आवश्यकता है नई सोच की, आत्मविश्वास की और संगठित होने की

पाठकों की प्रतिक्रिया: फिर वही प्रश्न – हिन्दी साहित्य की पुस्तकें क्यों नहीं बिकतीं?

 

साहित्य कुञ्ज के फरवरी के द्वितीय अंक के सम्पादकीय में मैंने कुछ चिंताएँ और समाधान प्रस्तुत किए थे। पाठकों ने इस प्रतिक्रियाएँ दीं। इन में से दो नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप इन्हें पढ़ें और मनन करें।

सर्वप्रथम आशा मिश्रा जी की प्रतिक्रिया है। आशा जी स्वयं लेखिका और ’पुष्पक सहित्यिकी’ की सम्पादक हैं।  वह कहती हैं –

 

आदरणीय घई जी , 

मेरी कविता प्रकाशित करने हेतु बहुत बहुत आभार। जानकर प्रसन्नता हुई कि कवितायें आपको पसंद आईं। साहित्य कुंज का यह अंक भी पूर्व के प्रत्येक अंक की तरह ही बहुत बढ़िया बना है। अधिक नहीं पढ़ पाई हूँ, सम्पादकीय और कुछ रचनायें  ही पढ़ पाई हूँ अभ । आपके सम्पादकीय ने एक ऐसे प्रश्न को फिर से उठाया है जिससे हिंदी साहित्यकार वर्षों से जूझते चले आ रहे हैं । ऐसा नहीं है कि लोग हिंदी पढ़ते नहीं हैं परंतु पैसे खर्च कर पढ़ना नहीं चाहते। किताबें लाइब्रेरी से निकलकर ऑनलाइन लाइब्रेरी में आ चुकी हैं। हम लोग स्वयं पत्रिका प्रकाशित करते हैं जिसके लिए अर्थ एक  बड़ी समस्या के रूप में सामने आता है। लोग न ही सदस्य बनना चाहते हैं और न ही पैसे देकर ख़रीदना चाहते हैं । यही कारण है कि कई प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ बंद हो जाती हैं। आशा है भविष्य में इन समस्याओं का निदान अवश्य मिलेगा । 

आशा मिश्रा ’मुक्ता’


सुमन घई जी ने साहित्य कुंज के वर्तमान अंक में सम्पादकीय में पुस्तक प्रकाशन को लेकर जो चिंता जाहिर की है, आजकल हिंदी का हर लेखक उससे दो चार हो रहा है, इस सम्बन्ध में मैं हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध लेखिका सुधा अरोड़ा जी का कथन "हिंदी साहित्य आंतरिक दबाव का लेखन है, आप इससे रोजी रोटी नहीं कमा सकते" दूसरा कथन उदय प्रकाश जी का है कि "हिंदी साहित्य का लेखन दरिद्र व्यापार है, ये आपने ही चुना है, समाज ने आपको न्योता नहीं दिया है कि आइये लिखिए" इन दोनों लेखकों ने कदाचित हमारी समस्याओं को क़ायदे से उठाया है, लेकिन इस दमदार सम्पादकीय हेतु मैं आपको बधाई और साधुवाद प्रेषित करता हूँ।

