिक रिश्ते शर्मसार हो जाए। इसका तीव्र और सघन अहसास भी करती है ‘प्रश्न’। 

जयप्रकाश मानस समकालीन जीवन यथार्थ को पात्रों की मनःस्थिति या किसी छोटे से जीवनसुख के सहारे पकड़ते हैं। ‘सफलता का पैमाना’, ‘सपनों का पत्थर’, ‘समय से आगे’, ‘नया पाठ’, ‘सुबह का धब्बा’, ‘सूखी बूँद’, ‘फुटपाथवार्ड’, ‘भाव’, ‘कच्छप-स्वप्न’ आदि सभी लघुकथाएँ संग्रह की कलात्मकता में अभिवृद्धि करती हैं। 

युद्ध का वातावरण मनुष्य के भीतर की मुलायम संवेदनाओं के साथ उसकी मानवीयता चेतनाशीलता को किस क़द्र निगल रहा है यह गाजा पट्टी की पाँचों लघुकथाओं में अनुगूँजित होता है। यथार्थ को छूती इन लघुकथाओं का जैसे यंत्रीकरण हुआ हो, फिर भी संवेदनशील समय के क्षरण को दिखाती हैं, और तंत्र का स्पष्ट पक्ष पूरी मार्मिकता और बेबाकी के साथ रखती हैं। “विस्फोट से उड़े घर की दीवार पर एक बच्चे का हाथ का छाप अटक गया था। नीले रंग का।” और “शिविर में बच्चे गिनती सीख रहे थे; एक मिसाइल, दो मिसाइल, तीन . . .”

‘पूजा पाठ का हिसाब’, ‘नमक’, ‘श्राद का बटुआ’, ‘नींव’, ‘चाय की चिन्ता’, ‘एकान्त का बाजार’, ‘न्याय का नाटक’, ‘खुदा की इमारत’ समाज की विकट स्थितियों के बीच बातचीत में उजागर करके जैसे भुक्तभोगी के रूप में परोसा है। क्योंकि आज भूमंडलीकरण बाज़ारवादी समाज में सामाजिक मूल्य तेज़ी से घट रहे हैं। जिन्हें लघुकथाकार ने ईमानदारी से चित्रित किया है। हमारे देश में जिस रफ़्तार से नौतिकता का दमन हो रहा है, पराकाष्ठा पर है, लोग बेटियों के भ्रूण के लिए चिंतित रहते हैं। 

‘चिट्ठी’, ‘अनामांकन’, ‘मृतकों का मतदान’, ‘हँसना-रोना’, ‘तीन सवाल’, ‘आखिरी पुस्तक’, ‘छत पर बचा हुआ कोण’, ‘अंतिम पांडुलिपि’, ‘कथा और कपट’, ‘तुलसी का आँगन’, ‘नई दौलत का मौसम’, ‘काली मिट्टी का स्वाद’ लघुकथाएँ नए सिरे से सोचने को बाध्य करती हैं, जो इनकी सार्थकता कही जा सकती है और लेखक ने सफलतापूर्वक इसका निर्वाह किया है। 

‘सरकारी पेड़ों से दूर’ में सरकार और प्रकृति का रचनात्मक अंतर बोलता है। ‘तारे की बात’, ‘चुप्पी का कानून’, ‘मंच के पीछे का सच’, ‘चर्चा का चक्रव्यूह’, ‘शोक संवाद’, ‘अंतिम दस्तावेज़’, ‘मुक्ति’, ‘सच्चा आशीर्वाद’, ‘लाल मिट्टी का सिपाही’ आदि लघुकथाएँ भी पाठक को सुकून पहुँचाती हैं। 

‘पिता का काट’, ‘अंतिम दया’, ‘फोन की रस्म’, ‘दो दोस्त’, ‘प्रयोगशाला और प्रार्थना’, ‘हल’, ‘कट-ऑफ’, ‘छपने की कीमत’, ‘सिलाई मशीन’, ‘बची हुई जिंदगी’, ‘मुखोता’, ‘डिजिटल श्राद’ लघुकथाओं के कथ्य में संवेदना की बारीक़ बुनावट अतिरिक्त विशेषता है जो सामाजिक विकास की दौड़ में पिछड़े रह गए समुदायों की हालत और उनकी पीड़ा को स्वर देती दिखलाई पड़ती है। जयप्रकाश मानस की पैनी समझ उनकी लघुकथाओं को गहरे अर्थों में हर तरह की प्रतिबद्धता से मुक्त बनाती है। 

जयप्रकाश मानस अपनी लघुकथाओं में सिर्फ़ समस्या या विडंबनाओं की ही बात नहीं करते, उसके समाधान का विकल्प भी प्रस्तुत करते हैं। ‘अंतिम दस्तावेज़’ में न्याय न सिर्फ़ हमारी संवेदनाओं को झकझोरता है बल्कि पाठक की संवेदना का हिस्सा बन जाता है। पात्रों की संवेदना को पाठकों की संवेदना से जोड़ देने का यह नतीजा है कि मैं, मैंने, वह, उसका, उसकी, पत्नी, सूरज, मौलवी, रामप्रसाद, बिसाहू, भीखू चाचा, कमांडर, बैसाखू, प्रोफ़ेसर राघवन, मंगल्या, मानस, मछली, राजन, बूढ़ा बाबा आदि पात्र लघुकथा पाठ के दौरान और उसके बाद भी हमारे भीतर साँस लेते मालूम पड़ते हैं। लोकप्रिय कथाकार सुकेश साहनी ने संग्रह के ब्लर्ब पर सही लिखा है कि जयप्रकाश मानस की लघुकथा शैली उनकी अपनी विशिष्ठ शैली है। विषय वैविध्य की दृष्टि से भी जयप्रकाश मानस की लघुकथा शैली उनकी अपनी विशिष्ठ शैली है। परहेज़ वाले तथ्यों को भी रेखांकित करती ‘बची हुई हवा’ की लघुकथाएँ निःसंदेह लघुकथा लेखन में एक ज़रूरी दस्तावेज़ हैं। अलग ढंग की इन लघुकथाओं पर बातचीत होनी चाहिए। 

पुस्तक की भाषा सरल और बोधगम्य है जो सम्प्रेषणीयता में बाधक नहीं बनती। लेखक का भाषा पर पूरा अधिकार है, उन्होंने भाषा को भावों के अनुसार बड़ी कुशलता से लघुकथाओं के उदाहरण प्रस्तुत करके आकर्षक बना दिया है। पुस्तक का मुद्रण सुन्दर और आवरण आकर्षक है। आशा की जाती है कि पुस्तक लघुकथा के गम्भीर पाठकों को पसन्द आएगी। 
 

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