कविता में गाँव 

15-05-2026

कविता में गाँव 

महेश कुमार केशरी  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मैं लौटना चाहता हूँ
घर 
लेकिन शहर की सड़क 
कंक्रीट की बनी है 
मेरे गाँव जाने की कच्ची सड़क 
गुम हो गई है कहीं 
मैं ढ़ूँढ़ता हूँ उन गाँव की कच्ची सड़कों 
की पतली पगडंडियाँ . . .
जाकर सुस्ताना चाहता हूँ 
पुरानी टूटी हुई कुर्सी पर 
टाँग देना चाहता हूँ अपनी पसीने से भीगी
हुई क़मीज़ 
घर के बरामदे की किसी खूँटी पर 
 
देखना चाहता हूँ 
घर के पिछवाड़े की खिड़की से 
खेतों की हरियाली 
खेतों की मेड़ 
गाय का रँभाना गाँव के तालाब 
 
सुस्ताना चाहता हूँ 
किसी हरे पेड़ के नीचे 
 
लेकिन अब मैं देख रहा हूँ 
इन चीज़ों को चित्रों में 
 
चित्रों में इन चीज़ों को देखना 
यातना दायक है 
 
लगता है जैसे यातना शिविर में बंद हूँ 
शहर में घर सिकुड़कर छोटा होता जा रहा है 
शहर में घर को अपार्टमेंट कहते हैं 
ये शहरों का चोंचलापन है 
अपार्टमेंट में ग़ायब है, घर 
बैठक, ओसरा और दालान 
कुआँ, तालाब और नदी 
 
यहाँ हरियाली नहीं है 
गाएँ नहीं रँभातीं यहाँ 
 
यहाँ चूल्हा नहीं जलता 
यहाँ उपले नहीं बनते 
 
यहाँ लोगों के आने जाने का एक 
नियत समय है 
कोई किसी से मतलब नहीं रखता
सब काम से बस काम रखते हैं। 
यहाँ सब पैसे वाले लोग हैं
एक से बड़े एक करोड़पति 
लेकिन कोई किसी से कुछ बोलता नहीं है 
ट्रैफ़िक का घना शोर है 
इतना घना कि कान पर 
हाथ धरने का मन करता है
 
मैं गुज़र रहा था 
एक दिन सड़क की फ़ुटपाथ पर से 
 
देखा एक चित्रकार बना रहा था चित्र
जिसमें कच्ची सड़क है 
सड़क पर पतली पगडंडियाँ हैं 
सड़क के दोनों 
ओर आज़ू-बाज़ू पेड़़ हैं 
हरियाली-ही-हरियाली है 
गाँव दिखाई देता है चित्र में! 
लड़कियाँ पेड़़ों पर झूला-झूल रही हैं 
किसान हल चला रहे हैं 
लड़के खेल रहे हैं, फुटबॉल मैदानों में 
बिजूका टँगा है खेतों के बीच! 
गाँव अब चित्र में ही बचा है! 
ख़रीदता हूँ वो चित्र मन मसोस कर कि 
अब तो चित्र में ही बचा है गाँव! 
सोचता हूँ अब गाँव तो बचा नहीं है कहीं 
घर जाकर दिखाऊँगा, 
बताऊँगा अपने बच्चों को 
कि देखो कभी रहते थे यहाँ 
हम जहाँ खेलने को मैदान था 
पेड़़ थे नदी थे तालाब था 
खेत थे जंगल था पहाड़ था 
भालू थे, चीते थे, शेर था 
ख़रगोश था और ये सब गाँव में था 
और गाँव अब बस चित्र
में ही बचा है! 

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