दुहाई-तहाई 

15-03-2026

दुहाई-तहाई 

दीपक शर्मा (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

“धर्मवीर,” अपनी अर्द्धचेतना में जाई मुझे ठीक पहचान न पाईं। समझीं, मैं यशवीर नहीं हूँ। धर्मवीर हूँ। 

“हूँ,” मैंने उनका भ्रम न तोड़ा और भैया के अंदाज़ में हुंकार भरा। यों भी अपने इस चौदहवें साल तक आते-आते जैसे ही मेरे शरीर ने एक निश्चित बनावट और ऊँचाई हासिल की है, पुराने जानने वाले लोग कहने लगे हैं, कैसे तो धर्मवीर को देख कर बारह-तेरह साल पहले वाले यशवीर का धोखा हो जाता है! 

“मेरा समय पूरा हो रहा है,” जाई बड़बड़ाईं, “शायद इसीलिए शशि बार-बार दिखलाई दे रही है, फूले अपने पेट के साथ . . .”

वह नाम मेरे लिए नितांत अजनबी था।

लेकिन धर्मवीर भैया के अंदाज़ में मैं फिर ‘हूँ’ बोल गया।

“अपने यशवीर को छाती से लगा कर दूध पिलाती हुई। मैं उसे अलग करती हूँ तो यशवीर को मेरे हाथों से छीन-झपट ले जाती है—‘मेरा दूध चू रहा है’ . . . मैं कहती हूँ, यशवीर का बाज़दावा जब मेरे हक़ में अब आ ही गया है, फिर उस पर तेरा दावा कैसा?”

क्या बोल रहीं थीं जाई? चौकन्ने हुए मेरे दोनों कान खड़े हो लिए।

“याद है? धर्मवीर? कैसे उसे मैंने फ़र्श पर धकेल कर उसके गले में उस की साड़ी की गाँठ लगा दी थी . . . सीं-सीं, सों-सों उस के दोनों नथुने बजा दिए रहे?”

कैसी उग्र उत्तेजना रही जाई के स्वर में! कैसे वह उत्तेजना मेरे अंदर समाने लगी और मेरी साँस फुलाने लगी!!

मैंने बाउजी को उनके कमरे में आन जगाया।

“जाई अभी-अभी बोलीं, मैं उनका बेटा नहीं हूँ,” मैं रो पड़ा।

“बेहोशी में जो कोई भी कुछ भी बोल दे,” बाउजी की आवाज़ थरथरायी।

“यह शशि कौन थीं?” मैंने उन्हें विमुक्त न किया।

“जैवंती उस की मौसी थी। माँ उसकी गुज़र चुकी थी और बाप ने दूसरा ब्याह रचा कर उसे उस के ननिहाल भेज रखा था। और वे लोग उसे इधर-उधर फेंकते रहते थे। किसी की शादी पड़ती, प्रसूति पड़ती, मृत्यु पड़ती, उसे वहीं चलता कर दिया जाता।”

“हमारे यहाँ वह क्यों आईं?”

“जैवंती की ज़िद पर, मेरी भाभियाँ इस की दुर्गत बना रही हैं। मैं इसे अपने पास रखूँगी।”

“फिर उन्हें मार भी डाला अपने हाथों?”

“जैवंती भला उसे क्यों मारती?”

“क्योंकि उन्होंने मुझे जन्म दिया था . . .”

“यह सब जैवंती ने कहा तुम से?” बाउजी स्तब्ध रह गए।

“हाँ . . .” 

“वह ज़रूर पगला गई है,” अपने बिस्तर से उठ कर बाउजी जाई के कमरे की ओर चल दिए, “पूछता हूँ। पूछता हूँ उस से . . .” 

(2) 

अपनी चेतना जाई वापस न ला पाईं और उसी दिन चल बसीं।

ख़बर मिलने पर सभी लोग आए लेकिन मैं धर्मवीर भैया के पास ही गया। जो अहमदाबाद से आए थे जहाँ वह मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे थे।

“आपके बचपन में कोई शशि हमारे घर रहने आयीं रहीं?” धर्मवीर भैया और मेरी आयु में बारह वर्ष का अंतर है।

“हाँ,” धर्मवीर भैया हैरत से मेरा मुँह ताकने लगे, “तुम्हें किस ने बताया?”

