ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, हर थोड़े दिन में वही सवाल मुँह बाए खड़ा हो जाता था . . . क्यों उसे राकेश अभी तक अजनबी से लगते थे? छह वर्ष हो गए थे उनके विवाह को, फिर भी मधु उन्हें अभी तक क्यों नहीं समझ पाई थी? वे पढ़े लिखे थे, घर बार अच्छा था, ऊँचे पद पर प्रशस्त थे . . .उसके पास रहने को एक आलीशान बंगला था . . . गाड़ी ड्राइवर भी . . .सब कुछ तो ठीक था . . . फिर क्या था कि जीवन का जमा-जोड़ ठीक नहीं बैठ रहा था . . .?

कल घर पर दावत हुई थी, ऑफ़िस से उनके बॉस और कुछ अन्य सहकर्मी और मित्र आए थे . . . ख़ातिरदारी भी ज़रूरत से कुछ अधिक ही हुई थी . . . सभी वाह वाह! करते लौटे थे . . .

 . . . और पिछले महीने ही तो हमनें गौरी कुण्ड पर ग़रीबों और विधवा बाइयों को शॉल एवं कम्बल बाँटे थे . . . कुछ लोग तो राकेश को पहचान भी गए और 'जयपुर वाले सेठजी' कहकर संबोधित कर रहे थे। वो अपनी तारीफ़ सुनकर फूले नहीं समा रहे थे . . . पर उसका मन बुझा-बुझा सा क्यों था . . . वो चाहते हुए भी, ख़ुश क्यों नहीं हो पा रही थी . . .?

संध्या की दिया-बाती करके ज्यों ही वो मुँडेर पर दीपक रखने गई तो चिराग़ तले अँधेरे ने वो सब कह दिया जो शायद वो अनुभव तो कर रही थी, पर मन स्वीकार करने से कतरा रहा था . . .

राकेश की रोज़-रोज़ की टोका-टाकी, ख़र्चा कम करने की हिदायत, उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतों को फ़िज़ूल खर्च का नाम देना, बात-बात पर 'बजट' न होने की दुहाई देना . . . 

मधु ने दराज़ से समाचार पत्र निकाला और नौकरी के लिए इश्तहारों को बड़े ग़ौर से पढ़ने लगी . . . उसे अपना 'बजट' ख़ुद जो बनाना था . . .!!

1 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें