आलू प्याज़ दहाई पर है, फूल गोभी सैंकड़े पर
महेश कुमार केशरी
बजट में क्या है, इसकी राय आजकल नेताओं से पूछी जा रही है। पक्ष वालों के तर्क हैं कि बजट संतुलित है। और आम-आदमी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। लेकिन विपक्ष को कभी भी सतारूढ़ दल का बजट भाया ही नहीं था। आजकल बजट में आम आदमी की रायशुमारी नहीं ली जा रही है। रायशुमारी ली जा रही है, तो बजट बनाने वालों के चेलों-चपाटों की। जिनको बजट से कोई मतलब ही नहीं है। लेकिन उनको बजट हमेशा संतुलित लगता है। ऐसे चेले-चपाटे सावन में अंधे हुए होते हैं। इसीलिए इनको हमेशा हर तरफ़ हरियाली दिखाई देती है। बजट में बात किसी की हो रही है और मतलब किसको है। बजट की बात आती है। तो आम आदमी और मध्यम वर्ग कान में रूई ठूँस लेता है। “अँधरा के जैसन दिन वैसन रात”। कल भी कमाना था; आज भी कमाना है। बिना कमाए कल भी सरकार खाने को नहीं देती थी; आज भी नहीं देगी। ना तो मध्यम वर्ग को और ना निम्न वर्ग को मतलब है, इस बजट से। कौन-सा सस्ता होने पर लोग सोना ख़रीद कर रख ले रहे हैं। यहाँ तो दाल जुटता है, तो भात नहीं। भात जुटता है, तो सब्ज़ी नहीं। पाँव हमेशा से चादर से बाहर। कल भी जनता भीख माँगती थी; आज भी भीख ही माँग रही है। पाँच किलो अनाज कल भी पाती थी; आज भी पाती है। बाक़ी सरकर तो रील्स बनाने की ट्रेनिंग त़ो देगी ही। और बड़े तो रील्स पहले से बना ही रहें हैं। सरकार तो पहले से ही कह रही है। रील्स बनाकर रोज़गार पाइए।
टैक्स स्लैब, छह लाख, बारह लाख, बीस-लाख लोगों को समझ नहीं आता है। टैक्स और स्लैब्स बहुत भारी-भरकम शब्द हैं। सबको समझ नहीं में भी नहीं आता है। टैक्स स्लैब समझकर करना भी क्या है? जब ना तो दस-बीस लाख रुपए होंगे एक साथ—ना उनको पता है; ना ही उन्होंने एक साथ देखा हैं। ना नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी। ये बात मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग को समझ में नहीं आती है। जिनको समझ में आती है वो बंद ए.सी. कमरों में जुगाली कर रहे हैं। उनको मतलब नहीं है। टीवी महँगा हुआ है या सस्ता। उनको मतलब नहीं है सोना महँगा हुआ है या सस्ता। किलो-दो-किलो पाँच-किलो भरकर रखा है, लाॅकर में। ये ए.सी. में बंद लोग हैं। उनको इस बात से मतलब नहीं है। निम्न-मध्यम वर्ग, छोटा-वर्ग तो सत्यनारायण कथा का भोज खाने को आतुर है या फिर लाईन में लगा हुआ है। पाँच किलो आनाज के लिए। ये वर्ग तो किसीके शादी-ब्याह का कार्ड खोजता है जीमने के लिए। उनको बस खाने से मतलब है। उनका काम तो प्याज़ का दाम कम हुआ है या नहीं, ये जानना है। आटे का दाम कम हुआ है कि नहीं, ये जानना है। दाल का बजट हर सरकार में ख़राब रहा है। भाई साहब इन लोगों के लिए बजट भारी-भरकम शब्द है। दूध का दाम कम कर दीजिए। पनीर सस्ता कर दीजिए।
