प्रिय मित्रो,
सम्पादकीय के विषय पर आने से पहले मैं एक शोक समाचार आपको देना चाहता हूँ। कैनेडा से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘हिन्दी चेतना’ के संस्थापक, प्रकाशक और सम्पादक श्री श्याम त्रिपाठी जी नहीं रहे। यद्यपि वह अँग्रेज़ी के अध्यापक रहे परन्तु हिन्दी के प्रति उनका प्रेम और प्रतिबद्धता का साक्षात प्रमाण ‘हिन्दी चेतना’ का निरन्तर प्रकाशन है। मेरा त्रिपाठी से परिचय ‘हिन्दी साहित्य सभा’ के एक वार्षिक कार्यक्रम के अवसर पर हुआ और उसके दो-तीन सप्ताह के बाद ही मैं ’हिन्दी चेतना’ के प्रकाशन में उनका सहायक और सह-सम्पादक का कार्यभार सम्भालने लगा। लगभग पाँच वर्ष तक मैं हिन्दी चेतना में सक्रिय रहा। इस दौरान मैं साहित्य कुञ्ज भी आरम्भ कर चुका था। हिन्दी चेतना छोड़ने के बाद भी यदा-कदा जब भी त्रिपाठी जी को कोई तकनीकी समस्या आती तो वह मुझे ही फोन करते। धीरे-धीरे हम दोनों की उम्र भी बढ़ती गई और दूरियाँ भी। वैसी दूरी नहीं जैसी आप समझ रहे हैं—पहले मैं उनसे २० मिनट की दूरी पर रहता था और अब एक घंटे की दूरी पर रहता हूँ। जब कभी भी मिलते तो पुराने दिन अवश्य याद करते, गले मिलते और बिना बात के हँसते। त्रिपाठी जी एक दृढ़ निश्चय और कर्मठ व्यक्ति थे। मुझे गर्व है कि हम दोनों ने मिलकर हिन्दी चेतना को एक स्थानीय पत्रिका से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया। परमात्मा उनकी आत्मा को शांति दे। कल उनके अंतिम संस्कार के लिए जा रहा हूँ। एक बार फिर से पुरानी स्मृतियाँ उफन आएँगी।
आप सभी लोग जानते हैं कि मेरा पिछला सम्पादकीय इतिहास की पृष्ठभूमि वाली कहानियों पर था। यह दोनों कहानियाँ साहित्य कुञ्ज के मई प्रथम अंक में प्रकाशित हुई थीं। एक कहानी भारत में प्रदीप श्रीवास्तव जी द्वारा लिखी गई थी जो भारतीय इतिहास के एक कालांश पर आधारित थी और दूसरी कहानी कैनेडा के इतिहास पर आधारित थी जिसे डॉ. शैलजा सक्सेना ने लिखा था। मेरे सम्पादकीय में मेरे उत्तेजित भाव थे और मैंने आपकी प्रतिक्रिया को आमन्त्रित किया था इसलिए मैं आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा भी कर रहा था। रोचक प्रतिक्रिया मिली। यह प्रतिक्रिया कहानी पर की गई टिप्पणियों और साहित्य कुञ्ज के व्हाट्स ऐप ग्रुप के वार्तालाप में देखने को मिली। मैं सबकुछ पढ़ता रहा; आपके विचारों को और आपके भावों को आत्मसात करता रहा।
जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ कि यह सत्य है कि प्रवासी साहित्य भारतीय साहित्य जैसा तो है पर भारतीय साहित्य से अलग है। कहना तो नहीं चाहता परन्तु एक तरह से हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा में प्रवासी साहित्य की एक अलग जगह है। यह भारतीय नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे इंग्लैंड में लिखा गया अँग्रेज़ी साहित्य ब्रिटिश साहित्य है, यू.एस.ए. लिखा गया अँग्रेज़ी साहित्य ‘अमेरिकाना’ साहित्य है, कैनेडा में लिखा गया अँग्रेज़ी साहित्य ‘कैनेडियाना’ साहित्य है और न्यूज़ीलैंड के साहित्य को ‘कीवी’ साहित्य कहा जाता है। इन देशों के साहित्य की चाहे भाषा एक ही है परन्तु साहित्य पर सामाजिक, ऐतिहासिक भगौलिक अनुभव और प्रभाव भिन्न-भिन्न हैं जो इन्हें अलग-अलग करते हैं। इसलिए इंग्लैंड के रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को, कैनेडा में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को और यू.एस.ए. में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को केवल प्रवासी साहित्य की संज्ञा दे देना न्याय संगत नहीं है।
