किससे दिल की बात कहूँ?


प्रिय मित्रो,

इस बार पुनः अंक प्रकाशन में दो दिन का विलम्ब हो गया। 14 जनवरी को कुछ रचनाएँ ऐसी आईं जो कि  समय-संवेदी थीं। जैसे कि मकर-संक्रांति से संबंधित रचनाएँ अगर तेरह-चौदह को भी मिलेंगी तो भी उन्हें समय रहते तो प्रकाशित करना ही पड़ेगा। “साहित्य कुञ्ज की पुस्तकें” की पुस्तकों के अंश प्रायः अंतिम दिन के लिए छोड़ता हूँ। चौदह की दोपहर वही करता रहा। सम्पादकीय नहीं लिखा गया। सोचा पन्द्रह की सुबह को लिख लूँगा क्योंकि मैं साढ़े तीन बजे उठ ही जाता हूँ। भारत में पन्द्रह की दोपहर के बाद पाठकों को अंक मिल जाएगा।  

कल संध्या अर्थात्‌ चौदह की संध्या को हिमपात आरम्भ हो गया था।  उस समय मैं अपने बेटे के घर था। रात के खाने के बाद निकलते-निकलते रात के आठ बज गए।  रात के आठ के बाद नियमानुसार मैं स्वयं को इलैक्ट्रॉनिक दुनिया से काट लेता हूँ—यहाँ तक कि फोन भी नहीं उठता।

रात भर निरंतर हिमपात होता रहा। सुबह उठते ही देखा—अभी भी हिमपात हो रहा था। ड्राईव-वे और सड़क अटी पड़ी थी। संभवतः रात ही स्नो-प्लाओ से एक बार गली को साफ कर दिया था, जिससे ड्राईव-वे के आगे लगभग तीन फ़ुट ऊँचा बर्फ़ का ढेर था। कम्प्यूटर ऑन करने तक का मन नहीं किया। यही चिंता थी कि आज मेरा स्नो ब्लोअर स्टार्ट भी हो जाएगा या नहीं। लगभग सात बजे बाहर से बेलचे की आवाज़ सुनाई दी। पड़ोसी ज़ैक ड्राईव वे के आगे लगे तीन फ़ुट के ढेर से संघर्ष कर रहा था। गैराज का दरवाज़ा खोल कर उसे आवाज़ लगाई कि बर्फ़ न हटाए मेरी प्रतीक्षा करे। तापमान देखा, शून्य से 14 डिग्री कम था और ‘विंड चिल’ से शून्य से 23 डिग्री कम यानी भयानक शीत। तापमान के अनुसार कपड़े पहने और स्नो ब्लोअर को स्टार्ट कर लिया और अगले डेढ़ घंटे तक बर्फ़ साफ़ की। साढ़े आठ तक ड्राईव वे साफ़ हो गया था। यद्यपि हिमपात अभी भी हो रहा था। 

भूख लग रही थी। अन्दर आया; नीरा संभवतः बेसन-ब्रेड की तैयारी कर रही थी। इसी संभावना ने पुनः ऊर्जा का संचार कर दिया। जब तक नहा कर रसोई में आया, गैस पर कड़ाही में तेल गर्म हो रहा था। टेबल पर दो प्लेटें लगी हुई थीं। तीन प्रकार की चटनियाँ, इमली की मीठी चटनी, धनिए-पुदीने की चटनी और कैचअप सजी थी। चाट मसाला भी उपस्थित था। तली हुई बेसन से लिपटी ब्रेड पर चाट मसाला छिड़कता ही हूँ। बिना कहे ही मेरा आभा मंडल नीरा का धन्यवाद कर रहा था। दिल भर के नाश्ता किया और नीरा से कहा, “आज दोपहर के खाने छुट्टी।” वह मुस्कुराते हुए बोली, “इसके बाद क्या उम्मीद करते हो कि दोपहर का खाना खा पाओगे?” 

अब मित्रो, सम्पादकीय भी सुस्ताने लगा और फ़ैमली रूम के सोफ़े पर ही लुढ़क गया। दिन के ग्यारह बजे जागा तो देखा बेसमेंट में बच्चों यानी पोता-पोती के खेलने की आवाज़ें आ रही हैं। मालूम हुआ कि रात की बर्फ़बारी के कारण स्कूल बन्द कर दिए गए हैं। यानी बच्चों के लिए ’स्नो डे’ की छुट्टी। सुमित और ऋतु ’वर्क फ़्रॉम होम’  कर रहे हैं इसलिए बच्चे छोड़ने सुमित आया था। 

