आर्मी मैन

15-01-2026

आर्मी मैन

महेश कुमार केशरी  (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

“दादी मैं बाहर खेलने जाऊँ?” सुरभि ने सोफिया से इजाज़त माँगी। 

“हाँ, बेटा लेकिन ज़्यादा दूर मत जाना। यहीं अहाते में खेलना। और हाँ, शोर बिल्कुल भी नहीं करना। दोपहर का वक़्त है। सब लोग अपने-अपने घरों में सो रहे होंगे।”

“ठीक है, दादी,” सुरभि दौड़कर नीचे खेलने चली गई। 

सोफिया टीवी चैनल को बदलने लगी। सुरभि, उसके बेटे कमलेश और उसकी बहू निम्मी की बेटी है। कमलेश एक सरकारी बैंक में काम करता है। बार-बार तबादले से परेशान होकर उसने कठुआ में ही अपनी बेटी का एडमिशन करवा दिया था। दोनोें पति-पत्नी कामकाजी लोग थे। और दोनों बैंक में काम करते थे। 

ट्रांस्फर जहाँ-जहाँ होता उसके अनुसार, वो कभी अंबाला दौड़ते तो कभी चंडीगढ। उनका बेटा सुनील और सुरभि यहाँ कठुआ में अपने दादी के साथ रहते हैं। सोफिया अब बेवा हो चुकी है। उनके पति देश के लिए दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। सोफिया इस साल सतानवें की हो गई थी। अब तो हिला भी नहीं जाता था, उससे। जहाँ बैठती। बैठी ही रह जाती। 

घर में मेड आती थी। सुबह शाम खाना बनाती। कपड़े धो देती। बच्चों को खाना खिला देती। बुढ़िया सोफिया के पास अब कोई काम नहीं था। अख़बार बच्चों से पढ़वाती। जासूसी उपन्यासों का उसको शुरू से शौक़ था। वो सुनील को जब-तब बिठा लेती। कभी अख़बार पढ़ने को कहती। कभी जासूसी कहानियों को पढ़कर सुनाने की इच्छा ज़ाहिर करती। ये सब काम तब होता। जब इतवार का दिन होता। या कोई सरकारी छुट्टी। या कोई पर्व-त्योहार। जब थोड़ा-बहुत पढ़कर बच्चे इधर-उधर भागने लगते। या खेलने जाने की ज़िद करने लगते। तो सोफिया का एक ही सहारा होता। न्यूज़ चैनल। 

ज़्यादातर वो न्यूज़ चैनल ही देखती थी। देश-दुनिया की ख़बरें। चैनल बदलते हुए, उसके हाथ यकायक रुक गए। आज फिर एक फ़ौजी की लाश तिरंगे में लिपटी हुई आई थी। उस फ़ौजी की उम्र पच्चीस एक साल रही होगी। सीमा पर आतंकवादियों से मुठभेड़ करते हुए, वो जवान शहीद हो गया था। गोलियों से सलामी दी जा रही थी उस शहीद जवान को। सारे लोग सावधान की मुद्रा में खड़े थे। सौरभ की विदाई भी ऐसे ही हुई थी। उसको भी ऐसे ही गोलियों की सलामी दी गई थी। गोलियों की आवाज़ के बीच सोफिया अपने अतीत के खोह में गुम होती चली गई। 

♦ ♦

“माफ़ कीजिए, मैं यहाँ थोड़ी देर बैठ जाऊँ। मैं आपको बहुत देर तक तकलीफ़ नहीं देने वाला हूँ। बस आगे कठुआ तक मुझे जाना है। अगले किसी स्टेशन पर उतरकर मैं जनरल डब्बे में चला जाऊँगा। अगर आपको एतराज़ ना हो तो।”

उस युवक ने बहुत सधे हुए शब्दों में कहा था। 

लेकिन, पता नहीं क्यों सोफिया को ग़ुस्सा आ गया। 

बिना सौरभ की तरफ़ देखे ही बोली, “आपको पता नहीं है कि ये रिज़र्वेशन वाला कंपार्टमेंट है। आपको इस कंपार्टमेंट में नहीं आना चाहिए था। अगर चढ़ना ही था, तो किसी जनरल कंपार्टमेंट में चढ़ जाते। हमलोग जनरल कंपार्टमेंट की परेशानियों से बचने के लिए ही तो रिज़र्वेशन करवाते हैं। ताकि आराम से यात्रा कर सकें।” सोफिया का दिमाग़ पहले ही ख़राब था। वो पहले से ही बहुत परेशान थी। धनबाद से उसकी ट्रेन थी। उसको जम्मू जाना था। घर पर उसके माँ-बाप अकेले थे। उधर जम्मू-कठुआ-सांभा-बाॅर्डर पर सीमा पर से लगातार सीज़ फ़ायर का उलंघ्घन हो रहा था। मोर्टार और गोलियों की बरसात हो रही थी। सोफिया अपने माँ-बाप को लेकर बहुत चिंतित थी। उसको ऐसा लग रहा था कि वो किसी तरह जल्दी-से-जल्दी जम्मू पहुँच जाए। 

वो दिल्ली में काम करती थी। धनबाद अपने किसी काम से आई थी। तब तक पाकिस्तान की तरफ़ से गोलाबारी शुरू हो गई थी। वो अभी अपना काम निपटा भी नहीं पाई थी। तब तक युद्व जैसे हालात शुरू हो गए थे। लोगों में एक तरह का डर व्याप्त हो गया था। चारों तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल बन गया था। सोफिया को अपने माँ-बाप की चिंता सताने लगी थी। पहले तो उसको टिकट ही नहीं मिल रहा था। किसी तरह इधर-उधर से जुगाड़ बिठाकर उसने टिकट का बंदोबस्त किया था। 

सोफिया अपनी सीट के नीचे सामान को व्यवस्थित कर चुकी थी। 

सौरभ ने एक बार फिर कोशिश की, “प्लीज केवल अगले स्टाॅप तक मुझे यहाँ बैठने दीजिए। मुझे मालूम है। आप बहुत नेकदिल हैं। आपका दिल मोम की तरह कोमल है। और ख़ूबसूरत लोग किसी का दिल नहीं दुखाते। दूसरों की हमेशा मदद ही करते हैं। पता नहीं क्यों आपको देखकर ऐसा लगता है।”

इस बार सोफिया को मुड़कर सौरभ को देखना बड़ा लाज़िमी हो गया। बोली, “अच्छा तो मैं ख़ूबसूरत और रहम दिल भी हूँ। ये तो मुझे पता ही नहीं था। बा-मेहरबानी आपके द्वारा आज मुझे पता चल गया, शुक्रिया। आप पीछे से भी लोगों का चेहरा देख लेते हैं, क्या? या आपने झूठ बोलने में पीएच.डी. कर रखी है।”