दिलीप सिंह


जो अन्य प्रतिक्रियाएँ मिली हैं, वह भी लगभग यही बात दुहाराती हैं। 

जैसा कि मैंने सम्पादकीय में लिखा था कि इस समस्या की जब भी चर्चा होती है तो केवल यथास्थिति पर असंतोष प्रकट करने के बाद ही समाप्त हो जाती है। दिलीप सिंह जी ने अपनी प्रतिक्रिया में हिन्दी के दो लेखकों को उद्धृत किया है। दोनों लेखक ही लगभग इस तथ्य को स्वीकार कर चुके हैं कि हिन्दी लेखक रोज़ी-रोटी नहीं कमा सकता क्योंकि यह कला उसके अन्दर से प्रस्फुटित होती है इसलिए इस कला से कोई धन न कमा पाने के लिए वह स्वयं दोषी है। यह कथन मेरी समझ से बाहर है। ऐसा मैं क्यों कह रहा हूँ उसके कारण भी बताता हूँ। हमें यह समझना होगा कि हर कला ’आंतरिक दबाव’ से ही जन्म लेती है। चाहे वह संगीत हो, चित्रकला हो या अभिनय। अगर उल्लेखित कलाओं के कलाकार अपनी कला से पैसा कमा सकते हैं तो लेखक क्यों नहीं। हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि किसी भी विधा के सभी कलाकार कमाई नहीं कर पाते। इसका कारण केवल कला की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। समस्या है तो अनुपात की है। हिन्दी लेखक इन सभी कलाओं से पीछे आते हैं।

पिछले सप्ताह वैसे ही मन में विचार आया कि दिल्ली में पुस्तक विक्रेताओं की वेबसाइट्स पर जाकर हिन्दी की पुस्तकों की उपलब्धता के बारे में जानूँ। पुस्तक व्यापार की विशालता को देखकर मैं विस्मित रह गया। दिल्ली के कई पुस्तक विक्रेताओं की दुकानें वैश्विक स्तर की थीं। उनकी वेबसाइट्स को खंगालता रहा। भारतीय अँग्रेज़ी लेखकों की पुस्तकों से उनकी सूचियाँ भरी हुईं थीं। हिन्दी के लेखक – उन्हें आप एक हाथ की उँगलियों पर गिन सकते थे। मैं आधुनिक लेखकों की बात कर रहा हूँ। यह हाल तब है जब दिल्ली हिन्दी पट्टी के बीचोंबीच स्थित है। मैं इन दुकानों पर जाकर कोई आधुनिक हिन्दी साहित्य की पुस्तक ख़रीदना चाहूँ तो भी नहीं ख़रीद सकता। अगर मैं दुकानदार के दृष्टिकोण से सोचूँ तो वह ऐसी पुस्तक से अपनी शेल्फ़ क्यों भरे, जो बिकेगी ही नहीं। ख़रीददार के दृष्टिकोण से देखा जाए तो अगर पुस्तक दुकानदार की शेल्फ़ पर है नहीं तो वह कैसे ख़रीदे? समस्या और प्रश्न वही है – मुर्गी पहले या अंडा। यह समस्या इतनी बड़ी नहीं है जितनी हम समझते हैं। 

कैनेडा में हिन्दी राइटर्स गिल्ड में हमने एक परीक्षण किया था। हम सबने प्रण लिया था कि हम पुस्तक उधार माँग कर नहीं, ख़रीद कर पढ़ेंगे। हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने २००८ से २०२० (कोरोना) से पहले तक लगभग चौदह-पन्द्रह पुस्तकें प्रकाशित कीं जो कि कैनेडा में ही प्रिंट हुईं। एक प्रिंटर को मैंने कम संख्या में पुस्तकें प्रिंट करने के लिए तैयार किया। १२० पन्नों के आसपास की पुस्तक पेपरबैक कवर के साथ प्रति पुस्तक वह पाँच डॉलर (कनेडियन) लेता था। इस क़ीमत पर वह कम से कम पचास प्रतियाँ प्रकाशित करता था। गिल्ड में हम लोगों ने निर्णय लिया कि प्रत्येक पुस्तक दस डॉलर (कनेडियन) में बेची जाएगी ताकि अगर लेखक की आधी प्रतियाँ भी बिक गईं तो उसकी लागत निकल आएगी। ऐसा कई वर्षों तक चलता रहा। एक-दो उद्यमी लेखक थे, जिन्होंने सौ-सौ प्रतियाँ प्रिंट करवाई थीं और सारी की सारी बेच डालीं। पिछले सम्पादकीय में मैंने लिखा था कि "हमें ही प्रयास करना होगा"। यही प्रयास इन लेखकों ने किया था।

