आख़िर क्यों?
डॉ. सुकृति घोष
आधुनिकता की लहर में, खो गईं संवेदनाएँ
घोर तम के कीच मन में, अब नहीं हैं चेतनाएँ
क्यों वधू ने त्याग दी हैं, लाज की झीनी चुनरियाँ
क्यों सुहागन बन गई हैंं, आज हत्या की पुजारिन
क्यों नहीं हैं अब कहीं भी, राधिका सी प्रेमिकाएँ
क्यों कपट के कंटकों में, खो गईं सब सरलताएँ
क्यों दग़ा के खंदकों से, साज़िशों ने दी सदाएँ
आधुनिकता की लहर में, खो गईं संवेदनाएँ
घोर तम के कीच मन में, अब नहीं हैं चेतनाएँ
क्यों पुरानी पड़ गईं हैं, दया और करुणा की बातें
क्यों विलोपित हो गईं हैं, आज नैतिकता की राहें
क्यों चाँद की यामिनी में, छुप गए जगमग सितारे
क्यों असत की कलुषता में, खो गईं सब मधुरताएँ
क्यों लालसा के अनल में, मर गईं सब आत्माएँ
आधुनिकता की लहर में, खो गईं संवेदनाएँ
घोर तम के कीच मन में, अब नहीं हैं चेतनाएँ
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