सौरभ झेंप गया। सचमुच में उसने सोफिया को सामने से कहाँ देखा था। वो तो हड़बड़ी में ट्रेन में चढ़ गया था। खिड़की से उसने बस सोफिया का आधा चेहरा ही देखा था। 

झेंपते हुए बोला, “नहीं मैंने खिड़की से आपको देख लिया था।”

“अच्छा जी आप कहीं इसलिए तो इस कंपार्टमेंट में नहीं चढ़ गए कि आपको एक ख़ूबसूरत लड़की दिख गई थी। और आप उसके पीछे-पीछे हो लिए। आपको कहीं जाना भी है, या बस यूँ ही ट्रेन में चढ़ गए। मैं ख़ूब जानती हूँ, आप जैसे लोगों को। लड़की देखी नहीं और लगे हाथ साफ़ करने।”

सौरभ बस इतना ही कह सका, “नहीं, ऐसा नहीं है। मुझे ड्यूटी ज्वाइन करनी है।” 

सोफिया को अब अफ़सोस हुआ। उसने सौरभ को बहुत भला-बुरा कह दिया था। गिल्टी फ़ील करने लगी, सोफिया। सौरभ से बोली, “बैठ जाइए।”

मन-ही-मन सोचा। बेकार में ही उसको इतना उल्टा-सीधा कह दिया। वैसा लड़का तो नहीं लग रहा है। 

“अरे, बैठ भी जाइए। खड़े-खड़े थक जाएँगे।” 

सौरभ बोल, “जी मैं ठीक हूँ। मुझे तो इतना खड़े रहने की आदत है।”

“फिर, भी बैठ जाइए। अगला स्टोपेज अभी घंटे भर बाद आएगा।”

सौरभ पर उसने सरसरी नज़र दौड़ाई। चौड़ी छाती, तंबाई रंग। क़द साढ़े छह फ़ुट। मज़बूत कँधे। गोरा चेहरा, उम्र कोई तीस-बत्तीस साल। जींस, टी-शर्ट में वो बेहद ख़ूबसूरत लग रहा था। हाथ में एक बैग, बाईंडिंग या बँधा हुआ एक कंबल। कुल इतना ही सामान था। 

“क्या करते हैं। वहाँ जम्मू में।”

“कुछ नहीं, बस घोड़ों के अस्तबल में काम करता हूँ। और यात्रियों को ऊपर पहाड़ पर ले जाते हूँ।”

“मुझे बना रहे हैं। आपकी क़द-काठी और आपकी पर्सनैलिटी देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि आप कोई अस्तबल या घोड़े के साईस हों। सच-सच बताइए कौन हैं, आप।” 

सौरभ का दिल इस बार तेज़ी से धड़का था। वो नहीं चाहता था कि वो अपनी असलियत सोफिया को बताए। उसको दरअसल कठुआ जाना था। सीमा पर हालात बहुत ख़राब चल रहे थे। वो अपनी बहन की शादी में यहाँ धनबाद आया था। शादी अभी दो दिन पहले ही निपटी थी। तब तक देश में युद्ध जैसे हालत बन गए थे। वो अपनी पहचान किसी को बताना नहीं चाहता था कि वो दरअसल एक फ़ौजी था। इस तरह से सबको अपनी असलियत बताना उसे ठीक नहीं लगता था। वो बहुत ही शांत स्वभाव का था। ज़्यादा बात करना उसके स्वभाव में नहीं था। 

बोला, “नहीं मैं घोड़ों की देखभाल ही करता हूँ। पहाड़ की चोटी पर यात्री सीधे नहीं चढ़ पाते। इसलिए घोड़ों की मदद से ऊपर पहाड़ पर जाते हैं। मैं, छोटा-मोटा काम करने वाला ही आदमी हूँ। पता नहीं आपको क्यों ऐसा लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूँ।” 

सौरभ की बातों में पता नहीं ऐसा क्या था कि ना चाहते हुए भी सोफिया को यक़ीन करना पड़ गया कि सौरभ जो कुछ कह रहा है। वो सच कह रहा है। शाम कब की हो चुकी थी। ट्रेन अपनी रफ़्तार में दौड़ती जा रही थी। 
अगला स्टेशन आने ही वाला था। उस स्टेशन से सोफिया का भाई मुरारी आकर ट्रेन में चढ़ने वाला था। उसको भी सोफिया के साथ जम्मू तक जाना था। सोफिया बहुत व्यग्र होकर पहलू बदल रही थी। दरअसल उसका भाई आई.टी.आई. की परीक्षा लिखकर सीधे स्टेशन आकर उसके साथ ही जम्मू तक जाने वाला था। सोफिया के साथ। सोफिया के पास वाली अपर की बर्थ दरअसल मुरारी के नाम से बुक थी। स्टेशन आया। लेकिन उसका भाई नहीं। 

सोफिया ने मुरारी को फोन लगाया, “हाँ, मुरारी तुम कहाँ हो? आ जाओ स्टेशन। गाड़ी स्टेशन पर खड़ी है।” 

“दीदी, मैं ट्रैफ़िक में फँस गया हूँ। मुझे स्टेशन आने में क़रीब एक-सवा घंटे से कम नहीं लगेगा।” 

“ट्रेन तो केवल दस मिनट ही रुकती है, इस स्टेशन पर। किसी तरह कोशिश करो, जल्दी पहुँचने की।” 

“दीदी नहीं हो पाएगा। आप चली जाओ। मैं एक-दो दिन बाद आ जाऊँगा।” 

“ठीक है, दीदी रखता हूँ। तुम ठीक से जाना। रात में सफ़र में सो मत जाना। ट्रेन में सामान बहुत चोरी होता है।” 

“वो सब तो ठीक है, लेकिन, मैं अकेले कैसे इतनी दूर तक का सफ़र करूँगी? मेरे साथ लगेज भी तो है।”

“अरे दीदी मैं कठुआ में अपने किसी दोस्त को फोन कर दूँगा। वो सामान उतरवा देगा। घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है, दीदी। सब ठीक होगा। अच्छा रखता हूँ। अब ट्रैफ़िक खुल गया है। अब स्टेशन ना जाकर सीधे घर चला जाऊँगा। चलो, ठीक है। हैप्पी जर्नी दीदी।” 

“ठीक है, रखो।”

