घटना सच्ची है लेकिन स्थान और पात्रों के नाम मैंने बदल दिए हैं। दरअसल, पिछले एक साल से मैं उत्तम नगर में सुखराम जी के पड़ोस में रहता हूँ। दिल्ली के उत्तम नगर की संकरी गलियों में बने सभी मकान एक दूसरे से चिपके हुए हैं। फलस्वरूप, न चाहते हुए भी आपस में परिचय हो जाता है। ख़ैर, पहले आपको सुखराम जी के बारे में बता दूँ। उनकी उम्र यही कोई पचास के आसपास है और परिवार के नाम पर उनकी पास पत्नी के अलावा एक बेटा और दो बेटियाँ हैं। सुखराम जी की परचून की दुकान है। बहरहाल, सुखराम जी के अलावा आपका परिचय गज्जू से भी करवाना ज़रूरी है। गज्जू के बाप का मकान तो अगली गली में है लेकिन अभी एक सप्ताह पहले तक उसका सारा समय हमारी गली में गुज़रता था। वज़ह इतनी ही थी कि वह पिछले छह महीनों के दौरान सुखराम जी के परिवार के साथ ऐसे घुल मिल चुका था जैसे पानी में नमक। एक-दो बार मैंने जब सुखराम जी का ध्यान इस और खींचा तो वे बोले, "इस कलयुग में गज्जू

जैसा लड़का भी होगा, मैंने कभी सोचा न था। हमारे छोटे-मोटे सभी काम ऐसे करता है जैसे आजकल कोई अपना सगा भी नहीं करता है।"

बहरहाल, यही कोई छह दिन पहले सुखराम जी की सत्रह वर्षीया बेटी गोपा जब स्कूल से घर नहीं लौटी तो सुखराम जी ने मदद के लिए गज्जू को खोजा। पता चला कि आज गज्जू भी सुबह से घर नहीं लौटा है। उसी दिन देर शाम किसी जान-पहचान वाले ने सुखराम जी को सूचना दी कि उसने गोपा और गज्जू को दोपहर से कुछ पहले आनंद विहार बस अड्डा जाने वाली बस में चढ़ते देखा था। छह दिन बीत चुके हैं लेकिन पुलिस अभी गज्जू और गोपा तक नहीं पहुँच पाई है। सुखराम जी को असली सदमा इस बात का है कि वे कलयुग में रहते हुए भी सतयुगी सपना देखते रहे।

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