बाप बनकर देखिए
महेश कुमार केशरी
आपको लगता हैं कि दुनियाँ में सिर्फ़ एक बाप परेशान हैं। आप ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं। नहीं, साहब, जब से यह मोबाइल आया हैं, हम बापों की टेंशन कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई हैं। उम्र-दराज़ होने को हैं, दहाई का आँकड़ा छू लिया हैं, पचास के आस-पास पहुँचने वाले हैं—लेकिन इस उम्र के लोगों को दम मारने की फ़ुर्सत नहीं हैं। सुबह से शाम तक हलकान रहते हैं। रही-सही कसर बच्चों ने पूरी कर दी हैं।
भाई साहब की डिमांड पूरी होती ही नहीं। भाई साहब को घड़ी चाहिए थी। मैंने कहा, “भाई, कोई सौ-दो-पाँच सौ रुपये की घड़ी ख़रीद लो। टाइम देखने से मतलब हैं। सौ रुपये की घड़ी भी उतना ही समय बताएगी, जितना पाँच सौ या दस हज़ार की। घड़ी तो घड़ी है, चाहे कितने रुपये की हो—घड़ी से समय देखने का ही काम लिया जा सकता है। सौ की नहीं लोगे तो पाँच सौ की ले लो, एक हज़ार की ले लो।”
साहब, महीने भर मुँह फुलाए रहे। बीच-बीच में मुँह खोलते भी थे। एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए हुए थे। चार-पाँच बार दुकानदार के पास गए। बहुत सी घड़ियाँ देख लीं—चेन वाली, बेल्ट वाली, वॉटरप्रूफ़—लेकिन भाई साहब को कोई घड़ी पसंद नहीं आई।
उनको स्मार्टवॉच चाहिए थी। स्मार्टवॉच पहनने के लिए आदमी को स्मार्ट होना होता है, कुछ कमाना‑धमाना भी पड़ता है, बाप को कुछ रिलीफ़ भी देना होता है। जो स्मार्ट होता है, वह रील्स देखकर समय नष्ट नहीं करता, बल्कि समय का सदुपयोग करता है, क्षण‑क्षण को बचाता है, “जो काल करै सो आज कर” की उक्ति पर काम करता है।
अब, वॉच पहनने के लिए वैसी दृष्टि आपके पास तो है नहीं। दृष्टि होती तो सत्रह सौ की घड़ी न ख़रीदते। न तो आपके पास समय देखने का समय है और न ही वैसी दृष्टि। समय देखने से ज़्यादा ज़रूरी है समय को पहचानना। जो समय को पहचान लेता है, उसे समय देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
जो मितव्ययी होता है, समय उसी की क़द्र करता है। ख़र्चीले लोग हमेशा दूसरों के आगे हाथ फैलाते हैं। लिहाज़ा, बुरे वक़्त के लिए भी कुछ बचाकर रखना ज़रूरी होता है।
लेकिन भाई साहब को महीन‑से‑महीन बात भी मोटी और बकवास लग रही थी। उनके सिर पर घड़ी का भूत सवार था। उन्हें हर हाल में स्मार्टवॉच चाहिए थी। चौदह‑पंद्रह साल की उम्र में लोग शहंशाह बन जाते थे, बाहर से आक्रमण करके राजा बन जाते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि राजा बनकर अपनी और अपने लोगों की दूसरों पर निर्भरता ख़त्म कर देते थे।
समय को पहचान ले—ऐसी दृष्टि आजकल के युवाओं के पास कहा हैं? पैसे तो आपके लगने नहीं हैं, अपनी जेब से—जाना है बाप के पॉकेट से। “ग़रीबी में आटा गीला होना”—इस कहावत का अभिप्राय उस दिन मुझे समझ में आया, जब बीच का महीना चल रहा हो, हाथ तंग हो, और किसी तरह दोस्तों से क़र्ज़ लेकर काम चलाया जाए।
लेकिन भाई साहब के पास तो भरपूर समय है—रील्स देखिए, गेम्स खेलिए। सही मायने में जिसको समय की क़ीमत पता हो, उसी के लिए घड़ी होनी चाहिए—जो समय से काम करता हो, एक रुपये में दस पैसा भी समय का महत्त्व समझता हो, जो समय का सेकंड‑से‑सेकंड बचाता हो। उनके लिए घड़ी ज़रूरी हैं, जिनके लिए समय सोने से भी महँगा हैं—उनके लिए, न कि उनके लिए जिनको सोने से फ़ुर्सत नहीं। उनको घड़ी की भला क्या ज़रूरत? सोने से महँगे समय की जिसको क़द्र नहीं, उसे घड़ी की ज़रूरत भी नहीं।
भाई साहब ने सुझाया कि घड़ी का मतलब सिर्फ़ घड़ी नहीं हैं, बल्कि आजकल ब्लूटूथ से मोबाइल कनेक्ट करने के कारण घड़ी का महत्त्व बढ़ गया है—कुछ वैसे ही जैसे ग्रेजुएशन अब तीन की जगह चार साल का हो गया हैं, और इस लंबे सत्र के लोग फ़ायदे गिना रहे हैं। मैंने भाई साहब से पूछा, “ब्लूटूथ से मोबाइल कनेक्ट करके क्या होना हैं?” भाई साहब ने बताया कि उससे कॉल रिसीव करने के लिए मोबाइल को छूना नहीं पड़ेगा—केवल ब्लूटूथ से कनेक्ट करके घड़ी से ही बात की जा सकती हैं।
मैंने फिर पूछा, “जब मोबाइल छूना ही नहीं, तो फिर मोबाइल लिया ही क्यों?”