♦ ♦

सौरभ और मुरारी की क़द-काठी और चेहरा मोहरा एक-सा बिल्कुल मिलता जुलता था। हाँ हाईट और रंग में मुरारी, सौरभ से थोड़ा उन्नसी था। कंपार्टमेंट में लोग अपने-अपने में मस्त थे। सोफिया ने वैसे तो दिन में बहुत सफ़र किया था। लेकिन, रात में इतना लंबा सफ़र उसने कभी नहीं किया था। 

वो सोचने लगी। जगह-जगह युद्ध जैसे हालात चल रहे हैं। युद्व की तैयारी में पूरी सेना लगी है। पता नहीं पड़ोसी दुश्मन देश कब हमला कर दे। किसी एक मर्द का उसके साथ होना ज़रूरी था। उसने मन में सोचा कि सौरभ को ही क्यों ना वो सफ़र में अपने साथ ले चले। उसको तो एक मर्द साथी मिल ही जाएगा। कम-से-कम कठुआ तक तो रहने को कहे। उसके बाद के स्टेशन पर मुरारी का दोस्त तो आ ही जाएगा। उसका सामान लेने। 

मुरारी से बात करने के बाद सोफिया के चेहरे पर परेशानी के बादल मँडराने लगे। एक ऊहा-पोह सोफिया के चेहरा पर दिखाई दे रहा था। 

सौरभ उतरने ही वाला था। तभी सोफिया को परेशान देखकर बोला, “आप कुछ परेशान सी लग रही हैं।”

“हाँ मेरा मुँह बोला भाई अभी स्टेशन पर आने ही वाला था। लेकिन‌ ट्रैफ़िक में उसे लेट हो गया। अब अकेले ही यात्रा करनी पड़ेगी।”

“ओह! ये तो बहुत बुरा हुआ। ख़ैर, मेरा वो स्टेशन आ गया है। जहाँ से मेरी टिकट बनी थी। अगले कंपार्टमेंट में मेरी कंफ़र्म सीट है। मैं चलता हूँ।” 

“ठीक है।” 

सौरभ बाईंडिंग वाले कपड़ों का बंडल और बैग उठाकर अगले कंपार्टमेंट में चलने को हुआ। वो बाहर निकलकर सोफिया के खिड़की के पास से गुज़रा। 

तभी सोफिया ने, सौरभ को टोका, “सुनिए, आप चाहें तो मेरे भाई की सीट पर यात्रा कर सकते हैं। चूँकि मैं अकेली हूँ। और रात में यात्रा कर रही हूँ। इसलिए किसी विश्वासी आदमी का साथ में होना बेहद ज़रूरी है। क्या आप मेरे साथ इसी कंपार्टमेंट में मेरे भाई की सीट पर यात्रा कर सकते हैं। अगर आपको असुविधा ना हो तो।”

“लेकिन, टी.टी. आएगा तब?” सौरभ ने संशय ज़ाहिर किया। 

“अरे, टी.टी. से मैं बात कर लूँगी। आप बस अन्दर आ जाइए। ट्रेन छूटने ही वाली है।”

♦ ♦

धीरे-धीरे ट्रेन ने गति पकड़ ली। अब ट्रेन की रफ़्तार के अलावा कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था। 

उसने चाय के लिए सौरभ को पूछा, “आप चाय लेंगे।”

“आप किसी ऐरे-ग़ैरे को चाय पिलाएँगी?” सौरभ ने चुटकी ली। 

“अरे मैंने तो ऐसे ही कह दिया था। आप उस बात को अब भी पकड़े हुए हैं। आदमी को पहचानने में कभी-कभी ग़लती हो जाती है।” 

“यानी कि आपके हिसाब से मैं ग़लत आदमी हूँ।”

“ऐसा मैं उस समय तक ही सोचती थी। लेकिन अब नहीं। आदमी-आदमी में अंतर होता है। इतनी तो परख है, मुझमें।”

“तो क्या परखा आपने। कैसा आदमी हूँ, मैं?” 

“आप भले आदमी हैं।”

“वो कैसे?” 

“आप भले आदमी ना होते, तो में आपको अपने साथ सफ़र करने की इजाज़त नहीं देती।”

“अच्छा तो ये बात है।” 

“हाँ, और क्या?” 

“ये तो आपकी ज़रूरत है कि आपके साथ कोई मर्द सफ़र करने के लिए नहीं है। नहीं तो आप मुझे अपने साथ इस कंपार्टमेंट में रुकने को न कहतीं। ख़ैर, ऐसा होना लाज़िमी भी है। सुरक्षा कारणों से,” सौरभ ने जैसे सफ़ाई देनी चाही। 

सोफिया ने चाय की प्याली बनाई। और सौरभ की तरफ़ बढ़ा दी। इस बार सौरभ के हाथ से सोफिया का हाथ छू गया। ठंड के मौसम में सोफिया का हाथ बिल्कुल ठंडा हो गया था। सौरभ ने चाय की प्याली थाम ली। और धीरे-धीरे चाय पीने लगा। 

अब कंपार्टमेंट में पटरियों के खड़खड़ाने की आवाज़ के अलावा और कोई शोर नहीं था। सौरभ ने कितनी ही बार ट्रेन से सफ़र किया था। लेकिन ये सफ़र उसके लिए एक अनोखा सफ़र था। बहुत सन्नाटा था, उस कंपार्टमेंट में। ये सन्नाटा बहुत प्यारा लग रहा था, सौरभ को। ट्यूबलाइट की दुधिया रोशनी में उसने सोफिया को पहली बार देखा। उसके चेहरे की ख़ूबसूरती। पूर्णमासी की चाँदनी खिड़की से उतर रही थी। कंपार्टमेंट में चाँद की रोशनी बिखर गई थी। 

सौरभ ने ग़ौर से सोफिया के चेहरे को निहारा। गोरा रँग, हरी आँखें। भरी-भरी छातियाँ, बड़े-बड़े नितंब। जींस-टाॅप में वो बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी। 

सोफिया ने पूछा, “ऐसे क्या देख रहे हैं?” 

