घास 

महेश कुमार केशरी  (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


बारूदी ज़मीन पर घास उगने लगी है 
चींटिंयाँ रेंग रही हैं 
उसी घास पर। 
हवा धीरे-धीरे बह रही है 
सहला रही है हौले-हौले घास के गाल 
पक्षियों का कोलाहल सुनाई दे रहा है 
वातावरण में 
नहीं अब नहीं सुनाई दे रहा है 
लड़ाकू जहाज़ों के ईंजन का शोर
युद्ध करने वाले जहाज़ 
अब वापस लौट गए हैं 
दुनिया में अब शान्ति है 
बहुत शान्ति 
इस शान्ति के होने का मतलब है 
युद्ध बहुत समय तक नहीं लड़ा जा सकता 
इस दुनिया में! 
युद्ध को ख़त्म होना ही होगा 
बारूद खाकर पेट नहीं भरा जा सकता 
घास खाकर पेट भरा जा सकता है! 
बारूद पर हमेशा भारी रहेगी घास 
चाहे समय कितना भी प्रतिकूल हो 
ये सही है कि युद्ध लड़े जाएँगें 
कुछ लोगों की घटिया महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए 
लेकिन हर बार उग आएगी बारूदी ज़मीन पर 
घास! 

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