(१)

 

गाड़ी अभी बालामऊ में ही थी जब माँ ने सीट के नीचे से सारा सामान निकालकर हमें सब समझा दिया– दोनों थैले सुमन के ज़िम्मे रहेंगे और खाने की टोकरी के साथ पानी का डिब्बा सुरेश के। लोहे का नया बक्सा घसीट कर डिब्बे के दरवाज़े तक मुझे ले जाना था जबकि नए सूटकेस को अपनी निगरानी में मेरी मदद लेकर माँ ख़ुद नीचे उतर लेंगी।

हम लोग जब भी धामपुर से लखनऊ लौटते यों ही लदे-लदे लौटते। उधर धामपुर में हमारे नाना के पास आटे की बहुत बड़ी चक्की थी। चार बेटे और बारह पोते-पोतियाँ थीं। सभी की बची-खुची चीज़ें माँ हर साल हमारी गर्मी की छुट्टियों में बटोरती हीं, साथ ही कोई न कोई भारी सामान भी छाँट लातीं। एक साल अगर वहाँ से मुड़वाँ चारपाई उठाए होतीं तो अगले साल दो-दो मोटी रजाई।

उस साल हम लोग शशि के दहेज़ का सामान लाए थे।

“लगता है तेरा कार्ड तेरे बाऊजी को मिला नहीं,” लखनऊ स्टेशन पर बाऊजी को कहीं न पाकर माँ मुझ से बोली।

“कार्ड मैंने तुम्हारे सामने लिखा था,” भाइयों में सबसे बड़े होने के नाते घर की सारी चिट्ठी-पत्री मेरे ज़िम्मे थी, “बीस जून को अपनी टिकटें मिलने के दिन।”

उस दिन दस जुलाई थी।

“जा देख कोई जान-पहचान की टैक्सी मिल जाए,” माँ ने मुझे दौड़ा दिया। बाऊजी टैक्सी चलाते थे और इसीलिए हमारी सवारी भी टैक्सी ही रहा करती।

“नहीं,” मेरे पूछने पर टैक्सी स्टैंड पर मिले वल्लभ चाचा ने मुझे बताया। शशि की सगाई उन्हीं के कुटुम्ब के एक लड़के से तय हुई थी- “बल्कि इधर तो कई दिनों से वह हमें भी कहीं दिखाई नहीं दिया है। मगर तुम चिन्ता क्यों करते हो? तुम लोगों को तुम्हारे अड्डे पर मैं पहुँचा आता हूँ।”

 

(२)

 

“हमारा कार्ड क्या आया नहीं?” घर में दाख़िल होते ही माँ ने पूछा।

“न,” शशि और दिनेश एक साथ बोल पड़े। आठ साल पहले सुरेश के आने से जब हम भाई-बहनों की गिनती पाँच तक पहुँच ली तो माँ हम में से तीन को ही अपने संग धामपुर ले जाने लगी। हाँ, पहला बेटा रहने के नाते मैं अकेला ऐसा रहा जो हर बार माँ के साथ धामपुर जाने में सफल हो ही जाता था।

“बल्कि मैं घबरा रही थी,” शशि ने जोड़ा-क्या वह पहले से दुबली नहीं लग रही थी?- “इधर स्कूल खुलने वाले हैं और उधर आप लोगों की कोई ख़ाबर ही नहीं . . . ”

“तेरे बाऊजी कब गए?” माँ ने पूछा।

“सुबह तड़के। बोले टूर पर जा रहा हूँ। लौटने में देर हो सकती है . . . ”

माँ के घर न रहने पर बाऊजी कम ही घर से बाहर का टूर लगाते। वरना माँ के रहने पर उनके टूर कई बार उन्हें हफ़्ते-दस दिन तक लखनऊ से बाहर रख लिया करते।

“मेरे लिए क्या लाई?” लगभग डेढ़ महीने बाद माँ को देखकर दिनेश लाड़ से माँ के कंधे पर झूलने लगा।

“दिखाती हूँ,” हँसकर माँ ने उसे अपने आलिंगन में बाँध लिया, “सब दिखाती हूँ। मगर पहले यह बता मेरे पीछे तूने शशि को तंग तो नहीं किया?”

