सदी का एक चौथाई भाग बीत गया

 

प्रिय मित्रो,

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ! आज सुबह जब उठा तो एक विचार मन में आया—सदी का एक चौथाई भाग कितना शीघ्र बीत गया। 

पच्चीस वर्ष पहले जब नई सदी के आगमन के लिए विश्व तैयारियाँ कर रहा था अचानक विश्व भर में चिंता के बादल मँडराने लगे क्योंकि कहा जा रहा था कि दुनिया भर के कम्प्यूटर नव वर्ष के आगमन के साथ ही रुक जाएँगे। जो पाठक उस समय व्यस्क नहीं थे, उनके लिए फिर से कारण लिख रहा हूँ। 

उन दिनों कम्प्यूटर में वर्ष के लिए केवल अन्तिम दो अंक लिखे जाते थे। आम समझ के अनुसार चिंता थी कि जब 99 के बाद फिर से अन्तिम दो अंक 00  हो जाएँगे तो कम्प्यूटर कैसे जान पाएगा कि यह कौन सी सदी है? विश्व 1900 में पदार्पण कर रहा है या कि 2000 में। किसी ने सोचा ही नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। अफ़वाहों का बाज़ार गर्म था और बाज़ार ने भरपूर लाभ उठाया। कुछ व्यवसायों ने जलते में घी की भूमिका निभाई। कहा जाने लगा कि सभी विद्युत संयत्र बन्द हो जाएँगे। बिजली नहीं होगी तो पानी की आपूर्ति नहीं होगी। अस्पताल के यंत्र नहीं चल पाएँगे। पूरा व्यवसाय यानी विश्व ठप्प हो जाएगा। बाज़ार में ’सर्वाइवल किट्स‘ बिकने लगीं। डिब्बों में पीने के पानी की बोतलें, टिन में पैक खाने, कम्बल, लकड़ी के चूल्हे जलाने के लिए लाइटर, लकड़ियाँ, लकड़ी जलाने के स्टोव (चूल्हे) से लेकर मौलिक दवाइयाँ भी बिक रही थीं। और तो और  टैंट भी बिकने लगे जैसे कि 2000 के आने लोगों के आवास भी ध्वस्त हो जाएँगे। न जाने लोग क्या-क्या सोच रहे थे। ख़ैर आईटी वालों का काम ख़ूब चला। उन्होंने वर्ष को चार अंकों का आँकड़ा बनाने के प्रोग्राम बेच कर धन बटोरा। नई सदी का उदय हुआ और अन्य नववर्षों की तरह यह दिवस भी बीत गया। कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं बिगड़ा—विश्व ज्यों का त्यों रहा। समस्याएँ भी वैसी ही रहीं और उत्सव भी वैसे ही रहे।

समय बीतता चला गया। हिन्दी साहित्य भी समय के चक्र की तरह आगे बढ़ता रहा। समाज बदलता है तो साहित्य भी बदलता है। इंटरनेट और पीसी ने दुनिया ही बदल दी। विश्व से विश्वग्राम की संज्ञा ने जन्म लिया। मोबाइल का अविष्कार एक क्रांति से कम नहीं। प्रत्येक व्यक्ति जेब में न केवल कम्यूटर है बल्कि फोन, मूवी कैमरा, ट्रांजिस्टर रेडियो, टेपरिकॉर्डर और भी न जाने क्या क्या उपकरण, रख कर चलता है। सोशल मीडिया कहें या गाँव की चौपाल का वैश्विक रूप—इसका प्रभाव समाज के प्रत्येक पक्ष पर दिख रहा है। सामाजिक व्यवस्थाएँ बदल रही हैं, राजनीति का आचरण बदल रहा है। व्यवसाय बदल रहे हैं। अब एआई (कृत्रिम मेधा) अभी शैशव काल में है। क्या यह वरदान प्रमाणित होती है या अभिशाप—समय ही बताएगा। एक बात मैं कह सकता हूँ कि हर तकनीकी को आप मानव के विनाश और विकास दोनों के लिए उपयोग में ला सकते हैं।

इस सदी में हमने आतंकवाद भी देखा और युद्ध भी देखे। महामारी का प्रकोप भी देखा और प्राकृतिक विनाश भी देखा। भारत की समृद्ध होने के  प्रक्रिया के बीच में से हम गुज़र रहे हैं। वैश्विक आर्थिक ढाँचा बदल रहा है।  भारत के महानगरों की संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। मैं इसे अच्छा या बुरा नहीं कहना चाहता। जैसा मैंने ऊपर लिखा है, उसी तरह इसके भी दो पक्ष हैं। कौन सा पक्ष एक व्यक्ति के लिए अच्छा है तो दूसरे के लिए बुरा। कौन निर्णय करे? यही सब कुछ जो समाज में घट रहा है अब साहित्य में भी दिखाई देने लगा है। इसी घटनाक्रम या सामाजिक दृष्टिकोण से प्रभावित साहित्य का सृजन हो रहा है। सही अर्थों में इसे इस सदी का साहित्य कहा जा सकता है।

साहित्य कुञ्ज “इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ” विशेषांक प्रकाशित कर रहा है। आने वाले दिनों में आपको प्रकाशन की सूचना प्राप्त होगी। इस विशेषांक का विस्तार इतना है कि एक अंक में पूरा प्रकाशित नहीं हो सकता है। इसलिए इसे किश्तों में प्रकाशित करने का विचार है। इस विधा के अन्य भी अनेक पक्ष हैं। उन्हें भी एक विशेषांक के रूप में आपके सामने प्रस्तुत करने की योजना है और इस पर काम भी शुरू हो चुका है।

जनवरी के महीने “इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ” विशेषांक प्रकाशित हो जाएगा। इस विशेषांक का सम्पादन डॉ. आरती स्मित कर रही हैं। इनका विस्तृत परिचय साहित्य कुञ्ज में उपलब्ध है। डॉ. आरती स्मित बहुत वर्षों से साहित्य कुञ्ज में प्रकाशित होती रही हैं। वह साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लेखनी की धनी हैं। इस विशेषांक के आवरण का चित्र श्रेया श्रुति ने बनाया है। वह ग्राफ़िक्स में परास्नातक हैं और डॉ. आरती स्मित की सुपुत्री हैं।

आशा है कि विशेषांक को भी आप उतना ही चाहेंगे जितना आप साहित्य कुञ्ज को चाहते हैं।

सादर—
सुमन कुमार घई

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