15-06-2019

भारतेत्तर साहित्य सृजन की चुनौतियाँ - उत्तरी अमेरिका के संदर्भ में

सुमन कुमार घई

हालाँकि भारतीय साहित्य जगत विदेशों में सृजित साहित्य को एक ही वर्ग – प्रवासी साहित्य में सीमित कर देता है, जो कि सम्भवतः उनके दृष्टिकोण से सही ही हो, परन्तु क्या ऐसा करना उचित है? यह प्रश्न विदेशों में बसे लेखक कई बार पूछ चुके हैं और निष्कर्षहीन चर्चाएँ भी कर चुके हैं, इसलिए इस बार के सम्पादकीय में इस विषय को नहीं दोहराऊँगा। इस बार चर्चा व्यवहारिक सीमाओं में रखने की चेष्टा है।

भारतेत्तर साहित्य सृजन की सबसे बड़ी चुनौती आप्रवासी/भारतेत्तर लेखकों की बढ़ती हुई औसतन्‌ आयु है। अधिकतर प्रवासी भारतीयों द्वारा भारत से बाहर आने का कारण आर्थिक समृद्धता की लालसा रही है। हो सकता है कि कुछ लोगों ने स्वयं को राजनैतिक शरणार्थी घोषित करके कैनेडा आदि देशों में प्रवेश पाने का प्रयास किया हो परन्तु परोक्ष में कारण आर्थिक ही था। यह कहानी पिछली सदी के अंतिम दशक तक ही चली। २१वीं सदी के उदय के साथ ही विदेशी सरकारें भी भारतीय औद्योगिक विकास से प्रभावित हो चुकीं थीं और उन्होंने इसका लाभ उठाने के लिए अपनी आप्रवास नीतियों में भारी परिवर्तन किये। परिणाम स्वरूप अब भारत से आने वाले आप्रवासियों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि तकनीकी हो गई। दूसरे शब्दों में विश्वविद्यालयों में जो भी उन्होंने पढ़ा, वह अँग्रेज़ी भाषा में पढ़ा। हिन्दी साहित्य और भाषा के साथ उनका संपर्क सीमित था। इसका प्रभाव विदेशों/कैनेडा के लेखक वर्ग की आयु की औसत पर सीधा पड़ा। यद्यपि मैं जीटीए (बृहत टोरोंटो क्षेत्र) में रहता हूँ, जो कि भारतीयमूल के आप्रवासियों का गढ़ है, परन्तु जब स्थानीय हिन्दी लेखकों को देखता हूँ तो बालों में बढ़ती हुई सफ़ेदी ही देखता हूँ। नए आने वाले आप्रवासियों को हिन्दी में कोई रुचि नहीं है। भारत से आए विद्यार्थियों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए आशा की किरण तो दिखाई देती है परन्तु फिर वही व्यवहारिक समस्याएँ दिखाई देनी आरम्भ हो जाती हैं। विद्यार्थियों का वीज़ा उनके शिक्षा काल तक ही सीमित होता है। कैनेडियन प्रणाली इसे अस्थायी समय के लिए बढ़ा देती है परन्तु इसके लिए शर्त है कि उन्हें अपनी शिक्षा के क्षेत्र में ही नौकरी प्राप्त हो गयी हो तो। दूसरे शब्दों में यह उन छोटी आयु वाले सम्भावित आप्रवासियों के संघर्ष के वर्ष होते हैं। ऐसे में उनसे साहित्य प्रेम की आशा रखना व्यवहारिक नहीं है। हमें अपना इतिहास नहीं भूलना चाहिए। साहित्य के प्रति प्रेम, कैनेडा आवास के आरम्भिक वर्षों में सुप्तावस्था में रहा था। एक बार पाँव जम जाने के बाद ही लिखना-पढ़ना सूझा था। जब तक कैनेडा के साहित्यिक जगत में नए रक्त का संचार नहीं होता, मनोदशा का समय के साथ शिथिल होते जाना स्वाभाविक ही है।