मई प्रथम अंक में मेरे सम्पादकीय में मेरा आक्रोश उस सम्पादक के प्रति था जिसने डॉ. शैलजा की कहानी को इसलिए प्रकाशित करने से मना कर दिया था क्योंकि वह कैनेडा में घटित ऐतिहासिक घटनाक्रम को पूर्णतः समझ नहीं पाया था या उससे अनभिज्ञ था।
अब आक्रोश की अवस्था बीत चुकी है तो अपने आप से प्रश्न कर रहा हूँ कि एक भारतीय सम्पादक से—जिसने कभी कैनेडा के इतिहास को जान ही नहीं है, कनेडियन जीवन जीया ही नहीं है—मैं अपेक्षा कर रहा हूँ कि वह एक प्रवासी कनेडियन हिन्दी कहानीकार की सम्वेदना को समझ पाये।
अब इससे आगे बढ़ता हूँ और एक प्रश्न करता हूँ कि एक प्रवासी लेखक की (वह किसी भी भू-भाग का हो सकता है) हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा से क्या अपेक्षाएँ हैं? क्या वह मुख्यधारा का लेखक बनना चाहता है या वह मुख्यधारा से पृथक अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है? इंटरनेट के आरम्भिक दिनों में जब प्रवासी साहित्य वैश्विक पटल पर उदय होने लगा तो भारतीय साहित्यिक पत्रिकाओं ने प्रवासी विशेषांक प्रकाशित करने आरम्भ कर दिए। आरम्भिक दिनों में तो विदेशों लेखक हर्षित थे कि उनकी रचनाएँ भारत में प्रकाशित होने लगी हैं। शीघ्र ही वास्तविकता ने भी दस्तक देनी आरम्भ कर दी। आलोचकों ने प्रवासी साहित्य पर अपने व्यक्तिगत अनुभव और ज्ञान के आधार पर अलग अलग चिपकियाँ चिपकानी आरम्भ कर दीं। इसे प्रवासी लेखक कड़वा घूँट समझ कर पीता रहा। अपने मन को किसी तरह समझा लेता कि कम-से-कम रचना भारत में प्रकाशित तो रही है। कैनेडा में कुछ लोगों ने इस समस्या को समझा—हिन्दी राइटर्स गिल्ड कैनेडा की स्थापना भी इसी समझ का परिणाम था। यहाँ पर मैं अपना एक संस्मरण बताकर सम्पादकीय को समाप्त करूँगा।
हिन्दी राइटर्स गिल्ड (अब हिन्दी राइटर्स गिल्ड कैनेडा) की स्थापना, श्री विजय विक्रान्त, डॉ. शैलजा सक्सेना और मैंने की तो इसके उद्घाटन के लिए हमने डॉ. महीप सिंह जी को आमन्त्रित किया। उन दिनों वह अपने सुपुत्र के पास ओटवा/ओटावा के पास आए हुए थे। सुबह की फ़्लाइट से वह टोरोंटो आए, एयरपोर्ट से विक्रान्त जी उन्हें अपने घर ले आए। कार्यक्रम के पश्चात मैं उन्हें विक्रान्त जी के घर फिर से मिला क्योंकि वापस एयरपोर्ट मैं उन्हे ले जाने वाला था। चाय के पश्चात मेरी उनके साथ कहानी को लेकर गंभीर चर्चा होने लगी। इस वार्तालाप में उन्होंने कहा कि अगर हम चाहें तो कैनेडा की रचनाओं को समीक्षा के लिए भारत में महीप जी के पास भेज सकते हैं और वह आगे रचनाओं को समीक्षित करवा सकते हैं। मैंने कहा, “डॉ. साहब, आप तो लगभग हर वर्ष कैनेडा में आते हैं। आप यहाँ दैनिक जीवन से परिचित हो चुके हैं इसलिए आप भारत के साथ-साथ यहाँ के भारतीय और कनेडियन समाज को जानने, समझने लगे हैं; क्या कोई समीक्षक जो कभी कैनेडा में आया ही नहीं, यहाँ रहा ही नहीं वह दैनिक जीवन की सूक्ष्मताओं को समझ पाएगा? और कहानी क्या है? एक समाज का प्रतिबिंब ही तो है।”
डॉ. महीप सिंह जी हौले से मुस्कुराए और उन्होंने कहा, “सुमन जी आपने ठीक कहा, परन्तु हम कहानी के कलापक्ष की समीक्षा तो कर ही सकते हैं।” हम दोनों वास्तविकता समझ रहे थे। प्रवासी साहित्य और मुख्यधारा के साहित्य की सीमाओं को समझ रहे थे।
उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने के बाद अपने घर लौटते हुए सोच रहा था कि एक दिन हम सोच रहे होंगे कि कनेडियन हिन्दी साहित्य की समीक्षा भी कैनेडा में ही हो। इस दिशा में हमने प्रयास भी किया। हिन्दी राइटर्स गिल्ड की गोष्ठियों में समीक्षाएँ पढ़ी गईं। शीघ्र ही लेखकों समझ में आने लगा कि किसी रचना की समीक्षा लिखना एक कठिन विधा है और एक ईमानदार समीक्षक होना और भी कठिन है।
