अंकों के तीन शतक पूर्ण करने पर साहित्य कुञ्ज के प्रेमियों को हार्दिक बधाई!

 

प्रिय मित्रो,

साहित्य कुञ्ज का यह 300वां अंक है। अगर आरम्भ से ही साहित्य कुञ्ज का नियमित प्रकाशन कर पाता, तो अंकों की संख्या कहीं अधिक होती। आरम्भिक दिनों में साहित्य कुञ्ज को मैंने साप्ताहिक रूप से प्रकाशित किया। उन दिनों समस्या यह थी कि भारत में किसी-किसी के पास सरकारी कंप्यूटर की सुविधा थी। कुछ समृद्ध लेखकों या विदेशों में रहने वाले लेखक टाइप करके रचनाएँ भेजते। उन दिनों इंटरनेट पर साहित्यिक लेखकों की प्रिय फ़ाँट ‘शुषा’ था जिसे मैंने भी साहित्य कुञ्ज के लिए अपना लिया। यह फ़ॉन्ट निशुल्क था इसलिए लोकप्रिय भी था। इसमें कुछ कमियाँ थीं। जब मैंने स्व. श्याम त्रिपाठी जी की त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘हिन्दी चेतना’ के प्रकाशन और सम्पादन में सहायता आरम्भ कि तो मालूम हुआ कि वह किसी अन्य स्थानीय फ़ाँट ‘सरस्वती’ का प्रयोग करते हैं जिसे डॉ. नराले ने बनाया था। समस्या यह थी कि नराले जी ने यह फ़ॉन्ट संस्कृत और मराठी में टाइप करने के लिए बनाया था। डॉ. रत्नाकर नराले सिविल इंजीनियर थे परन्तु वह सनातन संस्कृत साहित्य के भी विद्वान हैं। यद्यपि वह हिन्दी में भी लिखते हैं परन्तु उनकी हिन्दी भाषा पर मराठी का बहुत प्रभाव था। हिन्दी की कुछ मात्राएँ ऐसी हैं जिनका प्रयोग मराठी में नहीं होता। सरस्वती फ़ॉन्ट की यही कमियाँ हिन्दी पत्रिका के पाठकों को खटकती थीं। इस समस्या से निपटने के लिए मैं एसटी01 बनाया था। क्योंकि मैं उन दिनों अपने वेबपेज “उर्दू शायरी और हिन्दी कविता” के लिए शुषा का प्रयोग करता था और हिन्दी चेतना के लिए सरस्वती का प्रयोग करता था, इसलिए मुझे दोनों फ़ाँट्स की कमियों का ज्ञान था।  एसटी01के ‘की-बोर्ड ले-आउट’ की संरचना करते हुए मैंने विशेष ध्यान रखा कि बार-बार ALT+ पर न जाना पड़े।  एसटी01 फ़ॉन्ट को प्रयोग में लाने के पश्चात मैंने शुषा का प्रयोग बंद कर दिया। साहित्य कुञ्ज का प्रकाशन भी उन्हीं दिनों आरम्भ किया था। कुछ आरम्भिक अंक शुषा में थे और बाद में  एसटी01 में। निश्चित है कि यह सब कुछ करते हुए, मेरे पास समय की कमी हुई और मुझे साहित्य कुञ्ज का प्रकाशन मासिक करना पड़ा।

यद्यपि साहित्य कुञ्ज मासिक हो गया था, परन्तु मन में एक बात खटकती रही। क्योंकि मैं भी लेखक था इसलिए लेखकों की मानसिकता को भी भली-भाँति समझता था। दुनिया का प्रत्येक लेखक अपनी रचना का तुरन्त प्रकाशन चाहता है। ऊपर से एक समस्या और थी। साहित्य कुञ्ज और हिन्दी चेतना की अधिकतर सामग्री मुझे स्वयं टाइप करनी पड़ती थी। यह असमंजस की स्थिति कुछ समय तक चली। अंततः मैंने निर्णय लिया कि जैसे-तैसे व्यक्तिगत समय में से साहित्य प्रकाशन के लिए समय तो निकालना ही पड़ेगा। पारिवारिक विरोध को झेलते हुए मैंने साहित्य कुञ्ज को पाक्षिक बना दिया।

