नकारने का रोग

02-10-2016

नकारने का रोग

सुभाष चन्द्र लखेड़ा

उसे दूसरों को नकारने का रोग था। वह इंसानों को ही नहीं, प्रकृति को भी नकारता रहता था। आदतन एक दिन वह जेठ की भरी दोपहरी में सूरज को नकारते हुए घर से किसी काम के लिए निकला।

उसने सर ढकना या पानी लेकर चलना भी मुनासिब न समझा। लगभग एक किलोमीटर की दूरी पैदल तय करने के दौरान वह पसीने से तर-बतर हो चुका था। सामने एक पीपल का विशाल वृक्ष था किन्तु रुकना उसे पसंद नहीं था। वह चलता रहा... चलता रहा और फिर गश खाकर गिर पड़ा। उसे कोई देख न पाया और समय रहते उपचार न मिलने से वह चल बसा। लोग यही कह रहे थे कि वह लू लगने से मरा जबकि वह "नकारने के रोग" की वजह से मरा था।

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