— सुमन कुमार घई
2 टिप्पणियाँ
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15 May, 2026 11:36 PM
साहित्य कुञ्ज पत्रिका के इस बार के संपादकीय का विषय- *एक ईमानदार समीक्षक होना* है। संपादकीय की शुरुआत संपादक महोदय के अभिन्न मित्र के निधन की दुखद सूचना से हुई है। उन्हें मेरा नमन। प्रवासी साहित्यकार और उनके साहित्य पर आए दिन इस पर बहस होती रहती है कि प्रवासी साहित्य को भारत के मुख्य धारा के साहित्य से अलग क्यों देखा जा रहा है? जबकि मुख्यधारा का साहित्य हो या प्रवासी साहित्य दोनों हिन्दी में ही लिखे जा रहे हैं। प्रवासी साहित्यकारों में यह छटपटाहट जब-तब दिख जाती है। प्रश्न उठता है कि प्रवासी साहित्यकार आखिर चाहते क्या हैं? मुख्य धारा में शामिल होना चाहते हैं या अलग अपना साहित्य संसार चाहते हैं। वाद हो, काल हो या स्थान हो, आपके साहित्य में जैसा दिखेगा , उसका नामकरण वैसा ही होगा। साहित्य की प्रवृत्तियां ही नामकरण की कारक होती हैं। शुरुआत में हर प्रवासी साहित्यकार की रचनाओं में अपने छूटे हुए देश की यादें होती है। वह उन्हीं यादों में खोया हुआ दिखाई देता है। वहां ठीक से एडजस्ट होने के बाद ही उसकी रचनाओं में वह देश दिखने लगता है। पर देर हो चुकी होती है। क्योंकि प्रवासी साहित्यकार का टैग उस पर लग चुका होता है। एक बार टैग चिपक गया तो फिर मुश्किल से छूटता है। प्रवासी साहित्य का मूल्यांकन भारतीय हिन्दी पट्टी अपने स्तर से करती है। आप खूब लिखो, जी भरकर लिखो लेकिन भारत के बिना उसका मूल्य क्या है? प्रवासी साहित्य एक बाजार की तरह है। माल खूब बना लो, यदि खरीदार नहीं है तो फायदा क्या है! मेरे कहने का तात्पर्य यह कि भारत के लोग पढ़ते हैं और वही उसका मूल्यांकन करते है। विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाए जा रहे होंगे। इस संपादकीय के माध्यम से एक प्रश्न उठाया गया है कि अलग-अलग देशों में रहने वाले प्रवासियों के साहित्य को उसी देश का हिन्दी साहित्य माना जाए। पर कैसे? भाषाई दृष्टि से, शिल्प की दृष्टि से अथवा कला की दृष्टि से! वहां के खान-पान या भौगोलिक दृष्टि से तो अन्य देशों के साहित्य से विलग नहीं किया जा सकता है। क्योंकि इन चीज़ों को साहित्य की काया कह सकते हैं, आत्मा नहीं। इसकी समीक्षा में ये प्रश्न सामने आएंगे। 'एक ईमानदार समीक्षक के लिए उसका बहुपठित होना आवश्यक है। उसे सारे दर्शनों की जानकारी होनी चाहिए। वर्तमान साहित्य की दशा-दिशा क्या है। साहित्य के प्रति निःस्वार्थ समर्पण जरूरी है। क्योंकि इसमें किसी तरह का आर्थिक लाभ नहीं है। लेखक/कवि बनना आसान है पर समीक्षक होना कठिन है। हर कोई अपनी रचना लिए घूम रहा है कि इस पर कुछ लिख दीजिए। सभी ऐसे घूमेंगे तो समीक्षा कौन करेगा! आपकी इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि प्रवासी साहित्य को प्रवासी समीक्षक ही मूल्यांकन कर सकता है। इसके लिए आप लोगों को समीक्षक पैदा करने होंगे। अगर नहीं कर सके तो भारतीय समीक्षक जो मूल्यांकन करेगा उसे ही स्वीकार करना होगा।
-
15 May, 2026 11:28 AM
सुन्दर। समीक्षा बहुत कठिन काम है और व्यक्ति की अपनी पसंद भी इसे प्रभावित करती है। "राग दरबारी" -श्रीलाल शुक्ल ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है- किसी समीक्षक ने लिखा था कि इस उपन्यास को न पढ़ा जाय तो अच्छा है। बाद में इसे ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। इसी प्रकार स्व. विजय कुमार शुक्ल के लेखन पर किसी ने लिखा( लेखक और समीक्षक) उनका लेखन अपठनीय है और हाल में उनको ज्ञानपीठ मिला।
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