अब मैं मौन नहीं हूँ

 

प्रिय मित्रो, 

इस विलम्बित अंक प्रकाशन के समय सम्पादकीय मौन है। 

कहने को बहुत कुछ है और विडम्बना है कि कह भी नहीं पा रहा हूँ। कोविड के बाद पहली बार भारत लौटा हूँ। एयरपोर्ट पर विमान से बाहर निकलने से लेकर अभी तक के अनुभव आपस में प्रतिस्पर्धारत हैं कि कौन-सा पहले पन्ने पर उतरेगा। एयरपोर्ट के पार्किंग लॉट के रख-रखाव से चकित और प्रभावित होने के अनुभव को लिखूँ या एयरपोर्ट के परिसर से बाहर निकलते ही ट्रैफ़िक की पारम्परिक चिल्ल-पौं के बारे में लिखूँ? मुझे और पत्नी को एयरपोर्ट पर लेने आए ड्राइवर से हुई बातचीत का लिखूँ या दिल्ली के समृद्ध इलाक़े में अपने रैन-बसेरे की विशालता का लिखूँ? एंबिएंस माल की वैभवता लिखूँ या वसन्त विहार के मेट्रो के बाहर ठेलों के आसपास की गन्दगी के बारे में लिखूँ? प्रिया कॉम्पलैक्स में दुकानें बंद होने के बाद ‘रील’ बनाने के लिए सही सेटिंग खोजते युवाओं और युवतियों की भीड़ के विषय पर लिखूँ या दाल-मसाले बेचने वाली चेन की तीन दुकानों में से एक को महकाती बाहर के नाले की बदबू के बारे में लिखूँ। दिल्ली मेट्रो की सफ़ाई और मेट्रो के अन्दर यात्रियों की शालीनता के बारे में लिखूँ, या रमेश नगर के मैट्रो तक पैदल जाते हुए, शराब की दुकान के बाहर की भीड़ के बारे में लिखूँ। क़ब्ज़ाए फ़ुटपाथ की बात करूँ या सड़क के छोर तक दुपहियों के जमावड़े के बारे में लिखूँ जो ब्लिनकिट के ड्राइवरों के हैं। कहाँ तक बात करूँ . . . अभी तो बीस-इक्कीस दिन ही हुए हैं यहाँ आए हुए, जिनमें से अधिकतर समय वसंत विहार में बीता है। वहाँ भी तो आश्चर्य हर कोने पर खड़ा था। एक दिन आठ वर्षीय युवान ने पूछा, “दादू, फ़ुटपाथ कहाँ है?” अब क्या उत्तर दूँ उसे? करोड़ों रुपये के घरों के मालिकों ने भी तो रमेश नगर के दुकानदारों की तरह फ़ुटपाथ को अपना पार्किंग लॉट बना लिया है। यह तय है कि दिल्ली का प्रशासन इनकी ओर आँख उठाकर देख नहीं सकता। 

एक दिन नीरा कह रही थी, “हम लोगों के लिए सब कुछ सामान्य है परन्तु पश्चिमी देशों से आने वाले लोगों को भारत आने से पहले अपने आपको मानसिक रूप से तैयार होना पड़ेगा।” सही तो कह रही थी। 

मायरा और युवान (मेरा पोता और पोती) हर जगह ऑटो में जाना चाहते हैं। कार की बंद खिड़कियों की अपेक्षा हवा से उड़ते बालों में उन्हें अधिक आनन्द आता है। हर जगह गायों के झुंड खोजते रहते हैं। एक दिन ज़िद पकड़ी की गाय को रोटी खिलानी है। हम दोनों उन्हें एंबिएंस माल ले जा रहे थे। नेलसन मंडेला मार्ग पर गायों के झुंड को देख कर नीरा ने ऑटो को रुकवा लिया। मुझे नहीं मालूम था कि दादी इन गायों के खिलाने के लिए अपने पोते-पोती के लिए दो रोटियाँ अपने पर्स में साथ लाई है। भोले युवान ने एक बार में पूरी रोटी खिला दी। छोटी मायरा ने पहले रोटी को दो भागों में बाँटा और एक खिलाया। फिर बचे हुए आधे को फिर दो भागों बाँटा और फिर बचे एक चौथाई को दो भागों बाँटा। शायद वह गाय को रोटी खिलाने के आनन्द को बार उठाना चाहती थी। 

कई दिनों से डॉ. आरती स्मित मिलने के लिए उत्सुक थीं। लगभग पिछले पन्द्रह वर्षों से वह साहित्य कुञ्ज में प्रकाशित हो रही हैं और कई बार व्हाट्स ऐप पर बात हुई पर कभी औपचारिक रूप से नहीं मिले थे। सो परसों यह स्वप्न भी पूरा हो गया। अब वह किसी आर्ट गैलरी में कथा-वाचन आयोजित कर रही हैं। विचार है कि लेखन कला और चित्रकला का संगम प्रस्तुत किया जा सके। पहले केवल वह अकेली ही कथावाचन कर रही थीं, अब मैं भी आमंत्रित हूँ। जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ेगा, आपको सूचित करता रहूँगा। 

देखिए है न अपने भारत की महानता! जब कहने को कुछ भी न हो तो बस द्वार को खोल कर बाहर झाँकिए। कोई न कोई बात करने वाला मिल ही जाता है। आपने मेरी बात सुनी—आपका हार्दिक धन्यवाद! 

अब मैं मौन नहीं हूँ। 

जय भारत! 

—सुमन कुमार घई

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