“आपका, ख़ूबसूरत चेहरा।”

“धत्, मैं कहाँ ख़ूबसूरत हूँ। मेरी तो उम्र भी अब ढलने लगी है। मेरी उम्र के लोगों के तो बड़े-बड़े बच्चे हैं।”

“नहीं, मैं सच कह रहा हूँ। आप-बहुत ख़ूबसूरत हैं। आपके हर हिस्से को क़ुदरत ने बहुत प्यार से बनाया है।”

“इसका बखान आप पहले ही कंपार्टमेंट में घुसते ही कर चुके हैं।”

सौरभ को लगा कि वो कुछ ज़्यादा ही बोल गया है। वो अब चुप हो गया था। अब वो खिड़की से बाहर ताक रहा था। दुधिया रोशनी में दूर-दूर तक फैले दैत्याकार पहाड़। बिल्कुल दैत्यों की तरह ही दिख रहे थे। लंबे-लंबे पेड़, खेत-खलिहान। कहीं शादी हो रही है। बहुभात के लिए लगाया गया पंडाल। उससे झरती ट्यूबलाइट की हरी-सफ़ेद, रोशनी। अटखेलियाँ करते बादल। कहीं छुपते हुए सितारे। कहीं बादल-ही बादल। कभी चाँद दिखता। कभी चाँद ग़ायब हो जाता। जब ट्रेन किसी सुरँग से होकर गुज़रती तो ट्रेन के बाहर सब कुछ अँधेरे में डूब जाता। ट्रेन सरपट भाग रही थी। आंँखों से एक-के-बाद एक स्टेशन भागते जा रहे थे। ट्रेन छोटे स्टेशनों पर नहीं रुकती। वहाँ प्लेटफाॅर्म पर उँघते लोग हैं। चना बेचने वाले, चाय बेचने वाले। स्टेशन पर ज़्यादातर लोग सो गए हैं। या यूँ कहा जाए की स्टेशन ही सो गया है। 

“उधर क्या देख रहे हो, खिड़की के बाहर। अभी मेरी ख़ूबसूरती की बात कर रहे थे। और अभी बाहर क्या निहारने लगे।”

“कुछ नहीं, क़ुदरत की बनाई हुई चीज़ें ही देख रहा था। नदी, तालाब, पहाड़, अँधेरा, चाँदनी उसकी रोशनी। पुल, सुरँग और नदी।” 

“क्या ये मुझसे ख़ूबसूरत हैं?”

“नहीं, दोनोें क़ुदरत की बनाई हुई चीज़ें है। दोनों ही ख़ूबसूरत हैं।” 

“फिर, भी मेरे और इन चीज़ों में दोनोें में से कौन ज़्यादा सुंदर है।”

सौरभ केवल हँसकर रह गया। 

“शादी हो गई तुम्हारी?” सोफिया ने सौरभ के चेहरे को निहारते हुए कहा। 

“नहीं,” सौरभ तैरते हुए दृश्यों में कहीं खोता हुआ, बोला। 

“शादी लायक़ तो तुम्हारी उम्र हो ही गई है। शादी अब तक क्यों नहीं की?” 

“ये सवाल तो मैं तुमसे भी पूछ सकता हूँ।”

“ज़िम्मेदारियाँ और क्या कारण हो सकता है। मैं अपने माँ-बाप की अकेली संतान हूँ। मेरे माँ-बाप बूढ़े हैं। उनकी उम्र हो गई है। आख़िर किनके भरोसे उनको छोडूँ। मेरे चले जाने के बाद उनको कौन देखेगा?

“लेकिन, तुमने शादी क्यों नहीं की? तुम्हारी भी तो शादी लायक़ उम्र हो गई है।”

“वही ज़िम्मेवारी की बात आ जाती है। तुम्हारी वाली हालत। घर में बहन थी। उसकी शादी करनी थी। उसके बाद ही तो अपनी शादी के बारे में सोचता।”

दोनोें अपनी हालत पर मुस्कुराने लगे। 

♦ ♦

“अरे मैंने अपना फोन कहाँ रख दिया,” सौरभ को अचानक अपना फोन याद आया। वो अपने दोनों जेब, ऊपर का पैकेट खँगालने लगा। लेकिन फोन नदारद था। 

“कहाँ रखा था? यहीं मेरे जेब में ही तो था,” सौरभ अब अपनी जगह को जहाँ वो बैठा था। उसको देखने लगा, लेकिन फोन नहीं मिला। 

“ठीक से देखो। वहीं होगा। आख़िर कहाँ चला जाएगा? इतनी जल्दी।”

“सुनो, तुम्हारे पास तो, मोबाइल है, ना। अपने मोबाइल से ज़रा मेरे नंबर पर रिंग कर दो। हो सकता है, यहीं कहीं गिरा हो। मिल जाए।” 

सोफिया ने नंबर पूछकर मिलाया। और मोबाइल की घंटी पर एक प्यारा सा रिंगटोन बजने लगा—सुनो ना संगेमरमर . . . कुछ भी नहीं है . . . का रिंगटोन कंपार्टमेंट में बज उठा। 

मोबाइल, सौरभ की सीट के बग़ल में ही गिरा था। रिंग मारने पर आसानी से मिल गया। 

“रिंगटोन तो तुमने बहुत अच्छी लगा रखी है। सुनो ना संगेमरमर।”

“हाँ मुझे ये गाना बेहद पसंद है।”

“तुमने मेरी काॅलर टयून सुनी है।”

“नहीं।”

“फिर, से मेरा मोबाइल नंबर डायल करो।”

सौरभ ने स्पीकर ऑन कर दिया—कौन तुम्हें यूँ प्यार करेगा। जैसे मैं यूँ करती हूँ—बज उठा।

सोफिया का चेहरा ख़ुशी से चमकने लगी, “दोनों मेरे फ़ेवरेट साँग हैं।” 

“तुम बहुत स्मार्ट हो।”

“वो कैसे?” 

“तुमने बहाना बनाकर मेरा मोबाइल नंबर ले लिया।” 

“नहीं ऐसा कोई मेरा इंटेंशन नहीं था। तुम कहो तो डिलीट कर दूँ।” 

“नहीं, लेकिन तुम्हें पता है। लड़कियाँ अपना नंबर किसको देती हैं?” 

“किसको?” 

