पिता
महेश कुमार केशरी
पिता बूढ़े होते जा रहे हैं
बूढ़े बहुत बूढ़े
जिन्हें मैं गोद में
उठा सकता हू़ँ
हल्के बहुत हल्के
पिता की उम्र बढ़ रही है
शरीर घट रहा है
ख़ुराक तेज़ी से
कम हो गई है
पहले से आधे बचे हैं पिता
इतना आधे हो चुके हैं
जितना दस-पंद्रह किलो का
कोई बच्चा
बमुश्किल से आधी रोटी ही खा पाते हैं
पिता
असंख्य झुर्रियों से पट गया है
उनका चेहरा
चलते हुए काँपते हैं, पिता
मैं उनकी ताक़त बनना चाहता हूँ
पैर बन जाना चाहता हूँ, पिता के
जिससे वे लंबे-लंबे डग भर सकें
पहले की तरह
या बन जाना चाहता हूँ लकड़ी की
कोई नाव जिसमें वो
मेरी पीठ पर बैठकर
दृश्यों का आनंद ले सकें
पिता
अख़बार में शब्दों को बहुत
टटोल-टटोल कर पढ़ते हैं
आँखों में मोतियाबिंद उतर आया है
उनको अब कम दिखाई देने लगा है
अभी बरसात है;
ठंडी में ऑपरेशन करवाएँगे
मैं पिता से कहना चाहता हूँ
कि जब तक ऑपरेशन नहीं हुआ है
तब तक मैं आपको अख़बार के काॅलम
पढ़कर सुनाता हूँ
आप मेरी आँखों से पढ़िए अख़बार!
मैं भरना चाहता हूँ
उनमें घट गया आत्म-विश्वास
जो घरेलू झगड़ों में कहीं बिखर
गया है
रोज़-रोज़ के घरेलू झगड़ों से
पिता परेशान हो गए हैं
अभी ठंड है, पिता चाय पी रहे हैं
उनका हाथ काँपने लगा है प्याली
पकड़ते वक़्त
मैं पिता के हाथ बनना चाहता हूँ
भर देना चाहता हूँ उनमें ताक़त
एक झटके से
पिता
उतर नहीं पाते सीढ़ियों से
वो बहुत धीमा बोलते हैं
ऊँचा सुनते हैं
धीरे-धीरे पिता अवसान की तरफ़
बढ़ रहे हैं
मैं, अवसान की सीढ़ियों पर
उन्हें उतरते हुए साफ़ देख रहा हूँ
समय जैसे रुक गया है
मेरी रुलाई फूट पड़ी है . . .!
पिता सूरज की तरह लौट रहे हैं!
अस्ताचल गामी सूर्य होते जा रहे हैं
पिता
धीरे-धीरे पृथ्वी में भीतर बहुत भीतर
धँसते जा रहे हैं पिता।
क्षितिज पर लालिमा बिखेरते हुए
मुस्कुराते हुए विदा हो रहे हैं
पिता!
अब चारों तरफ़ अँधेरा है और
मैं फूट-फूटकर रो रहा हूँ!
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