राजनीतिक असहमति बनाम व्यक्तिगत आलोचना
सुनील कुमार शर्मा
(वर्तमान राजनैतिक आचरण पर आलेख)
लोकतंत्र का आधार ही मतभेद है। यदि समाज में केवल एक ही विचार शेष रह जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे निरंकुशता में बदलने लगता है। इसलिए पक्ष और विपक्ष दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनिवार्य स्तंभ हैं। सत्ता पक्ष शासन चलाता है और विपक्ष उस शासन की समीक्षा करता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में दोनों की भूमिका प्रतिस्पर्धी अवश्य होती है, पर शत्रुतापूर्ण नहीं। दुर्भाग्य से वर्तमान समय में राजनीतिक असहमति धीरे-धीरे वैचारिक विमर्श से हटकर व्यक्तिगत आक्षेप, कटाक्ष और घृणा का रूप लेती जा रही है।
दलगत राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप, व्यंग्य और छींटाकशी नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि संसद से लेकर जनसभाओं तक तीखी बहसें लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा रही हैं। किन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी दल की नीतियों की आलोचना करते-करते हम उसके नेताओं के व्यक्तिगत जीवन, शारीरिक स्वरूप, पारिवारिक पृष्ठभूमि या निजी व्यवहार पर उतर आते हैं। इससे राजनीतिक विमर्श का स्तर गिरता है और समाज में वैचारिक परिपक्वता के स्थान पर भावनात्मक उन्माद बढ़ने लगता है।
आज सामाजिक मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीखा बना दिया है। लोग बिना तथ्य जाँचे कटाक्ष साझा कर देते हैं। राजनीतिक समर्थन अब कई बार वैचारिक न होकर भावनात्मक पहचान बन चुका है। परिणामस्वरूप, किसी दल की आलोचना को राष्ट्रविरोध और किसी नेता की प्रशंसा को अंधभक्ति मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
यह समझना आवश्यक है कि कोई भी राजनीतिक दल राष्ट्र से बड़ा नहीं होता। दल बदलते रहते हैं, सरकारें आती-जाती रहती हैं, नेता उभरते और विलुप्त होते रहते हैं, पर राष्ट्र स्थायी होता है। इसलिए किसी दल के विरोध में यदि हम ऐसी भाषा बोलने लगें जिससे देश की गरिमा, सामाजिक एकता या अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को आघात पहुँचे, तो वह आलोचना नहीं, अविवेक कहलाएगा। उसी प्रकार सत्ता के समर्थन में विपक्ष को देशद्रोही सिद्ध कर देना भी लोकतांत्रिक भावना के विरुद्ध है।
पक्ष और विपक्ष दोनों के राजनीतिक आचरण की समीक्षा आवश्यक है। सत्ता पक्ष की ज़िम्मेदारी केवल योजनाएँ बनाना नहीं, बल्कि आलोचना को सहने का लोकतांत्रिक धैर्य रखना भी है। यदि सरकार हर असहमति को शत्रुता मानने लगे, तो लोकतंत्र संवादहीन हो जाता है। दूसरी ओर विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक और तथ्यपूर्ण आलोचना प्रस्तुत करना है। निरंतर नकारात्मकता, अविश्वास और केवल राजनीतिक लाभ के लिए जनभावनाओं को भड़काना विपक्ष की नैतिक शक्ति को कमज़ोर करता है।
आज राजनीति में विचारधारा से अधिक छवि-निर्माण और जन-उत्तेजना का महत्त्व बढ़ गया है। भाषणों में संयम कम हो रहा है और उत्तेजना अधिक। टीवी बहसों में तर्क कम, शोर अधिक दिखाई देता है। सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को तत्काल प्रतिक्रिया देने का मंच तो दे दिया है, पर आत्मसंयम और उत्तरदायित्व का संस्कार नहीं दिया। यही कारण है कि राजनीतिक चर्चा कई बार वैचारिक संवाद के बजाय व्यक्तिगत युद्ध जैसी प्रतीत होने लगती है।
लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, किन्तु असहमति की भाषा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। यदि हम अपने विरोधी विचार को सुनने की क्षमता खो देंगे, तो धीरे-धीरे समाज संवाद की संस्कृति खो देगा। स्वस्थ राजनीति वही है जिसमें हम किसी नीति का कठोर विरोध कर सकें, पर व्यक्ति के सम्मान को नष्ट न करें; किसी सरकार की आलोचना कर सकें, पर देश के प्रति सम्मान बनाए रखें।
राजनीतिक परिपक्वता का अर्थ यह नहीं कि हम हर बात से सहमत हो जाएँ। इसका अर्थ यह है कि हम असहमति को भी गरिमा के साथ व्यक्त करना सीखें। लोकतंत्र बहुमत की शक्ति से चलता है, पर उसकी आत्मा संवाद और सहिष्णुता में बसती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल भी अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संयमित भाषा और तथ्यपूर्ण संवाद की संस्कृति सिखाएँ। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी लोकतांत्रिक मूल्यों, तार्किक बहस और संवैधानिक मर्यादाओं पर अधिक बल दिया जाना चाहिए। मीडिया को भी उत्तेजना के बजाय संतुलित विमर्श को प्रोत्साहित करना होगा।
अंततः यह स्मरण रखना चाहिए कि राजनीतिक दल राष्ट्र निर्माण के साधन हैं, स्वयं राष्ट्र नहीं। यदि दलगत निष्ठाएँ हमें इतना विभाजित कर दें कि हम अपने ही देश, समाज और नागरिकों के प्रति कटुता से भर जाएँ, तो यह लोकतंत्र की आत्मा के लिए सबसे बड़ा संकट होगा।
सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ पक्ष और विपक्ष दोनों एक-दूसरे से असहमत होते हुए भी राष्ट्रहित के प्रश्न पर साथ खड़े हो सकें। क्योंकि विचारों की लड़ाई में यदि राष्ट्र की गरिमा हार जाए, तो अंततः पराजित पूरा समाज होता है।
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