दूसरी बड़ी चुनौती साहित्य सृजन की विविधता का अभाव, विषयों का बासीपन और पुराने विचारों का दोहराव है। जानता हूँ कि यह कहना मेरे लिए व्यक्तिगतरूप से हानिकारक हो सकता है, परन्तु सच तो यही है। इसके कारणों पर दृष्टिपात करना भी आवश्यक है। यह परिस्थिति सभी देशों के लिए एक सी नहीं है। इंग्लैंड भारत के समीप है, खाड़ी के देश तो अगले मोहल्ले के समान ही हैं। इसलिए उनकी स्थिति इतनी बुरी नहीं है जितनी कि उत्तरी अमेरिका में। उत्तरी अमेरिका में हम लोग भारतीय हिन्दी साहित्य सृजन की मुख्यधारा से भौगोलिक दृष्टि से दूरतम हैं। हमारे लिए सहज उपलब्ध आधुनिक भारतीय सृजित साहित्य न के बराबर है। इतनी दूर से साहित्यिक पुस्तकों का आयात सम्भव नहीं है। जो इंटरनेट पर प्रकाशित होता है वह तो मिल सकता है परन्तु प्रकाशित पुस्तकों को प्राप्त करना  कठिन काम है। कुछ साहित्य प्रेमी अगर अपनी भारत यात्रा के दौरान कुछ गिनती की पुस्तकें ले भी आएँ तो वह उनके मित्रवर्ग तक सीमित है। यहाँ के पुस्तकालयों में हिन्दी साहित्य की पुस्तकें तो मिल जाती हैं परन्तु वह भी वही दशकों पुरानी पुस्तकें होती हैं जो कि हमने अपने स्कूल कॉलजों में पढ़ी थीं। भारत से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक ई-पुस्तकों को सही मानों में पुस्तकें कहने में ही संकोच होता है, साहित्यिक विशेषण तो बहुत दूर की बात है। यहाँ तक कि अमेज़ान आदि प्रतिष्ठित ई-पुस्तक विक्रेता की साइट पर भी संपादन और चयन प्रक्रिया के अभाव के कारण साहित्यिक अराजकता का ही बोलबाला है। बाक़ी वेबसाइट्स की बात करना ही बेकार है। एक-एक रचना को एक-एक ई-पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करने वालों की कमी नहीं है। विदेशों के साहित्य प्रेमियों के लिए यह ई-पुस्तक का माध्यम न होने के बराबर ही है। भारत का कोई भी प्रकाशक प्रिंटिड पुस्तकों का ई-पुस्तक का संस्करण प्रकाशित करने के लिए तैयार ही नहीं है। इन परिस्थितियों में विदेशों में बसे लाखों साहित्य प्रेमियों के लिए पुस्तकों का उपलब्ध होना एक बहुत बड़ी समस्या है। जब तक स्थानीय लेखकों को कुछ भी आधुनिक पढ़ने को नहीं मिलेगा तो निश्चितरूप से उनके रचनाकर्म में सीमित विचारों का होना बासीपन को जन्म देगा। 

इसी से संबंधित तीसरी चुनौती है। अगर स्थानीय लेखक अपने स्थानीय अनुभवों पर आधारित साहित्य सृजन करें तो उपरोक्त समस्याओं से बचा जा सकता है। यहाँ पर बाधा भारत में लोकप्रिय होने की लालसा खड़ी कर देती है। इसी लालच में पड़े भारतेत्तर लेखकों की रचनाओं को पढ़ता हूँ तो वह अभी भी वही लिख रहे हैं जो उन्होंने आप्रवास से पहले कई दशक पूर्व भोगा था। बस एक मुट्ठी भर लेखक हैं जिनका पूरा रचना कर्म उनके  वर्तमान के अनुभव पर आधारित है। इन लेखकों की रचनाओं को भारतीय समीक्षक अपने भारतीय दृष्टिकोण के खांचे में रखते हुए नकार देता है, जो कि सही नहीं है। भारत में लोकप्रिय होने की लालसा हतोत्साहित कर देती है। इसका विकल्प है कि भारतेत्तर रचनाओं की समीक्षा भी भारतेत्तर हो। परन्तु लेखक तो वही चाहता भारत की साहित्यिक व्यवस्था द्वारा स्वीकृत होना।

चर्चा अभी बहुत आगे तक चलेगी। अभी इसे यहीं विराम देता हूँ। यह खुले प्रश्न हैं, उनके उत्तर मेरी सोच तक ही सीमित हैं। आप सभी से अनुरोध है कि अपने विचारों को लिख कर भेजें ताकि इस चर्चा को आगे बढ़ाया जा सके।

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