“समवन हू इज़ स्पेशल,” सोफिया ने कहा। 

“सो . . .” सौरभ मुस्कुराया। 

“सो व्हाट?” सोफिया ने झूठा-सा टाला।

“आई एम स्पेशल फ़ोर यू?” सौरभ की आँखों में शरारत नाच रही थी।

“इट्स काॅम्पलिकेटेड,” सोफिया ने गंभीर होने की चेष्टा की। 

“अब ज़्यादा भाव मत खाओ। चलोगी मेरे साथ डेट पर?” सौरभ ने सीधा प्रश्न पूछा। 

“लेकिन, तुम मेरे से उम्र में बहुत छोटे हो। कहाँ तुम तीस के और मैं कहाँ चालीस की! एक दशक का अंतर है। हमारी और तुम्हारी उम्र में,” सोफिया बोली।

“एज इज़ जस्ट ए नंबर। और प्यार में ऊँच नीच, जाति-पाति, अमीर–ग़रीब कोई मायने नहीं रखता। बस दिल मिलना चाहिए,” सौरभ भावुक हो रहा था।

“दस, साल बीतने के बाद तुम ही किसी नई-नवेली को खोजने लगोगे। तब मैं तुम्हारे लिए बूढ़ी हो जाऊँगी,” सोफिया अभी भी उम्र पर अटकी थी। 

“डोंट बी फूल, प्रैक्टिकल हो जाओ। ऐसा नहीं होगा। मैं तुम्हें रूह की गहराइयों से चाहता हूँ। तुम्हारा प्यारा मेरे लिए क्षणिक नहीं है। तुम मेरे लिए अप्रतिम हो,” सौरभ ने कहा। 

“सच में हूँ?” सोफिया विस्मित थी।

“अच्छा इस नंबर का क्या करना है? हो सकता है, हम फिर कभी मिले ही ना। ये हमारी आख़िरी मुलाक़ात हो।” सौरभ बोला।

ट्रेन रफ़्तार से कुहासे को चीरती हुई। आगे बढ़ रही थी। अगले दो-दिन ट्रेन में ख़ुशी-ख़ुशी बीते। ट्रेन बहुत लेट थी। तीसरे दिन आख़िर सुबह दस बजे ट्रेन कठुआ स्टेशन पर पहुँची। मुरारी का दोस्त मयंक सोफिया को लेने आया था। आख़िरी बार सौरभ और सोफिया मिल रहे थे। सौरभ ने सोफिया को इशारे से कहा फोन करना। गाड़ी जम्मू के लिए आगे बढ़ गई। 

♦ ♦

घर पहुँचने के बाद सोफिया का दिल किसी काम में नहीं लगता था। उसको बार-बार सौरभ की याद आती थी। एक तय समय तक लड़के वाले सोफिया को देखने और रिश्ते की बात करने के लिए आते थे। लेकिन जब सोफिया ने ज़िम्मेदारियों के बोझ तले ख़ुद को दबाती चली गई। तो उसको लगा की अब उसकी मौत हो गई है। 

और उसने शादी के इरादे को ही एक सिरे से ख़ारिज कर दिया था। और अधिक उम्र हो जाने के बाद अब कोई रिश्ता भी उसके लिए नहीं आने लगा था। जो चूल्हा ठंडा हो गया था। और रसोई का काम ख़त्म करने के बाद जैसे गृहस्वामिणी भँसार घर से चूल्हा निकालकर बाहर रख देती है। और अब उसमें कुछ भी नहीं पकने लायक़ है। क्योंकि उसमें तो अब आग ही नहीं है। ऐसा सोचना गृहस्वामिणी की दरअसल भारी भूल थी। दरअसल उस राख में नीचे कहीं एक चिंगारी दबी हुई होती है। जिसकी भनक गृहस्वामिणी को भी नहीं होती। कुछ-कुछ वैसी ही हालत सोफिया के माता-पिता और ख़ुद सोफिया की भी थी। जिस मर्ज़ का इलाज वो बाहर ढूँढ़ रही थी। उसका इलाज तो ख़ुद उसके पास था। 

लेकिन सौरभ से मिलकर वो आग अब दावानाल बनकर पूरे घर को जलाने की फ़िराक़ में थी। घर पहुँचकर सोफिया ने सौरभ को फोन लगाया। 

और शिकायत करती हुई बोली, “आज चौबीस घंटे बीत गए। तुम्हें तो मेरी याद भी नहीं आती होगी।” 

“नहीं ऐसा नहीं है, मेरी जान। तुम्हें तो मैं एक क्षण भी भूल नहीं सका। लेकिन, केवल बात करने से काम नहीं चलता। काम भी तो करना पड़ता है। अगर घोड़े की सेवा टहल ना करूँ। अगर उनको टहलाने ना ले जाऊँ। अगर गाइड बनकर लोगों को घाटी की बात ना समझाऊँ, तो मालिक मेरी जान खा जाएगा। टूरिस्टों के साथ ही मेरा समय ज़्यादातर बीतता है। टूरिस्ट हमारे लिए भगवान हैं। पेट के लिए सब करना पड़ता है,” सौरभ बोला। 

“तुम यहीं आ जाओ। चार घोड़े तुम्हारे लिए ख़रीद देती हूँ। तुम उनकी सेवा करना और मुझे उन घोड़ों पर घूमाना। जो मज़दूरी तुम वहाँ पाते हो। यहाँ आकर मुझसे ले लेना।” 

सौरभ मुस्कुराया, “सो तो ठीक है। लेकिन मेरी नौकरी का सवाल है। नहीं तो मैं ज़रूर आता। एक बार नौकरी चली गई, तो फिर ना मिलेगी। और तुम्हें तो पता ही है कि नौकरी मिलना आज के समय में कितना मुश्किल है।”

सोफिया ने फिर पूछा, “और तुमने मुझे डेट पर ले जाने को कहा था। उसका क्या हुआ?” 

“चलेंगे डेट पर भी चलेंगे। अभी गर्मी का मौसम है। अभी इधर सीज़न चल रहा है। दो-पैसे कमाने का दिन है। इसलिए मालिक से छुट्टी की बात भी नहीं कर सकता। जैसे ही जुलाई-अगस्त के बाद अक्तूबर-नवंबर आता है। डल-लेक जम जाती है और टूरिस्टों का आना इधर कम हो जाता है। मैं, आता हूँ तुमसे मिलने। लेकिन अभी तुम थोड़ा समय दो,” सौरभ ने समझाया। 

“तुम्हें याद है, तुमने पूछा था। समवन हू इज़ स्पेशल!”सोफिया बोली। 

“हाँ,” सौरभ जानता था परन्तु सोफिया के ओंठों से सुनना चाहता था। 

सोफिया धीमे से बोली, “वो, तुम हो सौरभ। जिसको मैं जी जान से चाहती और प्रेम करती हूँ। तुमसे मिलना चाहती हूँ। तुमको छूना चाहती हूँ। तुममें समाना चाहती हूँ। ओह, सौरभ आई रियली लव यू . . . डोंट फोरगेट मी।”

“सोफिया का प्रेम पवित्र प्रेम है। जिसमें केवल मिलना है। प्रेम की अनुभूति ही प्रेम है। जो चीज़ दूर है। उसको लेकर एक उत्सुकता आदमी के मन में रहती है। मिलने के बाद सारी उत्सुकता जैसे शांत पड़ जाती है। मैं, तुमसे सच्चा प्रेम करता हूँ। तुमको तो भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता।”

“ओह, सौरभ तुम कितने अच्छे हो!”

