गीत वो मेरे कहीं खो गए

01-01-2026

गीत वो मेरे कहीं खो गए

डॉ. सुकृति घोष (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

प्रीत सुधा में क़लम डुबोकर, 
कॉपी के पिछले पन्नों पर, 
सुरमई सी शामों में छुपकर, 
मोती जैसे अक्षर चुनकर, 
मैंने भी कुछ गीत लिखे थे, गीतों में मनमीत लिखे थे, 
हाय! न जाने कब और कैसे, गीत वो मेरे कहीं खो गए
 
नवपल्लव का नूर चुराकर, 
भँवरों का संगीत सजाकर, 
उपवन के सौरभ में खोकर, 
सप्तरंग में हृदय डुबोकर 
मैंने भी कुछ गीत लिखे थे, गीतों में मनमीत लिखे थे, 
हाय! न जाने कब और कैसे, गीत वो मेरे कहीं खो गए
 
सावन की दो बूँदें लेकर, 
पलकों की कोरों पर रखकर, 
नैनों में अनुभूति भरकर, 
अधरों में अरुणाई धरकर, 
मैंने भी कुछ गीत लिखे थे, गीतों में मनमीत लिखे थे, 
हाय! न जाने कब और कैसे, गीत वो मेरे कहीं खो गए
 
स्वप्निल वन में राह भूलकर, 
चाहत में अभिमान भूलकर, 
भाव तरु की छाँह ओढ़कर, 
शब्द-शब्द सुरताल जोड़कर, 
मैंने भी कुछ गीत लिखे थे, गीतों में मनमीत लिखे थे, 
हाय! न जाने कब और कैसे, गीत वो मेरे कहीं खो गए

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