तब सत्ता डरने लगती है घास की कविता से
महेश कुमार केशरी
घास पर कविता लिखना सबके बस की
बात नहीं है
घास पर कविता लिखते समय
लोगों के हाथ काँपने लगते हैं
पैरों में झुरझुरी पैदा होने लगती है
और आप गिर जाते हैं
लड़खड़ाकर
घास पर कविता लिखते हुए आप
सत्ता की चाटुकारिता नहीं कर सकते
नहीं बैठ सकते दुनिया के सबसे ताक़तवर लोगों की गोद में
क्योंकि तब आप लिख रहे होते हैं
दुनिया के सबसे कमज़ोर लोगों पर
कविता
जब कमज़ोर लोगों पर कविता लिखी जाती है
तो सत्ता के कान खड़े हो जाते हैं
आप लिखकर देखिए घास पर कविता
मैं दावा करता हूँ
आप नहीं लिख सकते घास पर कविता
नहीं कर सकते अपनी कविता में
दुनिया के सबसे कमज़ोरतर लोगों की बात
सत्ता डर जाती है घास पर
कविता लिखने-पढ़ने वाले लोगों से
घास पर अगर आप कविता लिखेंगें तो
क्रांति आ जाएगी
आप जब घास पर कविता लिखेंगें तो
आपका घर जलाया जा सकता है
आप रास्ते से कहीं ग़ायब हो सकते हैं
या आपकी लाश तैरती मिलेगी किसी नदी में
क्योंकि घास में जुंबिश होते ही खड़े हो जाते है कान
सत्ता में बैठे लोगों के!
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