♦ ♦

किसी तरह दो महीने बीते। बर्फ़ पिघलने के बाद पाकिस्तानी सेना ने देश में घुसपैठ कर दी थी। क्राॅस फ़ायरिंग करके पहलगाम, कठुआ और करगिल से भारी मात्रा में आतंकवादियों को श्रीनगर, अखनूर, बारामूला से देश में आई.एस.आई. घुसपैठ करवा रही थी। इन इलाक़ों में निर्दोष नागरिक मारे जा रहे थे। अब युद्ध को किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता था। एक दिन सौरभ का फोन आया। उस समय सोफिया बाज़ार में सामान ख़रीदने गई थी। घर आकर देखा तो ढ़ेर सारे मिस्ड काॅल थे। 

उसने काॅल मिलाया, “हाँ मेरा चरवाहा, मेरी जान ने कैसे याद किया, मुझे। बताओ?”

सौरभ बोला, “तुम्हारा चरवाहा ज़रूरी नहीं है कि तुम्हें किसी काम से ही याद करे। तुम्हारे ऊपर इतना अधिकार तो है ही मेरा कि तुम्हें ऐसे भी याद कर सकता है।” 

सोफिया ने कहा, “सो तो है। फिर भी, कैसे याद किया मेरी जान ने?”

“सच में मैं तुम्हें देखे बग़ैर अब नहीं रह सकता। बहुत दिन हो गए तुम्हें देखे। तुम्हारी बहुत याद आती है। तुम्हारी आवाज़ सुनते ही मेरे शरीर में अजीब सी हरकत होने लगती है। शरीर का रोयाँ-रोयाँ खड़ा हो जाता है।” 

सोफिया ने तुरंत कहा, “आ जाओ ना फिर मुझसे मिलने। तुमको किसने रोक रखा है।” 

सौरभ ने अपनी मजबूरी बताई, “आ जाता, लेकिन मेरा काम मुझे रोक लेता है। तुम तो जानती हो। मेरे पीछे मेरा पूरा परिवार है। उनकी ज़रूरतें हैं। मैं, बहुत कर्मठ हूँ। तुम समझ रही हो।”

इस बार सोफिया का धैर्य चूक गया। बोली, “हाँ, तुमको तो कर्मठ होना है। तुम्हारा तो परिवार है। उनकी ज़िम्मेदारियाँ हैं। और, मैं तो तुम्हारी कुछ लगती ही नहीं हूँ, ना।”

“नहीं ऐसा नहीं है सोफिया। तुम्हारे बिना मैं शून्य हूँ। तुम मेरी जान हो, जान!”

सोफिया ने ग़ुस्सा जताया, “सब कहने की बातें हैं।”

सौरभ गम्भीर था, “सुनो सोफिया मैं तुमसे एक बेहद ज़रूरी बात करना चाहता हूँ। मेरा काम अभी आऊट ऑफ़ स्टेट हो गया है। ज़्यादातर मैं बाहर-ही-बाहर रहूँगा। उतनी ऊँचाई पर वहाँ कोई नेटवर्क भी नहीं आता। इसलिए फोन से बहुत सम्भव है बात ना हो पाए। इतना कुछ होने के बाद भी मैं कोशिश करूँगा तुमसे बात करने की। जब भी मौक़ा मिलेगा। तुमको मैं फोन कर लूँगा। फोन ना कर सका, तो ख़त मैं तुम्हें हर हफ़्ते लिखा करूँगा। अपना ख़्याल रखना। ख़त का भी इंतज़ार मत करना। देश में अभी इमर्जेंसी जैसे हालात हैं। बारामूला में मेरा पूरा परिवार रहता है। मेरा पूरा परिवार दादा-दादी, चाचा-चाची सब लोग रहते हैं। 

“इधर जम्मू में हालात बिगड़े तो मेरा एक और मकान धनबाद में है। मेरे दादा-दादी, और अपने माँ-पिताजी को लेकर वहीं चली जाना। रुपये-पैसों की बिल्कुल चिंता मत करना। एक ए.टी.एम. कार्ड तुम्हें कूरियर से भेज रहा हूँ। पिन की जानकारी वहाटसैप कर दी है। ये सब मोटी-मोटी बातें हैं। जिसकी तुमको आने वाले समय में ज़रूरत पड़ेगी।”

“तुम जा कहाँ रहे हो। मुझे बताओगे भी, या तुम मुझे इसी तरह अपना आदेश सुनाते रहोगे फोन पर।”

“ये जानकर तुम क्या करोगी कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। सेफ़्टी रीज़न से तुमको ये बातें बताई है। बस तुम इन बातों को मानना। और एक बात सेना मुख्यालय के पास ही एक डाकखाना है। जिसमें एक डाक-बाबू नील चाचा रहते हैं। कोई ख़ास जानकारी चाहिए हो, तो उनसे ले लेना।”

“फिर, भी तुम कहाँ जा रहे हो? मुझे कुछ तो पता होना चाहिए।”

सौरभ बोला, “सोफिया मुझे भी कुछ पता नहीं है कि मुझे कहाँ भेजा जा रहा है। बस मुझे भेजा रहा है। और मैं जा रहा हूँ। और मुझे जाना भी चाहिए। आख़िर देश में हालत बेहद ख़राब है। इमर्जेंसी वाली हालत है। लोगों की छुट्टियाँ रद्द हो रहीं हैं। सब लोग काम पर लौट रहें हैं। होमगार्ड के सिपाही, पुलिस, सी.आई.एस. एफ़., सी.आर.पी.एफ़., एस.एस.बी., आर्मी, एयर फ़ोर्स। सब लोग। बी.एस.एफ़. तो मोर्चे पर पहले से ही डटी हुई है।”

सोफिया चिंतित हो गई, “लेकिन, इनका तुमसे क्या सम्बन्ध है? तुम तो आम सिविलयन हो। आम साविलियन को युद्ध से भला क्या मतलब है। और ख़ासकर एक साईस को। एक कोचवान को।”

“मैं, कोचवान नहीं हूँ। इस देश का एक नागरिक हूँ। और मुझे लगता है कि देश को युद्ध जैसी इमर्जेंसी से सामना करना पड़े, तो हर आदमी को युद्ध लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। तुमने सुनी नहीं है, वो कविता—

‘मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक। 
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ पर जाएँ वीर अनेक।’

सोफिया ने कहा, ” हाँ, पढ़ी है, ये कविता, कोर्स में। माखनलाल चतुर्वेदी की लिखी हुई है। बहुत पहले पढ़ी थी।”

