दुनिया भर के लोगों की हँसने और रोने की भाषा एक होती 

01-09-2025

दुनिया भर के लोगों की हँसने और रोने की भाषा एक होती 

विनय कुमार ’विनायक’ (अंक: 283, सितम्बर प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 
दुनिया भर के लोगों की 
हँसने और रोने की भाषा एक होती 
दीन औ’ ईमान अल्लाह और भगवान 
अलग-अलग हो सकते! 
  
भाषा धर्म संस्कृति मज़हब 
हमारी समझ में अलग-अलग हो सकते
मगर मानवीय हँसी ख़ुशी रुदन एक जैसे
बग़ैर भाषा के समझे जा सकते! 
 
मज़े की बात है 
कि हँसी ख़ुशी रुदन की अभिव्यक्ति 
मानव के अलावा 
अन्य किसी जीव जन्तुओं में नहीं होती! 
 
किसी को मत सिखाओ अपना धर्म मत 
मत थोपो किसी को अपना मत मज़हब रब
कि सबके सब नहीं जानते 
सबकी भाषा संस्कृति रीति रिवाज़ आवाज़ 
मानव को ख़ुद समझने दो अपना धर्म आज! 
 
हो सकता है तुम भी नहीं जानते 
उस भाषा संस्कृति को जिसकी शब्दावली 
तुम अपनी आस्था से जोड़ लिए बैठे हो 
और कुप्रभाव में तोड़ लिए पड़ोसी से रिश्ते नाते! 
  
हो सकता है तुम 
जिस भाषा संस्कृति मज़हब को अपने समझ बैठे 
वो किसी दूसरे के थोपे दिल में रोपे गए हो सकते 
किसी दौर में तुम्हारे पूर्वजों को डरा धमका रुलाके
विदेशी भाषा सीखने के लिए मजबूर किए गए होंगे! 
 
अस्तु आरंभ से आजतक मानव द्वारा 
कोई भाषा सही-सही समझी नहीं जा सकी 
और कभी भी समझी नहीं जा सकेगी
क्योंकि भाषा मानव की जन्मजात चीज़ नहीं! 
 
भाषा प्रयोक्ता के साथ अर्थ बदलते रहती 
भाषाई अभिव्यक्ति का पहले जो अर्थ था 
समय के अंतराल व संदर्भ में बदल जाता
भाषा अभिव्यक्ति प्रयोक्ता की मनःस्थिति 
कभी सही तरह से समझी नहीं जा सकती! 
 
भाषा एक खोज है 
अपने विचार को लोगों तक पहुँचाने के लिए 
भाषा बँधन है लोगों को गुमराह करने के लिए भी
कोई भाषा अगर ऐसा कुछ करने लगे 
तो छोड़ दो ऐसी भाषा आस्था व्यवस्था की ग़ुलामी! 
 
होना तो यह चाहिए अन्य जीव जन्तुओं की तरह 
मानव मानव को बग़ैर भाषा के समझे और प्यार करे 
मानव मानव को हँसाने खिलखिलाने का व्यवहार करे 
मानव भाषा से मानव का दोहन शोषण शिकार न करे! 
 
भाषा नहीं होती तो मानव स्वाभाविक जीव होता 
ईश्वर अल्लाह ख़ुदा व शैतान की गाथा ना होती 
भाषा के कारण मानव ईश्वर का डर फैलाने लगा 
भाषा से मानव में अच्छाई से अधिक बुराई आई 
भाषा लिपि लेखनी ने आदमी को बनाया बलवाई! 
 
जाने कब किसने ईश्वर अल्लाह के बहाने 
मानवता के ख़िलाफ़ भाषा में अपौरुषेय बातें लिख डाली 
जिसका दुष्परिणाम आह सिसकियाँ आजकल दिखने लगे
जो भाषाबद्ध नहीं होती तो मानव जाति तबाह नहीं होती! 
 
मानव विरुद्ध जितने घृणा द्वेष जलन के जलजले दिखते 
भाषा में शातिर द्वारा पूर्वनियोजित ढंग से बोए उगाए लगते 
जिसे आज मनगढ़ंत अर्थ व तर्जुमा बताकर आपस में लड़ाते! 
  
मानव ऐसा करे भाषा की जहालत से उबरे
सड़ी गली मान्यताओं को भाषा से दूर करे
बिना भाषा बंधन व किताबी उलझन में पड़े
ख़ुद हँसे मुसकुराए रोते हुए मानव को हँसाए! 
 
कि दुनिया भर के लोगों को हँसाने के लिए 
कोई बोली भाषा सीखनी नहीं पड़ती 
कि दुनिया भर के लोगों को हँसाने के लिए 
किसी भाषा की आवश्यकता नहीं होती! 

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