01-03-2016

अपनी बात, अपनी भाषा और अपनी शब्दावलि - 2

गतांक से आगे -

हिन्दी के संदर्भ में इस यूनिकोड तकनीकी क्रांति से लेखन को गति मिली। या यूँ कहूँ कि लेखन के प्रकाशन को गति मिली क्योंकि प्रकाशन सुविधाजनक हो गया। परन्तु यह प्रकाशन का माध्यम पेपर/काग़ज़ नहीं- इलैक्ट्रॉनिक था। लेखक के विचारों की अभिव्यक्ति तुरन्त सार्वजनिक होने की संभवाना न रहकर, वास्तविकता हो गई। इंटरनेट पर जो हिन्दी के पोर्टल थे, उनके प्रकाशकों और सम्पादकों के लिए प्रकाशन आसान हो गया। 

इन्हीं दिनों इंटरनेट पर ब्लॉग का उदय हुआ। वास्तव में यह इंटरनेट के आरम्भिक दिनों में जियोसिटीज़ के “व्यक्तिगत पेज” का नया विकसित, परिष्कृत, आधुनिक तकनीकी-जनित प्रतिरूप था। इस नए अविष्कार से लेखक को इंटरनेट पर हिन्दी पोर्टल के प्रकाशक और संपादक की भी आवश्यकता नहीं बची। अब जिस लेखक को थोड़ा-सा भी तकनीकी ज्ञान था, वह स्वयं निःशुल्क अपना ब्लॉग बनाकर कुछ भी, किसी समय भी और कहीं भी अपने विचारों को पूरे विश्व के समक्ष रख सकता था। इस सुविधा/ब्लॉग के लाभ और हानियाँ दोनों ही थे। हिन्दी पोर्टल के प्रकाशक/संपादक की क्षमता की सीमा थी और इसी कारण वेबसाइट सीमित सामग्री ही प्रस्तुत कर सकती थी। प्रत्येक वेबसाइट के प्रकाशन का समय और तिथि इत्यादि तय रहती है। ब्लॉग इन सभी बंधनों से मुक्त था। किसी समयसारिणी या संपादक का अंकुश नहीं था। इंटरनेट पर अब लेखक और लेखन दोनों ही निरंकुश हो गए।

इस वातावरण में लेखकों की बाढ़ आ गई। शोक का विषय यह था कि इन लेखकों में से अधिकतर प्रकाशित होने के योग्य ही नहीं थे। इन ब्लॉगर्ज़ के समूह बन गए और इनकी अपनी एक साहित्यिक संस्कृति का भी उद्भव हुआ – एक दूसरे की पीठ थपथपाने का। भाषा, व्याकरण और वर्तनी के कोई बंधन नहीं थे। अच्छे लेखकों ने भी अपने-अपने ब्लॉग बना लिए। जो साहित्यिक वेबसाइट्स वर्षों से संपादित और परिष्कृत साहित्य को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहीं थीं, उनको भी प्रकाशन की अच्छी सामग्री का अभाव खटकने लगा। परन्तु यह अनुभवी संपादक और प्रकाशक असहाय थे- संपादन तो तब होगा जब कोई प्रकाशन के लिए कुछ भेजेगा और जो मिलेगा वह संपादन के योग्य भी होगा। 

पाठक के लिए असुविधा थी कि आगे वह नियमित रूप से नियमित समय पर नई सामग्री एक ही पोर्टल पर पढ़ लेता था। अच्छे लेखक के अच्छे लेखन को इंटरनेट पर प्रस्तुत करने का दायित्व वेब पोर्टल के संपादक का था। इस नई व्यवस्था के वातावरण में पाठक इंटरनेट पर प्रकाशित “ब्लॉग के जंगल” में गुम होकर रह गया। साहित्य का प्रबुद्ध पाठक भी ब्लॉग-साहित्य में लेखन की त्रुटियों से उकता गया। लेखक के लेखन का अपरिष्कृत चेहरा पाठक के समक्ष था। भाव चाहे कितने ही दिल को छू जाने वाले हों परन्तु जब वर्तनी, व्याकरण और संप्रेषण में त्रुटि हो तो पाठक भाव के मूल तक पहुँच ही नहीं पाता। वह त्रुटियों की दलदल में ही फँस जाता है। ब्लॉग-साहित्य की यह सबसे बड़ी समस्या थी। ऐसा नहीं कि इन ब्लॉग्ज़ का कोई लाभ नहीं था। गंभीर साहित्यिक आलेख, शोध पत्र, भाषा का तकनीकी ज्ञान और हिन्दी के पुराने प्रसिद्ध लेखकों के लेखन को भी इसी माध्यम ने असीमित मात्रा में इंटरनेट पर उपलब्ध करवाया। इंटरनेट के अविष्कार का मूल कारण इसी प्रकार के ज्ञान के भण्डार को सार्वजनिक करना था - जो अब हिन्दी के लिए सहज, सुलभ और निःशुल्क हो गया था।

