तब घर में क्या बचेगा
महेश कुमार केशरी
मैं जब-जब घर लौटता हूँ
दोपहर को एक औरत निकल आती है
ओट से
गैस का चूल्हा भभक उठता है
चकले पर बेलन फेरने की आवाज़
छन मन सुनाई देता है
कटोरी में दाल का उबलना
आती है सुगंध
नाक तक
ये झनक है
कटोरी में तरकारी काढ़े जाने की
एक औरत आती है बैठक में
और रख जाती है बारी-बारी से
चीज़ों को
पहले रोटी-सब्ज़ी
फिर दाल की गर्म कटोरी
आख़िर में लेकर आती है
लोटे में पानी
फिर मुड़ जाती है
कमरे से बाहर की तरफ़
कान लगाए रहती है
पूछती है बार-बार
कुछ और चाहिए हो तो बोलना
कुछ और चाहिए क्या
दो-तीन बार पूछती है
बड़े धैर्य
और नियम से
करती है वो जतन
सालों से वो औरत चौखट के भीतर है
कभी लगता है माँ है
कभी लगता है
बड़ी दीदी है
कभी लगता है
छोटी बहन है
कभी लगता है पत्नी है
मैंनें ठीक से नहीं देखा उसका चेहरा
सोचता हूँ कि ईश्वर भी इतने सलीक़े और
धैर्य से व्यवस्थित नहीं रख सकता था
घर को!
सोचता हूँ अगर घर से निकल गई
औरत
तो घर में क्या बचेगा!
औरत से बहुत छोटा होता है घर
घर को कभी बिना औरत के देखो
बाहर से
नितांत शून्य दिखाई देगा घर!
बहुत सोचता हूँ
पृथ्वी पर फिर क्या बचेगा
जब औरत नहीं होगी!
इस धरती पर
तब सारी चीज़ें
थम जाएँगी
अँधेरे में समा जाएगी
पूरी धरती
क्षण भर में!
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