01-07-2019

भारतेत्तर साहित्य सृजन की चुनौतियाँ - दूध का जला...

सुमन कुमार घई

साहित्य कुंज के पिछले अंक में मैंने जिन चुनौतियों की बात की थी वह आप्रवासी हिन्दी लेखक वर्ग की बढ़ती औसतन्‌ आयु, नए आप्रवासियों में हिन्दी के प्रति या हिन्दी साहित्य के प्रति अरुचि, आप्रवासी लेखकों का हिन्दी के आधुनिक साहित्य की मुख्य धारा से दूरी इत्यादि थीं। अब इसी चर्चा को आगे बढ़ाना चाहता हूँ।

समय समय पर भारत की पत्रिकाएँ या प्रकाशक आप्रवासी साहित्य के विशेषांक या संकलन प्रकाशित करते हैं। जो कि एक सराहनीय प्रयास है और इसके लिए हम आप्रवासी लेखक आभारी हैं। परन्तु इसमें भी कुछ समस्याएँ आड़े आ जाती हैं। पत्रिका या संकलन प्रकाशन से पहले प्रकाशकों का सम्पर्क निरन्तर आप्रवासी लेखकों से बना रहता है और रचनाओं की माँग भी निरन्तर होती रहती है। इससे आप्रवासी लेखक के मन में एक भ्रम पैदा हो जाता है कि मानों उसके बिना यह संकलन या संस्करण अधूरा ही रह जाएगा। यह भ्रम स्वजनित नहीं होता - बल्कि प्रकाशकों द्वारा पैदा किया जाता है। इस भ्रम के महल तब टूटते हैं जब लेखक को पत्रिका/पुस्तक प्रकाशन की सूचना तक नहीं मिलती। कई बार पुस्तक या पत्रिका की प्रति प्राप्त करने के लिए शुल्क की माँग भी की जाती है। 

भारत में "प्रवासी साहित्य" के प्रकाशन का आम प्रचलन इंटरनेट के उदय के साथ ही हुआ था और इंटरनेट की बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही बढ़ा। आप्रवासी लेखेकों के लिए यह एक आशा की किरण थी, क्योंकि हम लोग एक साहित्यिक शून्य में काम कर रहे थे। आरम्भिक वर्षों में सब ठीक चला। प्रकाशन के बाद देर सही पर कभी न कभी संकलन या पत्रिका की प्रति मिल जाती थी। अब ऐसा होना लगभग असम्भव सा प्रतीत होता है। इसका प्रभाव द्विपक्षीय है। बहुत से अच्छे आप्रवासी लेखक इन संकलनों से दूर रहते हैं। और बहुत से ऐसे हैं जो अपने अपरोक्ष स्वार्थों के कारण बढ़-चढ़ इन योजनाओं में सहायता भी करते हैं। इससे भारत में प्रवासी लेखन की सही छवि सामने नहीं आती और समीक्षक सभी प्रवासी लेखकों के बारे में अपना मत द्वितीय स्तरीय प्रकाशित रचनाओं के आधार पर बना लेते हैं। साहित्य कुंज में प्रकाशन के लिए प्रवासी लेखन के सन्दर्भ में कई ऐसे शोधपत्र मिले हैं जिनमें इन प्रवासी संकलनों को उद्धृत किया गया है। यह भ्रांति भारतीय मुख्य धारा के साहित्य के लिए महत्वपूर्ण हो न हो परन्तु भारतेत्तर साहित्य सृजन के प्रति बनी ग़लत अवधारणाओं के कारण आप्रवासी लेखक के लिए महत्वपूर्ण है। यह एक ऐसी समस्या है जिसका सहज समाधान है। प्रवासी संकलनों /संस्करणों के प्रकाशकों से केवल यह अनुनय है कि कृपया वह रचनाकार की भावनाओं का आदर करते हुए, कम से कम उन्हें सूचित कर दें कि रचना प्रकाशित हो चुकी है और संकलन और पत्रिका को विदेश डाक द्वारा भेजने की लागत को सहन करने में अक्षम हैं तो कम से कम पीडीएफ़ तो भेज ही सकते हैं।

दूसरी ओर शोधार्थियों से भी अनुरोध है कि प्रवासी साहित्य पर शोधपत्र लिखने से पहले रचना की गुणवत्ता का मूल्यांकन करके उसको अपने शोध में सम्मिलित करें। लेखक/लेखिका की कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, कितने सम्मान मिल चुके हैं - कोई साहित्यिक पैमाना नहीं है। आजकल तो पैसा फेंक तमाशा देख का ज़माना है। जो जितना पैसा खर्च करता है वैसा प्रकाशन, लोकार्पण, समीक्षा और सम्मान का पैकेज ख़रीद लेता है।

समय समय पर भारत से विश्वविद्यालयों प्राध्यापक भी यहाँ की साहित्यिक गोष्ठियों में उपस्थित होते हैं। अक्सर उनकी प्रतिक्रिया में एक ही बात सुनने को मिलती है कि वह विदेशों में हिन्दी साहित्य सृजन के संबंध में लिखना चाहते हैं और उन्हें स्थानीय लेखकों से सहायता चाहिए। स्थानीय लेखक या संस्थाएँ सहायता करती हैं परन्तु अन्त में इस परिश्रम का कोई भी परिणाम देखने को नहीं मिलता। फिर स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि "दूध का जला छाछ भी फूँक फूँक कर पीने" लगता है।

ऐसे साहित्यिक वातावरण में प्रवासी लेखक क्या करे? 
 

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