इसके दो लाभ हुए, पहला लेखक ने न केवल अपनी लागत वसूल की बल्कि शत-प्रतिशत लाभ भी उठाया। दूसरी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि है कि उसने अपने लेखन का एक ऐसा पाठक वर्ग तैयार कर लिया जिन्हें उसका लिखा पसंद आया। यह पाठक वर्ग पुस्तक ख़रीद कर पढ़ने वाला था। यह परीक्षण समय के साथ अस्त हो गया। उसके भी कारण हैं। कैनेडा में हिन्दी भाषियों की संख्या कम है और फिर उनमें हिन्दी साहित्य प्रेमियों की संख्या उससे भी कम। पंजाबी पाठकों की संख्या अधिक है इसलिए एक-दो पंजाबी प्रकाशक भारत से आते हैं और छोटी-छोटी पुस्तक प्रदर्शनियाँ लगाते हैं।

परन्तु भारत में स्थिति इससे अलग है। अगर हिन्दी लेखक, हिन्दी राइटर्स गिल्ड के अनुभव से सीखें तो आधुनिक हिन्दी साहित्य की पुस्तकें प्रकाशित करके व्यक्तिगत स्तर पर बेचने में सफलता मिल सकती है। यह काम आप लोगों को स्थानीय स्तर से आरम्भ करना पड़ेगा। आप लोग एक संगठन बनाएँ, जिसमें कुर्सियाँ न हों। सभी लेखक मैत्री पूर्ण वातावरण में मिलें, गोष्ठियाँ करें, लेखन कला को निखारने के लिए कार्यशालाएँ आयोजित करें। जो सफल अनुभवी लेखक हैं वह नए लेखकों का मार्गदर्शन करें। नए लेखक भी अपने दंभ को किनारे कर अनुभवी लेखकों से सीखें। जब आप लोग एक टीम बन जाएँ तो एक दो समारोह करें। परन्तु इन समारोहों को अपनी क्षमता तक ही सीमित रखें। एक छोटा सफल समारोह एक बड़े असफल समारोह से बेहतर होता है। इस समारोह के कार्यक्रम ऐसे हों जो साहित्यिक होते हुए भी मनोरंजक हों ताकि दर्शक बार-बार वापिस आना चाहें। अगर आप लोग स्पांसर या चन्दा इकट्ठा करके इस समारोह को निःशुल्क बना सकें तो वह सोने पर सुहागे वाली बात होगी। हाँ आप दान पात्र वहाँ रख सकते हैं ताकि समारोह का ख़र्चा निकल सके। 

इन आरम्भिक समारोहों के बाद अगले समारोह में पुस्तक प्रदर्शनी लगाएँ और पुस्तकों को बेचें। अगर कोई पब्लिशर इसमें अपनी प्रदर्शनी लगाना चाहता है तो वह समारोह के ख़र्चे में भागीदार बने। अगर इस स्तर आप सफल हो जाते हैं तो इसका विस्तार किया जा सकता है।

यह परामर्श इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि हमने कैनेडा में हिन्दी राइटर्स गिल्ड ऐसा किया हुआ है। आप लोगों को पुनः न केवल प्रतिक्रिया के लिए आमन्त्रित कर रहा हूँ बल्कि आप लोगों से प्रश्न करना चाहता हूँ कि क्या मेरा सुझाव या मेरा हिन्दी राइटर्स गिल्ड का अनुभव आपके लिए व्यवहारिक हो सकता है?

हिन्दी पुस्तकें न बिकने का समाधान लेखकों को ही खोजना होगा। प्रकाशक तो बेच रहा है और आर्थिक लाभ भी उठा रहा है। अगर लेखकों के संगठन व्यक्तिगत स्तर पर पुस्तकें बेचने पर सफल हो जाते हैं तो संगठन प्रकाशक, वितरक बनने तक की यात्रा तय कर सकता है। आवश्यकता है नई सोच की, आत्मविश्वास की और संगठित होने की।

– सुमन कुमार घई

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