सेंसेक्स-निफ़्टी कितना ऊपर-नीचे हुआ है इससे किसी को क्या मतलब है? बजट के बाद होली आती है। काजू, बादाम, गिरी का भाव कम हुआ है कि नहीं—इनको ये जानना होता है। सबसे ख़राब बात जो है रिफ़ाईंड तेल कंपनियों द्वारा आम जनता का शोषण करने की है। वज़न सात-सौ-पचास एमएल . . . और दाम एक लीटर का ले रही हैं। एक सौ सत्तर अस्सी रुपये। अच्छा बेटा होशियार बन रहे हो। कितना एक-सौ-चालीस का चाहिए एक पैकेट रिफ़ाईंड। सात सौ पचास एमएल मिलेगा। क्या कहा अव्वल तो एक लीटर मिलेगा ही नहीं। और मिल भी गया तो एक लीटर एक सौ नब्बे से कम में नहीं मिलेगा।
इन पर पैनल्टी होनी चाहिए। बाक़ी शराब की शिकायत तो हमेशा से रही है। चूँकि होली का समय होने वाला है। इसलिए सरकार को शराब पर ध्यान देना चाहिए। शराब का दाम और उस पर टैक्स में बेतहाशा कमी होनी चाहिए। शराबियों को लगता है कि सरकार उसकी दुश्मन है। अरे नहीं भाई बजट के महीने भर तक चीज़ों के दाम जैसे दूध, दही, पनीर, आटा, चावल, दाल, रिफ़ाईंड पर सबकी नज़र रहती है। बजट में सबसे सस्ता सिलेंडर होता है। फिर महीने-महीने बढ़ता जाता है। अगले बजट तक दो-चार-सौ रुपये का इज़ाफ़ा हो ही जाता है। फिर रामनवमी आ जाती है। झंडा ख़रीदना है। अप्रैल आ गया है— किताब-काॅपी, एडमिशन, री-एडमिशन।
क्या किताब बदल दी। अभी तो पिछले साल बदली थी। अच्छा स्कूल ड्रेस भी बदल गई। जूता-मोज़ा और टाई भी नया लेना होगा। अरे डायरी तो हर साल ख़रीदनी पड़ती है। अच्छा बैग भी फट गया है। अच्छा बैग भी लेना है। लम्बा-चौड़ा बजट। ले बजट दे बजट। रामनवमी आ गई है। लो अब रामनवमी का बजट बनाना है।
इस बार पहले साल से भी ज़्यादा अस्र-शस्त्र की नुमाईश होनी है। रामराज्य फिर आएगा हर घर भग्गवा छाएगा। जो राम का नहीं वो किस काम का नहीं। जो राम को लाए हैं हम उनको लाएँगें। सतुआन के दिन सतुआन आ गया है। उसका बजट बनाइए। पंखा दिवस है। हाथ पंखा का दाम इधर बहुत बढ़ गया है। गर्मी लग रही है। कूलर लेना है। ए. सी. ख़राब है। बिजली नहीं आ रही है। पॉवर कट ज़्यादा हो रहा है। अरे बिजली बिल ज़्यादा आ जाएगा ए.सी. कम चलाओ। रात में छत पर सोना है। बिजली नहीं है आज। शाम को दो घंटा ए.सी. चलाकर छोड़ देने से सारी रात रूम ठंडा रहता है। बार-बार, आना-जाना मत करो। गर्मी ज़्यादा है। ए.सी. काम नहीं कर रहा है। बिजली का बजट बन रहा है।
फिर जहाँ जून बीता न्यूज़ चैनलों में नीचे लिखा आता है। आज से फ़लाना दूध चार रुपये लीटर महँगा। अब साल के छह महीने निकल चुके हैं। जुलाई अषाढ़ का महीना है। भुट्टा नमक लगाकर खाइए। लो सब्ज़ी में आग लग गई है। टमाटर सौ रुपये किलो! प्याज़ भी अस्सी रुपये किलो। तब तक सावन आ जाता है। ये बोर्ड विवाद का महीना है। सबको बोर्ड लिखवाना है। खाने-पीने की दुकानों पर। आख़िर आस्था का महीना है। पवित्र महीना सावन। फूलों की वर्षा हो रही है काँवड़ियों पर। अब लोगों में