हिन्दी चेतना में मैंने और स्व. त्रिपाठी जी ने मिलकर लगभग पाँच वर्ष तक काम किया। तकनीकी तौर पर हिन्दी चेतना नींव मज़बूत हो चुकी थी। डॉ. सुधा ढींगड़ा जी भी हिन्दी चेतना से जुड़ चुकी थीं। मैंने साहित्य कुञ्ज की ओर पूरा ध्यान देने के लिए हिन्दी चेतना छोड़ दी। कुछ महीनों के पश्चात कैनेडा के साप्ताहिक समाचार पत्र के प्रकाशक राकेश तिवारी जी ने मुझे समाचार पत्र का सम्पादन करने के लिए आमन्त्रित किया। मैं राजनीतिक पत्रकारिता में जाना नहीं चाहता था। राकेश तिवारी जी ने मुझे सम्पादन की सम्पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव दिया। मैंने अपनी शर्तें रखीं, सहमति मिलने पर मैंने साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादन का पदभार संभाला। राकेश तिवारी जी ने कहा था कि सुमन जी आपको रोज़ लगभग एक घंटा देना पड़ेगा और अंक प्रकाशन से एक दिन पहले लगभग चार घंटे का समय देना पड़ेगा। समय की कमी थी, बच्चे छोटे-छोटे थे और पारिवारिक व्यवसाय के दायित्व थे। मन में लोभ था कि सम्पादन की पूर्ण स्वतंत्रता है तो मैं कनेडिन लेखकों को बिना किसी रोक-टोक के एक मंच प्रदान कर सकता हूँ। समाचार पत्र का मंच साहित्य कुञ्ज के इंटरनेट के मंच से बिलकुल भिन्न था। कैनेडा में उन दिनों साप्ताहिक समाचार पत्र निशुल्क वितरित होते थे। प्रकाशन का पूरा ख़र्चा विज्ञापन से ही पूरा होता था। यह एक अलग विषय है। मैंने चर्चा आरम्भ की थी कि 2003 से प्रकाशन आरम्भ करके भी 300 अंक तक ही क्यों पहुँच पाया। जैसा कि मैंने ऊपर अपनी व्यस्तता का लिखा है, इसके लिए समय मुझे साहित्य कुञ्ज का बलिदान देकर ही जुटाना पड़ा। लगभग पाँच वर्ष तक साहित्य कुञ्ज मृतप्रायः रहा। होस्टिंग और डोमेन रजिस्ट्रेशन वालों को पैसा देकर इसे जीवित तो रखा परन्तु इसकी अवस्था के कोमा ग्रस्त काया से अधिक नहीं थी। लेखक और पाठक अनुमान लगाते रहे और एक दूसरे से पूछते रहे कि सुमन का स्वास्थ्य तो ठीक है या फिर . . .

हिन्दी टाइम्स को छोड़कर साहित्य कुंज को पुनर्जीवित किया। लेखकों और पाठकों की प्रतिक्रिया सुखद रही। क्या इस तरह साहित्य कुञ्ज को लावारिस छोड़ देने का मुझे कोई अपराध-बोध है? हाँ है, परन्तु मेरी मौलिक मानसिकता पलट कर भूतकाल पर पछताने की नहीं है। मैं उन उपलब्धियों से ऊर्जा लेता हूँ जिन्हें मैं प्राप्त कर सका। मेरी यात्रा “उर्दू शायरी और हिन्दी कविता” से आरम्भ होकर हिन्दी चेतना, साहित्य कुञ्ज, हिन्दी टाइम्स और पुनः साहित्य कुञ्ज तक की है। इन दिनों के दौरान मुझे हिन्दी के मूर्धन्य विद्वानों से सीखने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रसिद्ध लेखकों से मैत्री का वरदान प्राप्त हुआ। इस वर्ष मैं अपने जीवन के 75वें वर्ष में पदार्पण सात अगस्त को कर लूँगा। आज की इंटरनेट की दुनिया में कुछ भी कर पाने के असीम अवसर हैं। माँ सरस्वती से प्रार्थना है कि वह अपने वरद हस्त से कृपा बरसाती रहें। लेखकों की लेखनी सक्रिय रहे। पाठकों मे मन में साहित्य के प्रति अनुराग विकसित होता रहे।

अंकों के तीन शतक पूर्ण करने पर साहित्य कुञ्ज के प्रेमियों को हार्दिक बधाई! आपके प्रेम के बिना यह उपलब्धि असंभव थी। हार्दिक धन्यवाद!!

