आस की नाव 

01-06-2026

आस की नाव 

डॉ. सुकृति घोष (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

उस पार को शायद चैन मिले, मैं आस की नाव चलाती हूँ
दो पल को सुख की शाम मिले, मैं लहर लहर बह जाती हूँ
 
किस ओर नाव का रुख़ मोड़ूँ, मैं हवा से पूछा करती हूँ
अनगिनत बारिशें ग़म की हों, मैं नेह की छतरी रखती हूँ
 
स्वप्नों की बोझिल गठरी में, नित नूतन धड़कन भरती हूँ
इक-इक सपना माणिक पन्ना, छुप छुपकर मैं गिनती हूँ
 
समय समंदर की तलछट से, इक-इक लम्हा चुनती हूँ
दिल के कमरे में बिखराकर, मोहक स्मृतियाँ बुनती हूँ
 
स्याह अमावस विभावरी में, प्रीत का दीप जलाती हूँ
तारों की जगमग श्वेत प्रभा में, मन उजियारा करती हूँ
 
मन की शुष्क धरा को अपने, अश्कों से तर करती हूँ
मुझे ख़बर है जग मिथ्या है, फिर भी मुस्कानें धरती हूँ
 
उस पार को शायद चैन मिले, मैं आस की नाव चलाती हूँ
दो पल को सुख की शाम मिले, मैं लहर लहर बह जाती हूँ

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