“जाई ने। उन्होंने यह भी कहा वह मेरी माँ थीं . . .”

“तुम ने ज़रूर ग़लत सुना होगा। जाई के प्यार में कोई कमी पाई तुम ने?” धर्मवीर भैया ने मेरी पीठ घेर ली।

“नहीं। लेकिन जाई ने कहा मुझ से। शशि मुझे अपना दूध पिलाया करती थीं। वह मेरी माँ थीं। जाई मेरी माँ नहीं थीं,” सच मापने के लिए अतिरंजना ज़रूरी थी।

“तो फिर उन्होंने ग़लत कहा। बेहोशी में लोग अक्सर अनाप-शनाप बोल दिया करते हैं . . .”

“लेकिन अनाप-शनाप का भी कोई आधार तो होता ही है,” मैं अड़ गया।

“यह सच है शशि जीजी तुम्हें बहुत प्यार करती थीं और . . .”

“मगर मुझे वह याद क्यों नहीं?”

“उन की बात छोड़। और कोई बात सुना। अपनी क्रिकेट के बारे में। अपनी स्कूल टीम के बारे में। किसी मैच के बारे में . . .”

“नहीं। पहले आप बताइए वह मरीं कैसे?”

“मैं नहीं जानता। मैं स्कूल में था। स्कूल से लौटा तो घर में भीड़ जमा थी और वह बीच में लेटी थीं।”

“किसी से आप ने पूछा नहीं, वह मर कैसे गईं?”

“बीमार तो वह अक्सर रहती ही थीं। किसी दिन बुख़ार है तो किसी दिन मिचली। उल्टी उन्हें बहुत आती थी . . .”

“मगर उन चीज़ की दवा भी तो होती है . . .”

“तुम ऐसे-कैसे बोल रहे हो? जाई तो उनका बहुत ख़्याल रखती थीं। और फिर उनके मरने का सब से ज़्यादा दुख तो जाई ही को था। उनसे कौन क्या पूछता? अब जाई चली गईं हैं तो नानी अम्मा को कौन घेरे बैठा है, वह कैसे मर गईं . . .”

“शशि मेरी माँ थीं? थीं न?” मैंने एक अंतिम प्रयास किया।

“नहीं भई,” धर्मवीर भैया ने मुझे अपने अंक में भर लिया, “हम दोनों सगे भाई हैं। जाई की अनाप-शनाप भूल जा . . .” 

(3) 

मैं नानी अम्मा के पास चला आया। वह सोने जा रहीं थीं। मैं उन की बग़ल में जा बैठा।

“शशि को आप जानती थीं? उनके बारे में बताइए।”

“तू क्यों पूछ रहा है?” वह चौंक उठीं।

“क्योंकि मैं जान लिया हूँ, वह मेरी माँ थीं। जाई ने आज मुझे सब बताया . . .”

“दोनों अभागी थीं। दुख ही दुख ऊपर से लिखवा कर आईं थीं। और अपने-अपने लेखे का दुख भोग कर चली गईं,” नानी अम्मा रोने लगीं।

“शशि की जान जाई ने ली थी?”

“जैवंती ने उसके कारण बहुत दुख भोगा,” मेरी बात पर उनकी रुलाई ने कान न धरने दिया, “शुरू में तेरा बाऊ शशि को अपने घर पर रखने को तैयार न था, बोला था, लड़की की ब्याहने लायक़ उम्र है। किसीसे ऊँच-नीच हो गई तो बदनामी मेरी होगी . . .”

“क्या उम्र थी उनकी?”

“उम्र क्या पूछते हो उसकी? अभी बीस भी पार न की थी जब उम्र उस की पूरी हो गई . . .”

“नहीं, नानी अम्मा, मैं तो यह पूछ रहा था वह किस उम्र में जाई के पास रहने आई रहीं?”

