भगदड़
महेश कुमार केशरी
मुहल्ले के लोग फागू की लाश को घेर हुए थे। फागू की लाश आ गई थी।
सब लोग चर्चे कर रहे थे। बड़ा नेक आदमी था। हर दिन भजन-कीर्तन करता रहता था। पूरे गाँव में इससे बड़ा धर्मात्मा और साधु आदमी कोई नहीं था। बेचारा सीधे सरग चला गया होगा।
चनेसर बिदक गया, “सरग कैसे जा सकता है? ऊ तो दिल्ली गया था। अपने साले के पास, काम करने।”
टेकलाल ने बताय, “अरे दिल्ली तो अभी तीन महीने पहले गया था। उससे पहले तो यहीं गाँव में रहता था। धनकट्टी के बाद वैसे भी गाँव-घर में पेट पालने के लिये काम कहाँ होता है। चला गया था। अपने साले रामबदनू के साथ कुली का काम करने।
“वहीं स्टेशन पर रहता था। वहीं सोता था। जब ट्रेन से लोग कुंभ के लिए रवाना होने वाले थे। तो भगदड़ मच गई। और फागू कुचला गया। और मर गया।”
एतवारी ने कहा, “चलो मोक्ष तो मिल ही जायेगा। उस बेचारे को।”
शनिचरा असहमत था, “मोक्ष काहे मिलेगा। ऊ कौन कुंभ नहाने जा रहा था क्या?”
मँगरा ने समझाया, “पंडित जी कह रहे थे। जो लोग कुंभ नहाने जा रहे हैं। वे व्रती लोग थे। व्रतियों में साक्षात् ईश्वर निवास करते हैं।
“लोगों के पैरों से कुचला गया। ईश्वर का रज होता है, व्रतियों में। सीधे सरग जायेगा। उसको तो मोक्ष मिल गया। अपने कमाकर तो भला इस जन्म में बेचारा कभी ना जा पाता। जो लोग उसको कुचलकर उसको कुंभ नहाने गये होंगे। उसकी मिट्टी भी उनके पैरों से चलकर वहाँ पहुँच गई होगी।”
“सच कह रहे हो मँगर भाई। फागू मरकर भी तर गया। गरीब आदमी कहाँ से लायेगा। दस बीस हजार रुपये कुंभ नहाने के लिए।”
शनिचर ने अपने ईर्ष्या व्यक्त की, “लेकिन एक बात है। फागू की औरत पतुरीया तर गई। सरकार ने दस लाख मुआवजा का एलान किया है।”
“धत् पगला सरकार उसको मुआवजा देती है। जिसका टिकस पक्का होता है। माने रिजर्वेशन वालों को। उसको मुआवजा मिलेगा।”
एतवारी ने आपबीती बतायी, “धत् तेरी की मुआवजा भी कहीं मिलता है? दो लाख का चेक मुझे चार साल पहले मिला था। आज तक पैसा खाते में नहीं आया। बैंक का बाबू कहता है। फंड नहीं है। सूखा वाले कोष में।”
“केस काहे नहीं कर देते, सरकार पर। अक्ल ठिकाने आ जायेगी। घोषणा करने वालों की।”
“ससुर यहाँ नमक-रोटी नहीं खाने को। और चले हैं केस करने,” टेकलाल खीज गया।
“चलो, फागू ने गंगा नहा लिया। व्रतियों के पैरों से कुचला गया,” फुलेसरी बोली।
पतुरिया बिदक गई, “तुम सब लोग चुप रहो। खुद तो मर खप गया। लेकिन अपने पीछे चार बच्चे छोड़ गया है। मेरे मत्थे मढ़कर। उनको कहाँ से खिलाऊँगी?”
“सब पार लग जायेगा बहन। किसी के बिना किसी का काम रुकता है, भला? सब भगवान पार लगायेंगे। पतुरिया ऐसा ना कह। मरने वाले को अंट-शंट नहीं कहा जाता। बड़ा पुन्नी आदमी था। खुद तो सरग चला गया। तुम लोग भी सरग चले जाओगे। मरने के बाद। आदमी का पुन्न औरत को और उसके बाल बच्चों को जरूर मिलता है। तू निश्चिंत रह पतुरिया।”
लेकिन, लोगों के सांत्वना की बात अलग थी। पेट की आग भी भला पाप-पुण्य के तर्कों से भरती है। जब भूख लगती है। तो सारा-का-सारा दर्शन धरा रह जाता है। भूखे पेट भजन नहीं होता। मूर्त–अमूर्त, जड़–चेतन, ईश्वर–मौत, पाप–पुण्य सब कहने की बातें हैं। दर्शन की बातें। भूखे पेट दर्शन पर बात नहीं हो सकती।
आज पतुरिया की दुनिया उजड़ गई थी। वो एक अंधे कुँए की तरफ़ बढ़ रही थी। जहाँ उसका कोई भविष्य ना था!
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