—सुमन कुमार घई

9 टिप्पणियाँ

  • 9 Jul, 2026 05:46 AM

    प्रणाम आदरणीय सर ???? आपको तथा हम सभी को असीम बधाई... आपका यह श्रम एवं साहित्य के प्रति यह समर्पण हम सबके लिए आशीर्वाद है। आज यदि कहीं निरंतर प्रकाशित हो सकते हैं तो वह है साहित्य कुंज। विदेश में रहते हुए भी हिंदी की उन्नति हेतु आपने यथाशक्ति स्वयं को समर्पित किया है। यह हमारा सौभाग्य है कि हम आपसे जुड़ पाए तथा इस साहित्यिक यात्रा में सम्मिलित हो पाए। यूँ हीं आप हम सबका मार्गदर्शन करते हुए इस यात्रा में चलते रहें.... शुभकामनाएँ ????

  • 7 Jul, 2026 06:45 PM

    75वीं वर्षगांठ व 300वे अंक (75x4=300) का क्या ही अद्वितीय संगम। हृदय की गहराइयों से आदरणीय सम्पादक जी को ढेरों बधाई। मानव जन्म लेकर, और फिर आयु की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए कोई इक्का-दुक्का ही पीछे मुड़कर देखते हुए गर्व महसूस करता होगा कि उसने मानवता के लिए कुछ कर दिखाया। सुमन जी ऐसे ही एक निश्छल व निस्वार्थ साहित्यकार हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य-जगत को अपना इतना बड़ा योगदान दिया। और अपने भौतिक परिवार के साथ-साथ साहित्य कुन्ज परिवार को अपने अथक परिश्रम से जोड़े रखा। ईश्वर से आपके अच्छे स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्रार्थना करते हुए मैं आपको भी नमन करती हूँ।

  • 7 Jul, 2026 04:48 PM

    साहित्य कुञ्ज के इस 300 वें अंक के प्रकाशन के लिए आपको तथा आपकी जीवटता को प्रणाम करता हूं सर। 300 अंक मामूली अंक नहीं है। रुपयों की दृष्टि से इस 300 को देखेंगे तो यह एक मामूली संख्या है। लेकिन पत्रिका के प्रकाशनों की संख्या के रूप में इसे देखता हूं तो आश्चर्य होता हैं। इतने अंक निकालने में एक जीवन समर्पित करना पड़ता है। संपादक जी ने जीवन का एक बड़ा एवं महत्वपूर्ण हिस्सा इसी को समर्पित कर दिया है। वे आज भी इसे संतान की तरह पाल-पोस रहे हैं। आपके लेखन और संपादन की यह यात्रा खासी दिलचस्प रही है। इस यात्रा में साहित्य कुञ्ज के साथ 'हिन्दी चेतना' जिसके संपादक स्वर्गीय श्री श्याम त्रिपाठी जी थे, उनकी यादें भी इसमें जुड़ गईं। कैनेडा साप्ताहिक समाचार पत्र, हिन्दी टाइम्स आदि इस संपादकीय लेख से जुड़कर खुशनुमा मंजिल की गवाही देती है। शुरुआत की कुछ अड़चनों के बाद लगातार पत्रिका निकालना कलेजे की बात होती है। पारिवारिक विरोध के बावजूद इस सफर में कहीं कोताही नहीं बरती गई है। हम आशा करते हैं कि यह पत्रिका ऐसे ही निरंतर अपनी मंजिल पार करती रहे। 7 अगस्त 2026 को जीवन के 75 वसंत पूर्ण की अग्रिम बधाई एवं शुभकामनाएं स्वीकारें सर।

