जिन्हें फेंक दिया गया 

15-05-2026

जिन्हें फेंक दिया गया 

महेश कुमार केशरी  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

लड़कियों के जन्म के बाद 
माएँ रोयीं 
पिता का मन उदास हो गया 
उदास हो गए
रिश्तेदारों के चेहरे 
सब मन-ही मन दुखी थे 
केवल टिटहरी का रोना बाक़ी था 
उस दिन 
 
चूल्हा नहीं जला कई-कई दिनों तक 
 
ना ही कोई गीत गाए गए 
जैसा लड़कों की पैदाइश पर होता है 
छठियारी की चर्चा किसी ने ना की
सबके मन उदास थे 
हताशा में लोग गश खाए जा रहे थे 
बस उनका ज़मीन पर गिरना शेष रह गया था 
सोच रहे थे क्या सोचा था 
और क्या मिली 
घृणा से मुँह टेढ़ा हो गया लोगों का 
अगर पता होता लड़की है तो गर्भ में ही! 
 
सबसे आसान तरीक़ा खोजा जाने लगा
उनको निपटाने का
 
फेंक दिया गया 
धूरे पर
कचरा समझकर 
 
लेकिन लड़कियाँ उग आईं 
फूल बनकर माटी से
महकने लगा बग़ीचा! 
 
कई-कई बार तो ज़िन्दा ही गाड़ दी गईं! 
लड़कियाँ खेतों में 
ऋतुएँ बदलीं लड़कियांँ 
धान बनकर उग आईं खेतों में 
 
जिन लड़कियों को कहीं जगह नहीं मिली 
और सोचा लोगों ने आख़िर कहाँ 
फेंका जाए इनको 
तब लोगों ने आसमान की तरफ़ देखा 
 
और फेंक दिया लड़कियों को 
आसमान में 
वहाँ ये लड़कियांँ इँद्रधनुष बनकर निकलीं 
 
लड़कियाँ लौट आईं
बार-बार बारिश बनकर 
 
बार-बार लौटीं 
ओस बनकर 
 
तब बालियों ने हँसा 
फ़सल और खेत मुस्कुराए 
लड़कियांँ लौटीं इसी बहाने 
जितनी बार हमने फेंका दिया धूरे पर 
गाड़ दिया खेतों में 
या उछाल दिया हवा में 
 
जितना बार हमने फेंका 
उपेक्षा से 
लड़कियाँ बार बार उग आईं
पृथ्वी पर जीवन बनकर! 

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