अपने - पराये

01-03-2015

उन सब के मन में एक ही विचार था। ऐसा कुछ किया जाए जिससे दो परिवारों के उस सुखद मिलन में बाधा पैदा हो। एक दूसरे के आशय को समझते हुए उन्होंने दारू का सहारा लिया। दारू पीने वाले अक्सर इस भ्रम में रहते हैं कि उनके कुत्सित कार्य दारू के पानी में छुप जायेंगे। दरअसल, उन्हें यह तमाशा तब करना था, जब दूल्हे और बारात का स्वागत समारोह स्थली के मुख्य द्वार पर किया जाता है। जैसे ही बारात स्वागत द्वार पर पहुँची, उन्होंने बरातियों के लिए लाई गई फूल मालाओं को आपस में एक दूसरे के गले में डालना शुरू किया। लड़खड़ाते हुए वे एक दूसरे से चिपट रहे थे। वे अपने इस उद्देश्य में पूरी तरह से सफल तो नहीं हो पाए लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि दुल्हन के ताऊ जी अपने बढ़ते हुए रक्त दाब की वज़ह से बारातियों का स्वागत नहीं कर पाए। भोजन ग्रहण करते समय उनका शोर-शराबा देखते बन रहा था। ख़ैर, सब कुछ ठीक से संपन्न हो गया। एक मूक दर्शक के रूप मैं वहाँ खड़ा होकर यह सोच रहा था कि कष्ट तब अधिक महसूस होता है जब यह उन लोगों से होता है, जिन्हें हम अपना समझने की भूल करते हैं; पराये तो हमेशा से सहयोग ही देते आए हैं।

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