प्रियतम
डॉ. सुकृति घोषतुम सागर की लहरें प्रियतम, नदिया मैं बन जाऊँगी
दूर अचल से दौड़ उतरकर, मिलने को अकुलाऊँगी
तुम मनमोहन गिरिधर प्रियतम, राधा मैं बन जाऊँगी
मुरली की तानों को सुनकर, सुधि अपनी बिसराऊँगी
तुम भँवरे की गुंजन प्रियतम, किसलय मैं बन जाऊँगी
आगम की आहट को सुनकर, मन ही मन इठलाऊँगी
तुम राका का हिमकर प्रियतम, चाँदनी मैं बन जाऊँगी
धवल चुनरिया लहराकर, जग को जगमग दमकाऊँगी
तुम मुक्तक के छंद ओ प्रियतम, लिपि मैं बन जाऊँगी
संग चलूँगी बाँह थामकर, सुख सपनों में खो जाऊँगी
तुम वर्षा के जलकण प्रियतम, वसुधा मैं बन जाऊँगी
हरियाली परिधान पहनकर, उर्वर बनकर मुस्काऊँगी
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