“न। बिलकुल नहीं . . . ”

“दिन भर यहीं घर रहा?”

“हाँ . . . ”

“क्यों यह ठीक कह रहा है, शशि?”

“हाँ,” शशि बोली, “इससे मुझे कोई शिकायत नहीं।”

"तेरे लिए एक सेट बनवा कर लाई हूँ; बाली तो उसकी बेहद प्यारी हैं, देखेगी तू तो खिल उठेगी . . . ”

“पहले मेरी चीज़ दो,” दिनेश इठलाया।

“ले,” खाने की टोकरी से माँ ने पिन्नी का डिब्बा निकाला।

मगर दिनेश ने अभी डिब्बा खोला ही था कि शशि फूट-फूट कर रोने लगी और रोते-रोते कै करने लगी।

“तू रोती क्यों है, पगली?” माँ की आँखें भी गीली हो लीं, “यह तो समाज की रीत है। तू समाज से अलग है क्या? तुझे ससुराल भेज कर क्या मैं न अकेली पड़ जाऊँगी? या ये चारों न अकेले पड़ जाएँगे?”

देखा-देखी हम पाँचों भाई-बहन रोने लगे। शशि हमें बहुत प्यारी थी। देखने में तो वह लावण्यमयी थी ही, स्वभाव भी उसका बहुत ही मधुर था। कभी ऊँचे न बोलती। माँ उसे कभी डाँटती भी तो पलट कर कभी जवाब न देती। बाऊजी का भी ध्यान ज़्यादा वही रखती। घर में उनका पैर पड़ते ही रसोई की ओर लपक लेती और उनकी रसोईदारी में लग जाती। हम भाई-बहनों में एकमात्र शशि ही ऐसी थी जिस पर बाऊजी ने भूलकर भी कभी हाथ न छोड़ा था।

रात में माँ ने हमारे साथ खाना न खाया।

बाऊजी के इन्तज़ार में।

आम दिनों माँ बाऊजी का न करती। मगर जिन दिनों वे धामपुर से ताज़ी-ताज़ी आई होतीं बाऊजी का इन्तज़ार ज़रूर करतीं। उन दिनों बाऊजी भी बाहर का टूर न बनाते, समय पर घर लौटते और रात का खाना हम सब साथ में खाते। धामपुर से लाई चीज़ों के हिसाब से हमारे उतने दिन ख़ूब चैन-भरे कटते और आपस की ज्यों-त्यों मौक़ा पड़ने पर भी टाल दी जाती।

“तेरे बाऊजी तो आए नहीं?” रात बारह बजे के क़रीब माँ बहुत घबरा गईं, “क्या मेरे पीछे भी ऐसा कभी किया उन्होंने?”

“हाँ,” शशि ने कहा, “एक बार पूरे दो दिन उन्होंने अपना कोई अता-पता न दिया था . . .”

“कब? कब किया ऐसा?”

शशि का जवाब मेरी झपकी ने मुझे सुनने न दिया।

 

(३)

 

अगली सुबह माँ ने एक पोस्टकार्ड मेरे हाथ में थमाया और बोलीं, “अपनी बुआ को ख़त लिख . . . ”

“क्या लिखना है?” मैंने पूछा।

“श्री बांके बिहारी की जय। आगे समाचार बहुत बुरा है। पाँच-सात में पड़ी हूँ। जितनी जल्दी आ सकती हो, तुम आ जाओ। बड़ी बात है: मामूली बढ़ी-चढ़ी नहीं। एक-एक साँस पहाड़ सा बीत रहा है। आने में काहिली करोगी तो मेरा मरा मुँह देखोगी।”

बाऊजी क्या हमें छोड़ भागे थे?

कोई नया टंटा मचाने?