भक्ति भाव का संचार है। लोग बजट की बात और महँगाई की बात भूल चुके हैं। अब्दुल और राम की पहचान ज़रूरी है। भादों में जन्माष्टमी की तैयारी हो रही है। जन्माष्टमी का बजट। दुकानें बरसात में ख़ाली-ख़ाली रह रहीं हैं। आमदनी ज़ीरो। दस-दस दिनों तक बोहनी नहीं हो रही है। बजट गड़बड़ा रहा है दुकानदारों का। एक ग्राहक नहीं। बोहनी नहीं हो रही है। दुकानदार दुकान खोलता है। और बंद करता है। दो महीने तक दुकानदारी चौपट। मुम्बई में दही-हाँड़ी कार्य्रक्रम चल रहा है। गोविंदाओं के चोटिल होने पर चर्चा चल रही है। जितीया आ गया है। खीरा सौ रुपये किलो बिक रहा है। सब्ज़ी वाले का सिर ग्राहक ने बाट से फोड़ दिया है। गणेश उत्सव आ गया। गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ। लो आ गया दशहरा। रावण का वध होना है। कपड़े ख़रीदने हैं घर के सब लोगों के लिए। लो फिर बजट बिगड़़ गया है। लो दीपावली आ गई। रंगाई-पुताई का ख़र्चा। बजट बिगड़़ गया है फिर से। मुँह का स्वाद भी बिगड़़ा जाता है। पटाखे जलाने हैं। पूजा का सामान। फिर ज़ायक़ा बिगड़ गया है मुँह का। पराली पर रोक लगाने का समय है। प्रदूषण पर चर्चा चल रही है। सारा प्रदूषण पराली जलाने और किसानों के कारण है। मार दो ससुरों को—खरपतवार ही तो हैं। चढ़ा दो ट्रैक्टर! कर दो सफ़ाया। चींटें ही तो हैं—ख़ालीस्तानी!
लोगों को घर जाना है। छठ पूजा के लिए ट्रेन पकड़नी है। छठ का बजट अलग है। दऊरा लेना है, सूप लेना है, परसादी, ख़रीदनी है। उसका बजट बनाना है।
लो इस बार बारिश ज़्यादा हुई है। सब्ज़ियों के दाम आसमान पर हैं। फूल गोभी एक-सौ-बीस रुपये किलो बिक रहा है। लोग पाव-पाव किलो ख़रीद रहे हैं। आलू-प्याज़ दहाईं पर हैं। नया आलू महँगा है। लेकिन सोने से सस्ता। अव्वल मटर तो दिखाई नहीं देता है। मिलता भी है तो दो-सौ-रुपये किलो। आदमी मटर क्यों खाएगा। मुर्ग़ा ना खाएगा। दो-सौ-रुपये किलो। बर्बाद ही होना है तो अच्छे से होना है। लीजिए फिर से पच्चीस दिसंबर आ गया है। मनाइए क्रिसमस डे। लो नया साल भी आ ही गया है। पूरे महीने भर का वीकेंड है। जमकर दारू पीनी है। नयी-नयी योजनाएँ बनानीं हैं। काम योजनाओं पर अगले साल से होगा। आज नया साल है। इरादे बनाने का दिन है। काम तो होता ही रहता है। जीवन पड़ा हुआ है काम करने के लिए! जो काम पेंडिंग पड़ा है। वो तो जनवरी में नहीं होगा भाई साहब। अब फरवरी का इंतज़ार कीजिए। फरवरी में देखते हैं। सोचते हैं काम करने के बारे में। फिर से बजट आ गया है। बजट बिगाड़ने के लिए। अच्छा सोने की बात। तो जनता तो सो ही रही है। और सोना अपोजिशन और सरकार में बैठे लोग ख़रीद रहें हैं। बजट पर फिर बात होगी। तब तक झाल बजाइए, रील्स बनाइए। संस्थान खुल गए हैं इसके लिए। डिबेट में फिर पूछ रहा है, पत्रकार—बजट कैसा है इस बार का!
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