“यही कोई सत्तरह-अठारह की रही होगी। दीन-हीन। जैवंती को उस समय अपनी सनक दिक किए थी, अपनी बहन की बेटी को अपनी भाभियों के हाथों इतनी दुत्कार-फटकार पाते हुए मुझ से और देखा नहीं जाता। इसे मैं अपने घर पर रखूँगी। अपनी निगहबानी में . . .”

“बाउजी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़?”

“नहीं, पहले तो यही बोली, भेज दूँगी वापस। ज़रूर भेज दूँगी लेकिन अब लाई ही हूँ तो कम से कम एक दो हफ़्ते तो रख ही लूँ। वरना भाभियों के सामने मेरी गर्दन नीची हो जाएगी। बस उन्हीं दो हफ़्तों में जैवंती ने तेरे बाऊ को तैयार करने में तरकीब क्या लगाई कि अपनी क़ब्र आप ही खोद ली . . .”

“कैसी तरकीब?”

“तेरे बाऊ के कपड़े-लत्ते, जूते-चप्पल, नाश्ता-पानी सब शशि के सुपुर्द कर दिया। और जब जैवंती की पूरी तसल्ली हो गई कि शशि तेरे बाऊ को क़ायल कर चुकी थी तो उससे शशि की वापसी की पूछी, शशि को छोड़ने जाना है, कब जाऊँ? तो तेरे बाऊ ने कहा, अभी जल्दी क्या है? देख तो, हमें और हमारे घर को कैसे सँभाले है!”

“फिर?”

“बस फिर उसी दिन से तेरे बाऊ ने जो ख़रीदारी जैंवंती के लिए भी कभी न की थी, अब नाम जैवंती का ले और दो-दो जोड़ी साड़ी लाए, चार-चार दोनों में नमकीन-मीठा लाए और कहे, तुम्हारा और शशि का हिस्सा एक बराबर। जैवंती अगर कुछ समझी भी तो देखी-अनदेखी कर गई। शशि से लाड़, मानो उसीका सत्कार। शशि आख़िर उसी की इकलौती बहन की निशानी थी। सगी मौसी को छलेगी तो कैसे छलेगी? ठगेगी तो कैसे ठगेगी? पति कुछ ऊँची-नीची करेगा तो भाँजी उसे बताएगी ही बताएगी। शिकायत करेगी। मगर अनहोनी हो कर रही . . .”

“कैसी अनहोनी?”

“शशि को गर्भ ठहर गया। तेेरे बाऊ ने उसे गिराने नहीं दिया। जभी मैंने रास्ता निकाला उन मौसी-भाँजी को अपनी भरोसेमंद एक रिश्तेदारिन के घर जा ठहराया। वहाँ से लौटीं तो जैवंती ने तुम्हें अपना बताया, यह मेरा यशवीर है। मेरा छोटा बेटा।”

“बाउजी को तो पता रहा होगा मैं किस जाई का बेटा हूँ . . .”

“क्यों नहीं पता था? सब पता था। अब जैवंती कहे, शशि यहाँ नहीं रहेगी। और बाऊ तेेरा कहे शशि यहाँ से नहीं जाएगी। ऊपर से उसके चोर-थन। तुझे दूध पिलाए तो खटपट, न पिलाए तो आफ़त। तेरा बाऊ घर में कोहराम मचाए, वह अलग . . .”

“और ऐसे में जाई ने उन्हें मार डाला?” अनदेखी अपनी उस माँ के लिए मेरे मन में अथाह करुणा जाग आई।

“सब तेरे बाऊ की करतूत थी। जिसने शशि को दोबारा गर्भ दे कर घर में दो कंकाल तैयार कर दिए। एक अपनी बदचलनी के चलते और दूसरा उसकी बदचलनी को बरदाश्त न कर पाने की मजबूरी के रहते . . .”

दुखदायौ नानी अम्मा की दुहाई-तिहाई ने हवा में एक साथ कई गेंद उछाल दिए।

मेरे साथ दाँव खेलने के वास्ते। 

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