मैं डर गया।

 

(४)

 

“क्या हुआ?” बुआ वाराणसी में रहती थीं और कार्ड मिलते-मिलाते लखनऊ पहुँचने में उन्हें आठ दिन लग गए।

बाऊजी, ख़ैर, अभी तलक़ अपने टूर से न पलटे थे।

“सुनेगी तो गश खा जाएगी,” माँ ने बुआ को चेतावनी दी।

उस समय दिनेश और सुरेश बुआ द्वारा लाई गई तिरंगी बरफी हाथ में लिए बाहर घूमने निकल गए थे और सुमन रसोई में चाय बना रही थी।

कनसुई लेने मैं दरवाज़े से जा सटा।

“भाई को कोई बीमारी लग गई क्या?” बुआ रोने लगीं।

बाऊजी के परिवार में हम केवल इन्हीं बुआ को पहचानते थे। पूरे परिवार में एक वही थीं जिन्होंने किसी भी भाई से अपना नाता न तोड़ा था। अपने तीनों भाइयों से वे सबसे बड़ी भी रहीं और सबसे ज़्यादा पैसे वाली भी। उनकी शादी हमारे दादा ने अपने अच्छे दिनों में की थी। एक ज़माने में हमारे दादा मुरादाबाद में गल्ले के ऊँचे आढ़ती रह चुके थे लेकिन पन्द्रह साल पहले उनके गोदाम में लगी एक भीषण आग ने उनके व्यापार को जो गहरा झटका दिया तो उनके बड़े और मँझले लड़के उनके मुक़ाबले में आ खड़े हुए। दोनों एक से एक बढ़ कर नालायक़ और धन-खारु। तिस पर एक-दूसरे के बैरी। आनन-फानन पुश्तैनी सारी जायदाद चार हिस्सों में बँट गई। हमारे ताऊजी ने अपना हिस्सा बेचकर वहीं मुरादाबाद में अपना किराना जमा लिया और मँझले हमारे बाऊजी, अपना हिस्सा बेचकर इधर लखनऊ आन बसे। उस समय शशि तीन साल की थी और मैं छह महीने का।

“तेरी लड़की झूठी है,” बुआ की चीख़ बाहर तक साफ़ चली आई, “एकदम झूठी . . . ”

“सारी नालायक़ी तेरे भाई की है,” माँ का मिज़ाज भी भड़क लिया, “मेरी लड़की बेचारी तो लिहाज़दारी में मारी गई . . . ”

“हट, मुई,” बुआ के धौल की आवाज़ जैसे ही मुझ तक पहुँची, मैं अन्दर लपक लिया।

बुआ शशि का मुँह तमाचों से लाल कर रही थीं और माँ बुआ का कंधा अपनी ओर खींच रही थीं। अपने दुबले सींकिया शरीर के पूरे ज़ोर के साथ . . . 

“छोड़िए, बुआ जी,” मेरे लिए बुआ को शशि से अलग करना आसान रहा, एकदम आसान। अपने स्कूल की हॉकी टीम का मैं कप्तान था और मेरी क़द-काठी भी मज़बूत थी, “आप यह क्या कर रही हैं?”

“तू समझ ले,” गदगद स्वर में माँ बुआ को अकड़ीं, “समझ ले अब। मैं अब अकेली नहीं। मेरे बच्चे मेरे साथ हैं . . . ”

“ये बच्चे तुझे दिए किसने?” बुआ ने माँ को ललकारा, “इन्हें क्या तू अपने साथ लाई थी? धामपुर से?”

 

(५)

 

बाऊजी दसवें दिन आए।

हमेशा की तरह हलुवे के डिब्बे के साथ।

मिठाई में मूँग की दाल का हलुवा उन्हें ख़ास पसन्द था।

“अब आए हो?” करेले में धागा बाँध रही माँ हाथ का काम छोड़ कर बाऊजी की ओर बढ़ ली।

“यह हलुवा है,” बाऊजी ने हलुवा का डिब्बा माँ की ओर बढ़ाया, “बच्चों को अभी परोस दो। इस समय अच्छा, गरम है . . . ”

“आप स्टेशन पर नहीं आए?” सुरेश बाऊजी के घुटनों पर आ चढ़ा।

दिनेश और सुमन भी उनकी बगल में जा खड़े हुए।

“लो सुमन,” बाऊजी ने हलुवा का डिब्बा सुमन को पकड़ा दिया, “सबको परोस दो . . . ”

