दो दूनी चार

15-05-2026

दो दूनी चार

महेश कुमार केशरी  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

ये शब्दकोश से पहले की बात है 
गिनती पहाड़े सब बाद में बने 
या ये माँ की देन हैं 
तुमने डाला खेत में एक दाना 
 
खेत ने लौटाए तुम्हें दो दाने 
और आदमी ने पढ़ा पहली बार 
दो-दूनी चार 
 
ये दोनों तब भी उतने ही उर्वर थे 
 
धरती और माँ दोनों ने 
लौटाया दो-एकम-दो 
दो-दूनी-चार 
चार-दूनी-आठ 
 
धरती और माँ दोनों 
उर्वरा हैं 
दोनों में अंकुरण हैं 
दोनों में प्रस्फुटन है 
दोनों में बढ़ना निहित है
दोनों में उत्साह है 
धरती और माँ हमेशा दोगुना देते हैं 
छींट दो चना, मकई, गेहूँ का दाना 
भर देतीं हैं बखार 
बोरी-बोरी अनाज से 
धरती की तरह माँ भी लौटाती है दोगुना 
नहीं उसके पास कोई ब्याज का हिसाब नहीं है 
नहीं है कोई खाता-बही 
पुरुषों की तरह 
पुरुषों की तरह नहीं जानतीं 
वे जोड़-घटाव 
गुणा-भाग 
उनको लौटाना है, 
दिए जाने वाले भाग से 
हमेशा कई-कई गुणा
भाग, घटाव, से वे ख़ाली हैं 
 
वो सर्जना हैं, अन्नपूर्णा हैं
दोनों में दो-दूनी चार की तरह तरह लौटाने का हुनर है 
ये महज़ इत्तिफ़ाक़ नहीं है कि शब्दकोश 
में दोनों स्त्रीलिंग हैं 
दोनों लौटातीं हैं दो दूनी चार! 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
कहानी
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
हास्य-व्यंग्य कविता
लघुकथा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में