  • 7 Jul, 2026 01:01 PM

    आदरणीय सुमन कुमार जी सादर प्रणाम। साहित्यकुंज के 300 वें अंक हेतु हार्दिक बधाई।किसी पत्रिका का लगातार संपादन और तकनीकी पक्ष भी संभालना बहुत मेहनत का काम है। साहित्यकुंज पत्रिका के कारण मुझे कुछ लिखने का अवसर मिला।यही वह पत्रिका है जिसमें मेरे अनेक लेख प्रकाशित हुए।एक लेखक होने का गौरव प्राप्त हुआ। ऑनलाइन हिंदी पत्रिका विश्व में साहित्यकुंज का नाम अजरामर रहेगा। डिजिटल युग में साहित्य का अक्षर अमर रहेगा।यह नई पीढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य है। साहित्यकुंज के सफल प्रकाशन हेतु आपका हार्दिक अभिनंदन!!

  • 7 Jul, 2026 12:09 PM

    बहुत सुन्दर। यात्रा के मोड़ कठिन लेकिन बहुत दिलचस्प हैं। मैं तो लैपटॉप शायद 2009 के आसपास लिया। अनेक शुभकामनाएं।

  • आदरणीय सुमन कुमार घई जी, साहित्य कुञ्ज के 300वें अंक की ऐतिहासिक उपलब्धि पर आपको और संपूर्ण हिंदी साहित्य प्रेमियों को हार्दिक बधाई???? आपका प्रेरक संपादकीय आपके समर्पण, संघर्ष और साहित्य-सेवा का जीवंत प्रमाण है। साहित्य कुञ्ज परिवार का एक रचनाकार होने के नाते इस गौरवपूर्ण यात्रा का छोटा-सा सहभागी होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरंतर सृजन-शक्ति प्रदान करें। साहित्य कुञ्ज यूँ ही हिंदी साहित्य की सेवा करता रहे। सादर प्रणाम। शक्ति सिंह 'अनमोल'

  • 7 Jul, 2026 09:49 AM

    हार्दिक शुभकामना आपके आने वाले जन्मदिवस केलिए। कंप्यूटर के साथ साहित्य से अनुराग वह भी एक विदेशी भूमि पर स्तुत्य है। हिंदी के विकास और हिंदी लेखकों को मंच देने के लिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद। आपकी दीर्घ साहित्यक यात्रा और अपके dedication को सलाम। 300 अंक प्रकाशित करने पर पुनः बधाई। आपके संपादकीय से आपके जीवन की झलकियां देखने में आनंद आता है। ईश्वर आपको स्वास्थ और दीर्घायु प्रदान करे।

  • 300 अंक पुरा होने पर साहित्यकुञ्ज एवं आदरणीय संपादक महोदय को बहुत-बहुत बधाई । लेखकों पाठकों को बधाई । परिवारिक जिम्मेवारियों सहित अन्य बहुत सारी बाधा अड़चनों के बाद भी संपादक जी के एकल प्रयास का 300 वां अंक पार करना एक बहुत बड़ी उपलब्धि तो है हीं । संपादक जी का भाषा भारत और हिन्दी प्रेम का प्रमाण भी है। जीवन के अमृत वर्ष में प्रवेश एवं पचहत्तरवीं वर्षगाँठ की बहुत-बहुत सादर बधाई। यहाँ भूमि स्पर्श कर आपका चरण स्पर्श करता हूँ। आपका स्नेह सदा बना रहे। सादर

  • 7 Jul, 2026 02:20 AM

    आदरणीय सुमन जी सम्पादकीय में वर्णित सम्पादन की महती यात्रा के बारे में पढा , सरल व कम शब्दों में इतनी दर्गम यात्रा को इस सुखद पड़ाव तक पहुँचाने के लिए आपको बधाई। आप निरोग स्वास्थ्य जीवन बितायें। साहित्य कुंज और उससे जुड़े लेखकों की आपसे बहुत उम्मीद जुड़ी हुई हैं। आपके अनेक शुभकामनाएँ।

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