“हाँ बाऊजी,” सुमन ने उत्साह दिखाया, “अभी लीजिए . . . ”

"ताज़ा ख़बर कहाँ है?” सबके सिर पर हाथ फेरते-फेरते बाऊजी मुझे तलाशने लगे। अख़बार में मेरी गहरी रुचि देखकर बाऊजी ने दसवीं जमात के मेरे उस साल की शुरुआत में ही मेरे लिए मेरी पसन्द की अख़बार लगवा दी थी और मुझे वे ‘ताज़ा ख़बर’ के नाम से अक़्सर छेड़ा करते।

“कहीं नहीं?” कमरे के अन्दर से मैं फ़ौरन आँगन में पहुँच लिया। मेरे साथ बाऊजी का रिश्ता कभी भी लाड़-दुलार का न रहा। मेरे बचपन का वक़्त और बाऊजी की फ़िक्र का वक़्त एक रहा था और जब तक बाऊजी थोड़े बेफ़िक्र हुए थे मुझ से छोटा दिनेश तीन साल का हो चुका था और उनकी थपकी पर मुझसे ऊँची कूद लगाने को तैयार था।

“और शशि?” बाऊजी ने मेरे सिर पर हाथ फेरा।

“न!” माँ ने हाथ नचाए, “उसका मुँह देखने लायक़ तू है क्या?”

“वह मेरी औलाद है,” एक झटके के साथ बाऊजी हमसे अलग हो गए और माँ को पीटने लगे, “मेरी अपनी जायदाद। तू बीच में दो-दो चोंच लड़ाने वाली कौन है?”

बाऊजी माँ को अक़्सर पीटते और देर तक पीटते।

हलुवे के डिब्बे के साथ सुमन रसोई की ओर चल दी।

दिनेश और सुरेश उसके पीछे हो लिए।

मुँह फेर कर मैं कमरे में लौट आया।

खिड़की के पास शशि सहमी खड़ी थी।

“बाऊजी ने तेरे साथ बलात्कार किया?” पिछले कई दिनों का अपना सवाल मैं अपनी ज़बान पर ले आया।

“हाँ,” शशि की आँखें सूखी थीं और चेहरा ख़ाली।

“माँ पुलिस में रिपोर्ट देंगी?” मैं काँपने लगा।

जग-हँसाई से मुझे बहुत डर लगता है।

“शैदाई,” शशि ने मुझे त्यौरी दिखाई, “पुलिस बाऊजी को फाड़ न खाएगी?”

 

(६)

 

बारहवें-पन्द्रहवें रोज़ माँ ने शशि को अस्पताल ले जाने की बात उठाई तो बाऊजी ने माँ पर फिर हाथ फेंका, “ख़बरदार! वह मेरी छठी औलाद है। शशि उसे ज़रूर जनेगी . . . ”

“और पड़ोसी जो पूछेंगे . . . ”

आनन-फानन बाऊजी ने लखनऊ का मकान ख़ाली करने का मन्सूबा तैयार कर लिया और तीसरे हफ़्ते हमें टैक्सी में बिठा कर कस्बापुर ले आए: “शशि अपनी औलाद यहाँ जनेगी . . . ”

कस्बापुर का हमारा पड़ोस अजनबी था। शशि को एक तलाक़-शुदा ब्याहता मानने में उन्हें कोई मुश्किल न हुई।

लेकिन हमारी पढ़ाई की बड़ी दुर्गति बनी। लखनऊ के मुक़ाबले में कस्बापुर के स्कूल बहुत निकम्मे थे और हमारे टीचर एकदम फटीचर। वे हमें पढ़ाते कम और टोकते ज़्यादा।

उधर घर में माहौल अक़्सर बिगड़ा रहता। जितने दिन बाऊजी अपने लम्बे टूरों पर रहते माँ फिर भी थोड़ी-बहुत हिल-डुल लेतीं लेकिन इधर वे कस्बापुर पहुँचते तो उधर माँ चारपाई पकड़ लेतीं। उनके पेट में रह-रहकर मरोड़ उठते और वे केवल दस्त करते समय ही अपनी चारपाई छोड़तीं।