“बस वही हालत या इमर्जेंसी जैसी अभी हालत है इस देश में। इसलिए इस कविता का पाठ आज के इस समय में लोगों को ख़ूब पढ़नी चाहिए। ताकि इस धरती के लिए हमें हमारे कर्त्तव्य याद रहें। हम ज़्यादा स्वार्थी ना बन जाएँ,” सौरभ के स्वर में जोश भरा था। 

अब सोफिया का माथा ठनका था। सौरभ का डील-डौल और साढ़े छ:फीट का शरीर देखकर उसको पहले ही इस बात का अंदेशा था कि वो कोई फ़ौज में काम करने वाला ही आदमी है। वो कोई घोड़ों का साईस या कोई गाइड नहीं है, बल्कि वो सेना में ही काम करता है। 

सोफिया ने गम्भीरता से पूछा, “अच्छा तुम ठीक-ठीक बताओ। तुम कौन हो? तुम सेना में काम करते हो? गुप्तचर विभाग में हो? या कौन हो? तुमको मैं जितना समझने की कोशिश करती जा रही हूँ, तुम उतना ही उलझते जा रहे हो। तुम मेरे लिए रहस्य की तरह बनते जा रहे हो। प्लीज़ मुझे सही जानकारी दो। तुम फूल की बात करके, मुझे दस महीनें से फ़ूल ही तो बना रहे हो। तुम सच में चरवाहा हो, घोड़े की देखभाल करने वाले? या कोई गाइड? मेरा दिमाग़ तुमसे बातें करते हुए स्थिर नहीं रह पा रहा है।”

सौरभ टाल गया, “मेरा एक फोन आ रहा है। रुको मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ।” 

सौरभ का फोन कट गया था, लेकिन अवचेतन में कहीं गहरे धँसा था, सौरभ और उसकी बातें। कुछ भी साफ़-साफ़ नहीं बताता सौरभ। जितना वो सौरभ को समझना चाहती थी, उतना ही कहीं गहरे उलझती जाती थी। उसको ट्रेन में ही चेत जाना चाहिए था। ऐसे लोगों पर जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए था। 

तभी मोबाइल पर टिंग से एक मैसेज गिरा। उसने ग़ौर से देखा। वो ए.टी.एम. कार्ड का पिन था। ज़ीरो वन, सिक्स नाईन। 

क़रीब पंद्रह दिनोंं के बाद उसको डाक से ए.टी.एम. कार्ड भी मिल गया। 

उसमें एक लिफ़ाफ़ा था। जिसमें एक बैंक खाता था। एच.डी.बी,सी. का वो कोई बैंक था। जिस बैंक का वो एकाउंट था। उसकी शाखा सोफिया के घर के बहुत पास में ही थी। यानी सौरभ यहाँ आया था। और उसने मेरी लोकेशन भी देखी थी। अजीब बात है। सौरभ को मेरे घर और मेरे घर के पास ही ये बैंक है। इसके बारे में पूरी जानकारी थी, सौरभ को। इसका मतलब उसे अच्छे से पता था मेरे घर का पता। मेरे घर तक आकर वो मुझसे मिले बग़ैर चला गया। और कहता है कि मुझसे बहुत प्यार करता है। ख़ाक प्यार करता है। ज़रूर कोई मायावी क़िस्म का आदमी है, सौरभ। लेकिन, लोक-लाज का भी तो डर है, सौरभ को। शादी से पहले अगर कोई लड़का मिलने आता है। तो लड़की को लोग ग़लत नज़रों से देखते हैं। लेकिन, केवल मायावी कह देने भर से काम नहीं चलेगा। वो ज़िम्मेदार भी तो है। वो भी शादी से पहले। लोग शादी के बाद ज़िम्मेदारी नहीं स्वीकारते। ये तो शादी से पहले ही ज़िम्मेदारी स्वीकार रहा है। 

♦ ♦

पड़ोसी देश के लिए अब नाक बचाने की बात आ गई थी। हमारी फ़ौज ने पड़ोसी मुल्क को नाकों चने चबवा दिए थे। लेकिन हमारे तरफ़ भी कैजुअल्टी हुई थी। चीन और नेपाल भी इस ख़राब परिस्थिति में पाकिस्तान का साथ दे रहे थे। पूरे देश में ब्लैक आउट चल रहा था। हर-जगह-अँधेरा। हर जगह डर का माहौल। दिन में ही सोता पड़ जाता था। सब जगह लोग सुरक्षित ठिकानों में छुप गए थे। देश के किसी भी हिस्से से कभी भी भयानक ख़बरें आ जाती थी। सड़कों पर लोगों के कहीं हाथ के टुकड़े तो कहीं पैर के टुकड़े जहाँ-तहाँ दिखाई देते थे। दिन-रात अस्पतालों में भीड़ लगी रहती थी। 

मिलिट्री अस्पतालों में कैजुअल्टी ज़्यादा हुई थी। वहाँ एम्बुलेंस भर-भरकर लोग आते। लोगों का हुजूम अस्पतालों के बाहर अपनों की शनाख़्त कर रहा था। सायरन बजता और लोग बंकरों की तरफ़ भाग जाते। अरुणाचल प्रदेश और सियाचीन से डरावनी और भयावह ख़बरें आ रही थीं। मित्र देश रूस और इज़राइल हमारे देश के साथ खड़े थे। रूस ने हमारे लिए दो दर्जन लड़ाकू बम वर्षक जहाज़ भेजे थे। इज़राइल देश में प्रचुर मात्रा में हमें हथियार उपलब्ध करवा रहा था। लेकिन दोनों तरफ़ कैजुअल्टी बढ़ रही थी। 

सोफिया का दिल हलकान हो रहा था। वो बार-बार सौरभ के बारे में ही सोच रही थी। वो सोच रही थी कि इस वीभत्स युद्ध में सौरभ की क्या हालत होगी? वो क्या कर रहा होगा। वो ठीक तो होगा, या नहीं। महीना भर अब हो चुका था, उससे बात किए। अब तक उसका कोई फोन नहीं आया था। फोन आता भी तो कैसे। ज़्यादातर टाॅवर पहले ही बमबारी में नष्ट हो चुके थे। कुछ थोड़े बहुत टॉवर जो थे। सुरक्षा कारणों से वहाँ इंटरनेट बंद कर दिया गया था। अब ले-देकर सेना मुख्यालय और उसके डाकघर का सहारा था। सेना मुख्यालय और डाकघर उसके घर के क़रीब था। लेकिन, सोफिया वहाँ सुरक्षा कारणों से नहीं जाना चाहती थी। 

एक दिन अलस्सुबह ही वो निकल पड़ी। सेना का मुख्यालय और डाकघर ऊँचाई पर थे। चलते-चलते उसकी साँसें फूलने लगी। पूछती-पाछती वो किसी तरह काऊँटर पर पहुँची। 

उसने काऊँटर पर जाकर जानकारी माँगी। कोई नील चाचा थे। सोफिया ने पूछा, “आप में से नील चाचा कौन हैं?” 