बाहर देखा तो हिमपात लगभग अन्तिम साँसें ले रहा था। ड्राईव वे पर कम से कम पन्द्रह सेंटीमीटर बर्फ़ की परत थी और मुहाने पर तीन फ़ुट का ढेर फिर नगर-पालिका के स्नो प्लाओ गली साफ़ करते हुए लगा गए थे। इस बार ज़ैक मेरा ड्राईव-वे भी साफ़ करने में व्यस्त था। नैतिकता कह रही थी कि मुझे भी बाहर जाकर सहायता करनी ही चाहिए। सुबह की मज़दूरी के बाद की थकान के चलते भी पुनः बाहर निकल कर सुबह का परिश्रम दोहराया। एक संतोष भी था कि ब्रेड-पकौड़े हज़म हो जाएँगे, पेट में भारीपन नहीं रहेगा।

बाक़ी का दिन मायारा और युवान के साथ ही व्यस्त रहा। चार बजे उन्हें वापिस छोड़ने गए। पाँच बजे लौट कर नीरा ने पूछा रात के खाने का क्या हिसाब-किताब है? आलू-गोभी बनी थी। दोपहर के व्रत के कारण भूख लग रही थी। संध्या की चाय, आलू-गोभी के साथ परांठा, बाहर खिड़की से दिखते बर्फ़ से लदे स्प्रूस के पेड़, लॉन पर लगभग दो फ़ुट शुभ्र हिम का वितान—लगभग स्वर्ग की अनुभूति। सम्पादकीय एक दिन और प्रतीक्षारत रहेगा। सात बजते-बजते सोफ़े पर बैठा लुढ़कने लगा तो नीरा कहा, “अभी सो गए तो रात को उठकर ’ईनो’ पीते नज़र आओगे।” वह कह तो सही रही थी। उसी ने सुझाव दिया, “क्यों न आज कोई फ़िल्म देखें।” 

“कौन सी?” मैंने पूछा।

“खोजती हूँ,” कह कर वह मोबाइल पर हिन्दी फ़िल्म खोजने लगी। ऐसा करना नीरा को बहुत अच्छा लगता है। कई सूचियाँ देखती है। फ़िल्मों के कथानक पढ़ती है। लोगों की प्रतिक्रियाएँ पढ़ती है। ऐसा करते-करते कई बार तो फ़िल्म का चयन होने से पहले ही नींद आने लगती है। 

मैं मुस्कुरा देता हूँ क्योंकि उसे ऐसा करते देखना ही मेरा मनोरंजन है और ऐसा करना उसका मनोरंजन। 

“जब किसी निर्णय पर पहुँच जाओ, नीचे बेसमेंट में आ जाना।”

हम लोगों ने टीवी केवल बेसमेंट में रखा है। मेन फ़्लोर या बेड-रूम में कोई टीवी नहीं।

इस बार पन्द्रह मिनट में उसने फ़ैसला सुना दिया, “अय्यारियाँ देखें?” 

“जो तुम कहो,” मैंने कहा।

“प्रतिक्रियाओं में कुछ लोग कह रहे हैं कि उबाऊ है।”

“तो न देखें क्या?”

“नहीं, अच्छी लग रही है—देखते हैं—समय बरबाद तो नहीं हो जाएगा?” संशय भी भी था।

“पता नहीं, वैसे यह सोचते-सोचते कि देखें या नहीं, समय अवश्य बरबाद हो रहा है।”

“चलो देखते हैं। पहले पाँच मिनट में ही पता चल जाएगा। अच्छी नहीं लगेगी तो बन्द कर देंगे।”

यह नीरा का अन्तिम निर्णय था। वैसे यह प्रक्रिया मेरी जान-बूझी थी। हर बार ऐसा ही कहा और सुना जाता है। नीरा अपने ’इलैक्ट्रिक ब्लैंकेट’ में और मैं अपने कम्बल में लिपट गए। बेसमेंट में आज काफ़ी ठंड थी। फ़िल्म समाप्त होने पर हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा। सन्तोष था कि समय बरबाद नहीं हुआ, फ़िल्म अच्छी थी। रात के साढ़े-नौ बज चुके थे। मेरे सोने का समय निकल चुका था। दिन भर की थकावट भी थी। 

बेड के सामने के टेबल पर पड़ा मेरा लैपटॉप मुझे सम्पादकीय की याद दिला रहा था। अपराधबोध हावी हो रहा था। सम्पादकीय की दो पंक्तियाँ लिखते-लिखते आँखें बंद होने लगीं। 

सोचा सुबह ही लिखूँगा—सो, लिख रहा हूँ। पता नहीं आपको अच्छा लगेगा या नहीं—बहुत अधिक व्यक्तिगत तो नहीं हो गया? 

वैसे सभी पाठक मित्र ही तो हैं, उनसे दिल की बात नहीं कहूँगा तो किस से कहूँगा? 

16 जनवरी के सुबह के सात हो रहे हैं। अब तो अंक प्रकाशित कर ही देना चाहिए।

हाँ, एक बात तो मैं बताना ही भूल गया—फ़रवरी के पहले सप्ताह के अंत तक मैं भारत पहुँच जाऊँगा। मार्च के अंत तक भारत रहने का विचार है। अगर परमात्मा ने चाहा तो वहाँ आप लोगों से मिलना भी हो!

—सुमन कुमार घई

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