अभी कुछ पंक्तियाँ पहले मैंने ब्लॉग-संस्कृति का उल्लेख किया था। यह संस्कृति बहुत हानिकारक सिद्ध हुई, क्योंकि इस संस्कृति को मैं आज इंटरनेट या सोशल मीडिया पर हिन्दी की दशा का जनक मानता हूँ। “लाईक” या करतल ध्वनि के जो आइकॉन जो हम अब फ़ेसबुक इत्यादि पर देखते हैं, वह इसी संस्कृति का परिणाम है। ब्लॉग जितनी जल्दी लोकप्रिय हुए थे उतनी ही जल्दी उनकी चमक जाती रही। अच्छे लेखक एक बार फिर से अच्छी साहित्यिक वेबसाइट्स पर लौटने लगे। 

सोशल-मीडिया की लोकप्रियता से  हिन्दी के पाठकों की दो श्रेणियाँ बन गईं। फ़ेसबुक के लेखकों के फ़ेसबुकिया प्रशंसक/ फ़ॉलोअर्ज़ बन गए और अच्छे साहित्य के पाठकों को ब्लॉग्ज़ के जंगल से बाहर निकलने की पगडंडी मिल गई।

इंटरनेट पर हिन्दी प्रकाशन के इतिहास को मेरी आयु के सभी पाठक जानते हैं। इतिहास वर्तमान को जन्म देता है। वर्तमान काल में हम हिन्दी की जो दशा देख रहे हैं - वह इसी इतिहास की देन है। इस दौरान हिन्दी के शैक्षिक जगत में न जाने क्या हुआ है कि हिन्दी के अधिकतर लेखक सही हिन्दी नहीं लिख पा रहे हैं। इन प्रसिद्ध लेखकों की ग़लत वर्तनी और व्याकरण से भरपूर कृतियों को इंटरनेट पर पढ़कर हिन्दी का विद्यार्थी वही सीखता है जो वह पढ़ता है। अगर इन विद्यार्थियों को कोई सही भाषा सिखाना चाहता है तो विद्यार्थी सफल लेखक को ही सही मानता है। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की भाषा इस त्रुटिपूर्ण विश्वास को और दृढ़ कर देती है। पाठशालाओं में, यहाँ तक कि विश्वविद्यालयों के हिन्दी प्राध्यापक ही अगर ग़लत हिन्दी लिखेंगे तो उनके विद्यार्थियों से हम निराश होंगे ही। इस समस्या का क्या निदान होगा? या होगा भी या नहीं? विदेश में रहते हुए भाषा के प्रति यह चिंताएँ प्रायः सताती हैं।

इस करोना-काल में और वेबिनार के युग में कुछ समूह ऐसे दिख रहे हैं जो इस दिशा में प्रयासरत हुए हैं। इस समस्या की चर्चा भी आरम्भ हुई है। शिक्षा प्रणाली पर भी नए कोण से दृष्टिपात हो रहा है। बात केवल बातों तक ही सीमित नहीं पर कुछ ठोस क़दम भी उठाए जाने आरम्भ हुए है। अभी एक मौलिक ढाँचा बन रहा है जिस पर हिन्दी का शुद्ध और सुन्दर प्रतिष्ठान स्थापित होगा। “वैश्विक हिन्दी परिवार” व्हाट्स एप ग्रुप की यह पहल एक आशा की किरण है। हम सभी उन कर्मठ हिन्दी कर्मियों का धन्यवाद करते हैं जो इस भारी बोझ को अपने कंधों पर उठा रहे हैं। इन गतिविधियों के ब्यौरे को आप साहित्य कुञ्ज के होमपेज के "अन्य" शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।  मैं सदा ही मानता आया हूँ कि - क्रांतियाँ सरकारें नहीं, लोग लाया करते हैं। हिन्दी के प्रदूषण को समाप्त करने की क्रांति भी हिन्दी के पाठक, लेखक और विद्वान अपने व्यक्तिगत प्रयासों से ही लाएँगे।

– सुमन कुमार घई

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