‘छठी’ का जन्म अस्पताल में हुआ। शशि के साथ टैक्सी में बाऊजी सुमन को लेकर गए। माँ जाने की स्थिति में न थीं। उन दिनों उनकी हालत और भी पतली रही और सातवें दिन जब छठी पहली बार हमारे घर आई तो माँ का मलाल दुगना-चौगुना हो गया। वे लगातार बड़बड़ाने लगीं, चीख़ने लगीं चिल्लाने लगीं, “प्रलय आ गई है, प्रलय। देखो/हटो/बचो/ हम पर पहाड़ टूट रहा है . . . ”

उधर छठी के लिए बाऊजी का चाव देखे न बनता।

उसके लिए वे दूध की बोतल लाते तो दो, बिछौना लाते तो दो, पोशाक लाते तो दो। कहते, घर में एक फ़ालतू चीज़ पड़ी रहनी चाहिए।

उन दिनों अख़बार में छपी हर हत्या की, हर आत्महत्या की, हर पुलिस रिपोर्ट की ख़बर मैं दस-दस बार पढ़ता और खीझता:

बाऊजी अख़बार क्यों नहीं पढ़ते?

माँ अख़बार क्यों नहीं पढ़ती?

शशि अख़बार क्यों नहीं पढ़ती?

इनकी ख़बर अख़बार में क्यों नहीं छपती?

 

(७)

 

“आपका अख़बार चाहिए,” उस दिन पड़ोसिन अख़बार माँगने आई, “सुना है दसवीं जमात का उसमें नतीजा आया है . . . ”

“दसवीं जमात का?” छठी को गुदगुदा रहे बाऊजी के हाथ उसी पल रुक गए। अब वे टूर पर न जाते थे और कस्बापुर में टैक्सी लेने-लिवाने की हैसियत कम ही लोगों के पास थी। फलस्वरूप बाऊजी के दिन का एक बड़ा हिस्सा घर में बीतता।

“नरेश . . . ” बाऊजी ने फ़ौरन मुझे आवाज़ दी, “अख़बार इधर लाओ। पहले तुम्हारा रोल नम्बर देखेंगे . . . ”

“मैं फ़ेल हूँ,” पूरे घर में मेरे सिवा मेरा रोल नम्बर कोई नहीं जानता था।

अख़बार लेकर पड़ोसिन जैसे ही लोप हुई बाऊजी ने अपनी पैंट से अपनी पेटी निकाली और मेरी नक़ल उतारते हुए मेरी तरफ़ बढ़ लिए, “मैं फ़ेल हूँ? नालायक़! तेरी पढ़ाई पर मैंने इतनी रक़म लगाई और, ‘मैं फ़ेल हूँ’?”

“मुझे पीटेंगे तो मैं थाने पहुँच जाऊँगा,” बाऊजी की पेटी वाला हाथ मैंने कस कर पकड़ लिया, “आपकी नालायक़ी की रिपोर्ट लिखाने . . . ”

बाऊजी सकपका गए।

सहसा।

फ़ौरन फिर उन्होंने अपना सामान बाँधा छठी का सामान बाँधा और उसे गोदी में लिए-लिए अपनी टैक्सी में उड़ लिए।

 

(८)

 

“मैं फ़ेल नहीं हूँ,” मैं तत्काल माँ की बगल में पहुँच लिया, “येन-केन प्रकारेण . . . ”

माँ उठकर बैठ गईं और हँसने लगी।

“येन केन क्या?” माँ की हँसी सुमन को हमारे पास खींच लाई।

“यह संस्कृत है,” मैं हँसा, “येन केन प्रकारेण . . . ”

“इसका मतलब?” शशि भी हमारे पास चली आई।

“येन केन प्रकारेण मतलब चाहे जैसे . . . ”
“येन केन प्रकारेण,” माँ ने दोहराया और दोबारा हँस पड़ीं . . .  ज़्यादा ज़ोर से . . .  “बाऊजी से तूने झूठ क्यों बोला?” लेकिन शशि ने मुझे शाबाशी न दी। क्या उसे छठी मुझ से ज़्यादा प्यारी रही?