भाई साहब ने समझाया, “मोबाइल मोबाइल हैं और घड़ी घड़ी हैं। मोबाइल साध्य हैं, घड़ी साधन हैं। जैसे हम सीधे ईश्वर से कनेक्ट नहीं हो सकते, उसके लिए किसी बिचौलिए की ज़रूरत होती है—ठीक वैसे, जैसे भगवान के एजेंट चर्च, मंदिर, मस्जिद में होते हैं, वैसे ही स्मार्टवॉच एजेंट की तरह हैं, जो मोबाइल (भगवान) से हमें सीधे कनेक्ट करवाता हैं। जैसे नाव में पतवार की ज़रूरत होती है; पतवार के बिना हम नदी‑रूपी वैतरणी पार नहीं कर सकते, वैसे ही स्मार्टवॉच के बिना हम मोबाइल से कनेक्ट नहीं हो सकते। एक तरह से मोबाइल आत्मा हैं और घड़ी शरीर। वैसे ही मोबाइल के साथ घड़ी है। घड़ी देखकर टाइम पास नहीं किया जा सकता, लेकिन मोबाइल देखकर अच्छे‑से‑अच्छा और ख़राब‑से‑ख़राब समय पास किया जा सकता है।”
लेकिन लगता है, इस जन्म में इस शरीर को आराम मिलने से रहा। कारण यह कि दुनिया में जितने भी बाप हैं, सब‑के‑सब उम्मीद पाले हुए हैं कि उनकी संतान कुछ करे। इस इंटरनेट के गड्ढे में भाई साहब भी डूबे हुए हैं। सुबह स्कूल जाते समय रील्स देखते हैं, स्कूल से आते ही शर्ट‑पैंट‑टाई फेंक देते हैं—बस्ता फेंको और रील्स पर नज़रें गड़ाओ।
उनका जो कुछ भी ज्ञान है, वह रील्स‑अर्जित है। एक बाप की हसरत क्या होती है—उसका बच्चा पढ़े‑लिखे, बाप को आर्थिक समस्याओं से मुक्ति दे। लेकिन ज्यों‑ज्यों उम्र बढ़ती जाती है, ज़िम्मेदारियों के चलते तनाव बढ़ता जाता है; जवानी के समय में बुढ़ापे की फ़ीलिंग आती है। भाई साहब का पढ़ाई‑लिखाई से लगाव ख़त्म होता जा रहा है। भाई, मत बन आई.ए.एस., मत बन डॉक्टर, मत बन इंजीनियर—टेक्स्ट की किताबों से तो जी चुराता है। अरे भाई, NEET, U.P.S.C., J.P.S.C., P.C.S. की तैयारी छोड़ दो—उसके लिए पढ़ना पड़ता है, रील्स देखकर NEET नहीं निकलता।
बात यहीं ख़त्म नहीं हुई थी। स्मार्टवॉच महीने भर भी न पहनी भाई साहब ने—वॉच कहीं टेबल पर किनारे फेंकी हुई है। भाई साहब ननिहाल से लौटे हैं, हाथ में घड़ी न देखी तो पूछा, “भाई साहब, आपकी घड़ी नहीं दिख रही—स्मार्टवॉच?” भाई साहब से तो नहीं, लेकिन श्रीमती जी से अद्भुत जानकारी मिली कि भाई साहब ननिहाल से तो सकुशल लौट आए हैं, लेकिन स्मार्टवॉच का चार्जर और केबल वहीं छोड़ आए हैं। भाई साहब बुद्धि के बलिहारी हैं—उन्हें भूलने की बेहतरीन बीमारी है। भाई साहब के कारण नया एडैप्टर और केबल लेकर आना पड़ा। सत्रह सौ की घड़ी ख़रीदने के बाद तीन सौ का केबल का चूना भी लगा।
साल भर बाद की कहानी बता रहा हूँ—कहाँ केबल और अब कहाँ एडैप्टर? स्मार्टवॉच की बात ही मत पूछिए। चीज़ें ख़रीदनी हैं, लेकिन चीज़ों की इज़्ज़त इनके पास नहीं। अभी साल भर न बीता था कि भाई साहब को साइकिल ख़रीदने का ख़ब्त सवार हो गया। भाई साहब को पढ़ना‑लिखना तो है नहीं, कुछ‑ना‑कुछ तीन‑पाँच सूझता रहता है—“बैठल बनिया का करे, इस कोठी का धान उस कोठी।” रोज़ सुबह‑शाम के तगादे पर आख़िर एक दिन साइकिल ख़रीदनी पड़ी। दो‑चार महीने ठीक चलाया, अब साइकिल में गियर लगवाने की कह रहे हैं भाई साहब।
अब साइकिल तक बात ठीक थी—वर्ज़िश हो जाती थी—लेकिन इधर भाई साहब को साइकिल खींचने में ताक़त लगती है। भाई साहब पिज़्ज़ा खाकर काम चलाते हैं; उन्हें नहीं पता कि पिज़्ज़ा खाकर साइकिल नहीं चल सकती। लिहाज़ा, गियर लगवाने की कह रहे हैं। भाई साहब के प्रिय खाद्य पदार्थों में पिज़्ज़ा, समोसा और मैगी हैं। अब उनको कौन बताए कि ये खाने की चीज़ें नहीं हैं? खाने‑पीने की चीज़ों से उनका मन भागता है—दूध पीना नहीं चाहते, लस्सी देखकर उल्टी आती है, खीरा‑तरबूज़ से परहेज़ है, भीगे चने देखकर ऊबकाई आने लगती है, अमरूद देखते ही गश खाने लगते हैं।
तो भाई साहब, जब तक चावल, दाल, दूध, फल‑सब्ज़ियाँ नहीं खाओगे, तब तक साइकिल में गियर की ज़रूरत पड़ेगी—और मैं साइकिल में गियर लगवाने से रहा!
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