एक दुबला पतला आदमी वहाँ डाक छाँट रहा था। उसने पतली ऐनक से खिड़की की तरफ़ देखा, “कौन?” 

सोफिया को लगा जैसे उसका आना सफल रहा। बोली, “आप ही नील चाचा हेड पोस्टमास्टर हैं।”

बूढ़े ने गर्दन हिलायी, “डाकिया परसों डाक बाँटते समय मोर्टार के छर्रे से ज़ख़्मी हो गया है। अभी वो अस्पताल में है। उसकी जगह मैं उसका काम कर रहा हूँ।”

“कोई बात नहीं अगर आपको कोई तकलीफ़ ना हो, तो आप मेरी डाक देखेंगे। मेरी कोई चिट्ठी या कोई ख़त आया हो तो? आप समझ रहे हैं। मैं जो कह रही हूँ।”

नील चाचा, “तुम्हारा नाम क्या है, बेटी?”

“मेरा नाम सोफिया है, नील चाचा।”

सोफिया नाम सुनते ही नील चाचा के चेहरे पर एक साथ कई भाव आए और चले गए। उनका चेहरे ज़र्द पीला पड़ गया था। फिर ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए बोले, “अच्छा, तो तुम सौरभ की मँगेतर हो?”

“हाँ।”

“नहीं बेटी तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं आई है। सौरभ तुम्हारे बारे में मुझसे अक्सर बातें करता था।”

“आप, सौरभ को जानते हैं, नील चाचा।”

“अरे सौरभ को कौन नहीं जानता१ वो बहुत ही प्यारा लड़का है।”

“वैसे क्या करते हैं, वो सेना में?” 

इस बार नील चाचा ने बहुत ज़ोर से सोफिया को घूरा। कुछ देर तक सोफिया के चेहरे को देख़ते रहे। 
फिर बोले, “तुम सोफिया ही हो ना। सौरभ की मँगेतर।”

“हाँ,” सोफिया ने नील चाचा को बहुत हैरत से देखा। 

“हाँ, तो तुम्हें सचमुच नहीं पता कि सौरभ सेना का जवान है। वो इंडियन आर्मी में है।”

“देखो, उसने बताया था, मुझे, लेकिन मैं भूल गई।” 

सोफिया को झिझक हुई। उसे अपने व्यवहार पर कोफ़्त हो रही थी। नाहक़ ही उसने नील चाचा से सौरभ के बारे में पूछ लिया। आख़िर क्या सोचते होंगे नील चाचा? 

“मेरी कोई डाक आए तो बताइएगा।”

“ज़रूर।”

♦ ♦

सोफिया घर पहुँची तो वो सौरभ के बारे में ही सोचती रही। सेना में अफ़सर। और अपने आपको घोड़े की सेवा करने वाला एक मामूली सेवक बता रहा था। इंडियन आर्मी में अफ़सर, और अपने आपको मामूली गाइड बता रहा था। आने दो इस बार फिर ख़बर लेती हूँ। महीनों बात नहीं करूँगी। समझता क्या है, अपने आपको। बहुत स्मार्ट बनते हो, बच्चू। अब ख़त लिखेंगे तो जवाब भी नहीं दूँगी। इस बार मज़ा चखा के दम लूँगी। 

जब हम किसी से मिल नहीं पाते। और, उससे प्रेम भी करते हैं। तो हालत बहुत कठिन हो जाती है। प्रेम में पड़ी सोफिया का हाल भी कुछ ऐसा ही था। वो सौरभ से मिल तो न सकती थी। लेकिन मिलने की जो भी सम्भावना होती उस पर विचार करती। उससे उसकी ग़ैर-मौजूदगी में उससे लड़ती और झगड़ती। और अंततः ख़ुद अपनी बेबसी पर रोने भी लगती। उसका तो जो था। सौरभ ही था। और वो तो बस ये चाहती थी कि किसी तरह उससे बात हो जाती। कहीं से उसका ख़त आ जाता। कहीं से उसकी सलामती की ख़बर मिलती। या कम-से-कम वो सौरभ को एक नज़र भर देख लेती। इतने भर से ही उसको संतोष हो जाता। लेकिन इस युद्ध ने सब मटियामेट कर दिया था। जो युद्ध में गए। वो वापस नहीं लौटे। लेकिन, सोफिया का दिल कहता था। उसका सौरभ एक दिन ज़रूर लौटेगा। उसका सौरभ उसको ज़रूर मिलेगा। सोफिया अपने सौरभ के प्रेम में दिनों दिन ग़लती जा रही थी। उसका खिला-खिला रहने वाला चेहरा मुरझाने लगा था। 

वो जाड़े की एक दोपहर थी। जिस दिन वो ख़त उसको डाकिया थमा गया था। ख़त के मज़मून देखकर वो वहीं धम्म से आँगन में पड़ी कुर्सी पर गिर गई। पुरानी टूटी हुई कुर्सी पर से संतुलन गड़बड़ाया, और अचेत होकर गिरी तो टाईल्स से चोट लग गई। दो महीने अस्पताल में बिताया। ठीक हुई तो घर लौटी। सौरभ दुश्मनों से बहादुरी से लड़ता हुआ सियाचीन में शहीद हो गया था। 

♦ ♦

सोफिया की उम्र भी हो रही थी। माँ-पिताजी के बहुत ज़ोर देने पर वो पहले तो तीन चार साल तक शादी के लिए तैयार ही नहीं हुई। लेकिन माँ-बाप की ज़िद के आगे उसकी एक ना चली। और उसने सेना के एक अफ़सर मेजर राजीव से शादी कर ली। अभी चार साल पहले मेजर साहब भी दिवंगत हुए थे। 

“दादी आप टीवी देख रही हैं, या आप आराम करेंगी।” सुनील ने टोका तो सोफिया की तंद्रा टूटी। घड़ी शाम के पाँच बजा रही थी। 
सुनील ने ग़लती से चैनल बदल दिया। टीवी पर एक धुन तैर रही थी।

”कौन तुम्हें यूँ प्यार करेगा जैसे मैं यूँ करता हूँ!”

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