ख़ामोशी
प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'
कैसे कह दूँ
तुम ही ग़लत थे
बीच हमारे
फ़ासले बहुत थे
कहती रही
नयनों से अपने
जी की बतियाँ
सारे असमंजस
सारे सवाल
न पाकर जवाब
बुझती रही
बिखरती रही मैं
टूटती रही
सुबकती रही मैं
कब जानोगे
कभी तो समझोगे
लंबा जीवन
प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा
नादानी मेरी
क्यों समझ न पाई
तुम ठहरे
मौन के उस पार
शब्दों के आदि
जो मैं कह न सकी
सुनते कैसे
ख़ामोशी बहुत थी
बीच हमारे
ना ग़लत मैं
ना तुम ग़लत थे
सच है यही,
ग़लत हम दोनों
हम दोनों सही थे!
1 टिप्पणियाँ
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7 Feb, 2026 03:55 AM
पत्रिका में स्थान देने के लिए हार्दिक आभार आदरणीय सुमन जी!
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