“हाँ,” मैंने कहा, “अपनी ख़ुशी का कोई हिस्सा मैं उन्हें नहीं देना चाहता . . . ”

“समझ लो अब,” माँ की पुरानी दृढ़ आवाज़ लौट आई, “समझ लो तुम्हारा बाप अब एक अजनबी से ज़्यादा हमारा कोई नहीं। और उसकी वह छठी औलाद वह भी मानो, पैदा ही न हुई थी। इधर का सब हिसाब-किताब अब बन्द कर देंगे और उधर धामपुर जा बसेंगे। उधर शशि की शादी का बन्दोबस्त भी आसानी से हो जाएगा। वहाँ कौन जानता है शशि पर कैसी घनघोर ज़बरदस्ती हुई थी . . . ”

“नहीं,” मैंने माँ को टोक दिया- “मेरी हॉकी के लिए लखनऊ से बढ़िया कौन जगह रही?

“हम लोग धामपुर न जाएँगे। लखनऊ जाएँगे . . . ”

“लखनऊ के स्कूल भी हमारे लिए बेगाने नहीं,” मेरे सुझाव पर अपनी सहमति देने की सुमन को हमेशा जल्दी रहती, “वहाँ दाख़िला मिलना आसान रहेगा . . . ”

“वल्लभ चाचा को मैं आज ही एक कार्ड लिख भेजता हूँ,” मैंने कहा, “पहली जून तक वे हमारे लिए अपने पड़ोस में किराए का कोई मकान खोज लें . . . ”

“कार्ड जवाबी भेज,” माँ नए उत्साह से भर उठीं, “वल्लभ के जवाब से यह भी पता चल जाएगा शशि की वह पुरानी सगाई उसे अब माननीय है या नहीं . . . ”

अपने दुपट्टे के छोर से अपना मुँह ढँककर शशि सिसकने लगी।

 

(९)

 

लखनऊ हमें रास आया। संयोगवश इस वर्ष हम सभी की परीक्षाएँ बोर्ड की रहीं। मेरी इन्टरमीडिएट की। सुमन की दसवीं की। दिनेश की आठवीं की और सुरेश की पाँचवी की।

घर में मालमता भी अब अपर्याप्त नहीं। माँ और सुमन चिकन की कढ़ाई करती हैं, सुरेश और दिनेश फल का ठेला लगाते हैं। यहीं अपने मुहल्ले में। और मैं सुबह मुँह अँधेरे अख़बार लगाने का काम करता हूँ और दिन ढलने पर एक रेस्तरां में खाना परोसने का।

हाँ, शशि और मेरी हॉकी को बनाए रखने में लखनऊ ज़रूर असफल रहा।

हॉकी मेरी व्यस्त दिनचर्या में कहीं ठीक बैठी नहीं और शशि को हमने मिलकर अपने हाथ से जाने दिया। चूक हमीं से हुई। शशि ने शादी करने से लाख बार इनकार किया। लेकिन फिर भी हमने वल्लभ चाचा के भतीजे के संग उसे ब्याह ही दिया। हमें भ्रम था वह लड़का उदार और भला था लेकिन वह शक्की और बदमिज़ाज निकला। फलस्वरूप अपने विवाह के एक माह के भीतर ही शशि मर गई।

बुआ दोनों बार वाराणसी से आई थीं। शशि की शादी पर और उसकी किरिया पर। उन्हीं से पता चला, बाऊजी यहाँ से सीधे वाराणसी गए थे। बुआ के पास। फिर बुआ को अपनी टैक्सी में बिठाकर मुरादाबाद गए। बुआ की कहा-कही पर हमारी दादी ने छठी को अंगीकार कर लिया और बाऊजी के अनुनय-विनय पर हमारे दादा ने बाऊजी को।

धामपुर की तरफ़ भी काग़ज़ के घोड़े हम तिमाही-छमाही दौड़ा ही देते हैं। लेकिन अब वहाँ माँ अकेली ही जाती हैं। हममें से कोई भी उनके साथ नहीं जाता।

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